Thursday, January 13, 2011

ऐसे हम फिसले गाल पर ,कंगाल हो गए

कमसिन था लचकता बदन ,मतवाली चाल थी
वो ही कदम तुम्हारे अब भूचाल हो गए
उड़ उड़ के उड़ा देते थे जो होंश सभी के
लहराते जाल जुल्फ के ,जंजाल हो गए
थे लाल लरजते हुए लब,गाल रेशमी
ऐसे हम फिसले गाल पर ,कंगाल हो गए
हुस्नो अदा और रूप से तुम मालामाल थे
इस माल के चक्कर में हम ,हम्माल हो गए

Wednesday, January 12, 2011

असली इश्क बुढ़ापे में है

तुम जवान थी ,मै जवान था
गरम खून में तब उफान था
भरा जोश था ,नहीं होश था
हम तुम दोनों में योवन था
फिर बच्चो की जिम्मेदारी
और नोकरी की लाचारी
काम,कामना और कमाई
का जुनून और पागलपन था
और अब हम हो गए रिटायर
बच्चे खुश अपने अपने घर
बस हम और तुम दो ही बचे है
छूट गया सब जो बंधन था
फुर्सत है चिंता न फिकर है
मौज मजे की यही उमर है
असली इश्क  बुढ़ापे में है
बाकी सब दीवानापन था

Sunday, January 9, 2011

तुम्हारे खर्राटे सुन कर

तुम्हारे खर्राटे सुन कर
सब भाग गए घर के मच्छर
लेकिन मै अब भी बिस्तर में
सोया हूँ कर बंद कान सखे
अब करने दो आराम सखे
ये सिर्फ आज की बात नहीं
ये रोज रोज का चक्कर है
ये तो बस हम ही जानते है
ये पीड़ा महा भयंकर है
आदत पड़ गयी हमें इसकी
अब इस बिन नीद न आती है
थोड़ी सी अगर शांति हो
तो नीद उचट बस जाती है
ये खर्राटे है नहीं सिर्फ
ये सात स्वरों का संगम है
ये गीत मधुर है तुम्हारा
ये मधुर तुम्हारी सरगम है
ना जरुरत कछुवा बत्ती की
ना हिट की कोई जरुरत है
तुम नींद चैन की सोती हो
आ जाती सब पर आफत है
ये नाक तुम्हारी सुन्दर सी
जब गाने लगती गान सखे
अब करने दो आराम सखे

Saturday, January 8, 2011

पहले तो ये बात नहीं थी

पहले तो ये बात नहीं थी
जब दिल से दिल नहीं मिले हो ,
इसी कोई रात नहीं थी
तुममे हममे एक बात थी
प्यार प्यार ही था बस केवल
एक दूसरे की यादे थी
इक दूजे के सपने हर पल
याद नहीं एसा कोई पल
जब तुम मेरे साथ नहीं थी
पहले तो ये बात नहीं थी
पहले जब झगडा होता था
उसमे मीठापन होता था
तब तनाव का अंत अधिकतर
मौन समर्पण ही होता था
एक दूसरे की बांहों बिन
कटती कोई रात नहीं थी
पहले तो ये बात नहीं थी
अब तो ऐसी उम्र आ गयी
तुम अपने में मै अपने मे
मै टी वी में पिक्चर देखू
तुम उलझी माला जपने में
अलग अलग है राह हमारी
अपनी तो ये जात नहीं थी
पहले तो ये बात नहीं थी









झगडे तो अब भी होते है

झगडे तो अब भी होते है
छोटी छोटी सी बातों में
अक्सर जब अनबन होती है
एक ही बिस्तर पर दूर दूर
हम मुहं को फेरे सोते है
झगडे तो अब भी होते है
अब भी जब सजते धजते है
तो कितने सुन्दर लगते है
लेकिन उनकी तारीफ़ न की
हो खफा ,सिसकते रोते है
जब घर वालो से नज़र बचा
हम रोमांटिक हो जाते है
वो झल्लाते है ,शरमा कर
फिर बाहुपाश में होते है
हम तो सोंदर्य उपासक है
कोई सुन्दर सी महिला को
देखा और जो तारीफ़ करदी
वो जल कर पलक भिजोते है
है शुगर हमारी बढ़ी हुई
लेकिन है शोक मिठाई का
हम चुपके चुपके खाते है
तो खफा बहुत वो होते है
उनके मैके से कभी कभी
जब फोन कोई आजाता है
टी वी का  वोल्यूम कम न किया
वो अपना आपा खोते है
जब उनके खर्राटे सुन कर
खुल जाती नींद हमारी है
हम उनकी नाक दबा देते
चुपचाप  चैन से सोते है
जब हमको गुस्सा आता है
और ब्लड प्रेशर बढ जाता है
अक्सर हमको या फिर उनको
करने पड़ते समझोते है
झगडे तो अब भी होते है

