Sunday, November 21, 2010

संत

संत
मन बसंत था कल तक जो अब संत हो गया
अभिलाषा, इच्छाओ का बस अंत हो गया
जब से मेरी प्राण प्रिया ने करी ठिठोली
राम करू क्या बूढ़ा मेरा कंत हो गया

purane chawal

पुराने चावल
पकेगा तो महकेगा खिल खिल के दाना
क्योकि ये चावल पुराना बहुत है
नहीं प्यार करने की हिम्मत बची है
कैसे भी नजरे चुराना बहुत है
कभी पेट में दर्द,खांसी कभी है
सरदर्द का फिर बहाना बहुत है
भले ही हमारी,है ये जेब खली
तजुरबो का लेकिन खजाना बहुत है

Sunday, November 14, 2010

hum bujurg hai

हम वो पके हुए फल है
जो सड़े नहीं है,
सूखा मेवा बन गए है
समय की कड़ाई में तले हुए
वो गुलाब जामुन है
जो अनुभवों के रस में सन गए है
भले ही टेडी मेडी सही
हम प्यार के रस में डूबी जलेबिया है
थोड़े चरपरे तो है पर
स्वादिष्ट बीकानेरी भुजिया है
हम ममता के दूध में रडी हुयी
पुराने चावलों की खीर है
हम देशी मिठाइयो की तरह
मिठास से भरे है
पर हमारे मन में एक पीर है
की आजकल की पीड़ी को
देशी मिठाइयो से है परहेज
हमें खेद है हम लेट हो गए
बनने में चाकलेट
परांठा या चीले ही रह गए
पीजा न बन सके
पर आज भी कोई अगर प्रेम से चखे
तो जानेगा हम कितनी स्वादिष्ट है
हम बूड़े है ,हम वरिष्ठ है
भले ही युद्ध में कम नहीं आ सकते है
पर सांस्कृतिक धरोहर के रूप में तो रखे जा सकते है
हम विरासत के वो पुराने दुर्ग है
हम बुजुर्ग है

Sunday, November 7, 2010

deepotsav aaye

दीपोत्सव आये
प्रमुदित मन हम करे दीप अभिनन्दन,
आज धरा पर कोटि चन्द्र मुस्काए
दीपोत्सव आये
बाल विधु से कोमल चंचल
सुंदर मनहर स्नेहिल निर्झेर
घर घर दीप जले
पल पल प्रीत पले
अंध तमस मय निशा आज मावस की
भूतल नीलाम्बर से होड़ लगाये
दीपोत्सव आये
रस मय बाती लों का अर्चन
पुलकित हे मन जन जन जीवन
नव प्रकाश आया
ले उल्हास आया
रससिक्त दीपक में लों मुस्काई
ज्यो पल्वल में पद्मावली छाये
दीपोत्सव आये

deepotsav aayeदीपोत्सव आये प्रमुदित मन हम करे दीप अभिनन्दन, आज धरा पर कोटि चन्द्र मुस्काए दीपोत्सव आये बाल विधु से कोमल चंचल सुंदर मनहर स्नेहिल निर्झेर घर घर दीप जले पल पल प्रीत पले अंध तमस मय निशा आज मावस की भूतल नीलाम्बर से होड़ लगाये दीपोत्सव आये रस मय बाती लों का अर्चन पुलकित हे मन जन जन जीवन नव प्रकाश आया ले उल्हास आया रससिक्त दीपक में लों मुस्काई ज्यो पल्वल में पद्मावली छाये दीपोत्सव आये

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Saturday, November 6, 2010

Diwali Hoti Hai

सब साथ साथ  होते हैं तो दीवाली होती हैं
वरना तो बस हम होते हैं
और चार दीवारी होती हैं
तेरी आखों के दीप जलते है तो उजियारा हैं
वरना अमावस की रात काली होती हैं |
अपनत्व का अनार और स्नेह की रंगोली
सब मिल जाये तो ही दीवाली होती हैं
अमावस की रात, चाँद तू नहीं तो क्या
चाँद की सूरत वालों से रोशन दीवाली होती है |
जबसे शादी हुई तभी से यह जाना
कि घर की असली रौनक घरवाली होती हैं
पत्नी तो होती है फटाके जैसी
पर फूल-झड़ियो सी प्यारी साली होती है |
Composed by – Baheti Brothers (Madan Mohan, Dwarka and Jagdish)