Thursday, January 6, 2011

अर्धाक्षर

अर्धाक्षर
मुझ बिन कोई पूर्ण नहीं है ,जी हाँ मै आधा अक्षर हूँ
                १
पूर्व दिशा में ,मै पश्चिम में,उत्तर से दक्षिण तक व्यापक
स्वर्ग नर्क में,चन्द्र सूर्य में, मै पृथ्वी से अन्तरिक्ष तक
मंगल,शुक्र ,बृहस्पति  ग्रह में ब्रह्माण्ड में, मै अम्बर में
मै समुद्र में, मै पर्वत पर ,मै त्रेता में, मै द्वापर में
धर्म,कर्म, संगीत, नृत्य में,और मृदंग का मै ही स्वर हूँ
, जी हाँ मै आधा अक्षर हूँ
मै त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु में,शिवशंकर के मन में रहता
मै लक्ष्मी, शक्ति, दुर्गा में,सरस्वती के स्वर में बहता
चार धाम,बद्री, रामेश्वर,जगन्नाथ जी ,पुरी द्वारका
महानगर, मुंबई,चेन्नई,इन्द्रप्रस्थ दिल्ली या कोलकत्ता
महानगर ये मेरे कारण,क्योंकि मै इनके अन्दर हूँ
   जी हाँ मै आधा अक्षर हूँ
मै मस्तक में ,कर्ण चक्षु मेंओष्ट और जिव्हा में मै  ही
हस्त ,उंगलियाँ,जांघ,पिंडलियाँ,मांस और मज्जा में मै ही
मै वर्षा में,मै सर्दी में,मै गर्मी में,मै बसंत में
जन्म ,मृत्यु में विद्यमान में,मै ही आरम्भ और अंत में
मै मानव की श्वास श्वास में ,और मै ही अस्थि पंजर हूँ
    जी हाँ मै आधा अक्षर हूँ
ब्रह्मचर्य में,मै गृहस्थ में,वानप्रस्थ में, मै सन्यासी
ब्रह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,क्षुद्र ,इन चार वर्ण का मै हूँ वासी
मै गंगा में,कालिंदी में ,सिन्धु,नर्मदा,क्षिप्रा, चम्बल
मै संगम में,मै प्रयाग में ,मै हूँ तीर्थराज में पुष्कर
हिंदी, उर्दू ,संस्कृत ,इंग्लिश ,हर भाषा में बहुत मुखर हूँ
      जी हाँ मै आधा अक्षर हूँ
कृष्णचन्द्र में बसा हुआ मै, मुझे बांसुरी ने है बांधा
क्योंकि मै मोजूद नहीं था ,प्यार रहा राधा का आधा
कृष्णचन्द्र की आठों रानी,रुकमनी, कालिंदी ,सत्यभामा
जामवंती और मित्रवंदा थी ,सत्या,भद्रा और लक्ष्मणा
इन सबके पटरानी बनने का,कारण बस में ही भर हूँ
       जी हाँ मै आधा अक्षर हूँ
हिन्दू ,मुस्लिम, बौद्ध,क्रिश्चियन ,सिख्ख सभी धर्मो के अन्दर
इश्वर, बुद्ध और क्राइस्ट में,मै अल्लाह में और पैगम्बर
विश्व सुंदरी बन कर चमकी,बजा रूप का अपने डंका
सुस्मिता ,एश्वर्य राय और युक्ता,दत्ता और प्रियंका
 मै इन सब में विद्यमान था ,ये सुन्दर मै भी सुन्दर हूँ
       जी हाँ मै आधा अक्षर हूँ

हमने छोड़ दी पीनी शराब

छलकते जाम से है लब तुम्हारे अंगूरी
नशीली है तुम्हारे नैन की चितवन चंचल
उम्र भर पीते रहो पर कभी न खाली हो
तुम्हारा जिस्म है पूरी शराब की बोतल
प्यार से देख भी लेती हो नशा छाता है
तेरे हाथों की छुवन काफी है नशे के लिए
तुम्हारी बाते नशीली है इस कदर जालिम
हमने छोड़ दी पीनी शराब नशे के लिए
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