Tuesday, February 22, 2011

सत्तरवें जन्म दिन पर


पल पल करके ,गुजर गए दिन,दिन दिन करके ,बरसों बीते
उनसित्तर की उमर हो गयी,लगता है कल परसों बीते
जीवन की आपाधापी में ,पंख लगा कर वक्त उड़ गया
छूटा साथ कई अपनों का ,कितनो का ही संग जुड़ गया
सबने मुझ पर ,प्यार लुटाया,मैंने प्यार सभी को बांटा
चलते फिरते ,हँसते गाते ,दूर किया मन का सन्नाटा
भोला बचपन ,मस्त जवानी ,पलक झपकते ,बस यों बीते
उनसित्तर की उमर हो गयी ,लगता है कल परसों बीते
सुख की गंगा ,दुःख की यमुना,गुप्त सरस्वती सी चिंतायें
इसी त्रिवेणी के संगम में ,हम जीवन भर ,खूब नहाये
क्या क्या खोया,क्या क्या पाया,रखा नहीं कुछ लेखा जोखा
किसने उंगली पकड़ उठाया,जीवन  पथ पर किसने रोका
जीवन में संघर्ष बहुत था ,पता नहीं हारे या जीते
उनसित्तर की उमर हो गयी,लगता है कल परसों बीते

  

Sunday, February 20, 2011

उमर का आलम

उमर का हमारी ये कैसा है आलम
सत्तर का है तन और सत्रह का मन
रंगे बाल हमने,किया फेशियल है
छुपाये न छुपती,मगर ये उमर है
होता हमारा ये दिल कितना बेकल
हसीनाएं कहती,जब बाबा या अंकल
करे नाचने मन,मगर टेढ़ा आँगन
उमर का हमारी ये कैसा है आलम
बहुत गुल खिलाये ,जवानी  में हमने
उबलता था पानी,लगी बर्फ जमने
भले ही न हिम्मत बची तन के अन्दर
गुलाटी को मचले है ,मन का ये बन्दर
कटे पर है ,उड़ने को बेताब है मन
उमर का हमारी ,ये कैसा  है आलम

Saturday, February 19, 2011

मैंने तुम पर प्यार लुटाया ,बस ऐसे ही

मैंने तुम पर प्यार लुटाया ,बस ऐसे ही
जाने क्यों तुम पर दिल आया ,बस ऐसे ही
बसंती ऋतू ,मुस्काती थी ,महक रही थी
कूक रही थी कोयल ,चिड़िया चहक रही थी
मस्त पवन के मदमाते झोके आते थे
भंवरे गुंजन कर फूलों पर मंडराते थे
खेत सुनहरी सरसों के सरसाये ही थे
गेहूं की बाली में दाने आये ही थे
तुमने मादक अंगडाई ली थी अलसा कर
तिरछी नज़रों से देखा था ,कुछ मुस्का कर
उगते सूरज में सोने सा रूप लगा था
मेरे मन में ,प्यार तुम्हारे लिए जगा था
मुझ पर था खुमार सा छाया ,बस ऐसे ही
मैंने तुम पर प्यार लुटाया ,बस ऐसे ही


Friday, February 18, 2011

ये उमर बुढ़ापे की भी होती कमाल है ,

कहने को तो हम हो रहे सत्तर की उमर के
दिल की उमर अभी भी सिर्फ सत्रह साल है
है बदन बदहाल और तन पर है बुढ़ापा ,
लेकिन मलंगी मन में ,मस्ती है ,धमाल है
हो जाए बूढा कितना भी लेकिन कोई बन्दर,
ना भूले मारने का गुलाटी खयाल है
जब भी कभी हम देखते है हुस्न के जलवे
बासी कढी में फिर से आ जाता उबाल है
ये बात सच है आजकल गलती है देर से,
लेकिन कभी ना कभी तो गल जाती दाल है
ना कोई चिंता है किसी की ,ना ही फिकर है
ये उमर बुढ़ापे की भी होती कमाल है










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Wednesday, February 16, 2011

मजा - मौसम का

शीत लहर सर्दी में,लहर उठाती मन में
घुस रजाई बिस्तर में,विंटर मनाते है
जब गर्मी  बढती है ,प्यास बहुत लगती है
चूम तेरे होठों को ,प्यास हम बुझाते है
बारिश की फुहारें, भिजोती तन मन सारे
प्रियतम संग प्रेम रस में ,भीग भीग जाते है
बासंती ऋतू में जब ,बौर आते आमों पर
प्यार के दीवाने हम ,खुद ही बौरा जाते है
होली पर रंग लगा,दीवाली दीप जला,
वेलेन ताईन डे पर हम ,चिपक चिपक जाते है
मौसम तो बहाना है ,साथ तेरा पाना है
मजा हर एक मौसम का ,जम कर उठाते है


Friday, February 11, 2011

ऋतू संहार

                ऋतू संहार
कहा धरा ने ये सूरज से ,प्रिय सूरज जी
बहुत सताते हो हमको ,तुम्हारी मरजी
जब तुम होते दूर मुझे कुछ नहीं सुहाता
साथ तुम्हारा पाने तरस तरस मन जाता
ग्रीष्म ऋतू में आकुल व्याकुल दिल होता है
तुम्हारी उष्मा सहना  मुश्किल  होता है
जब करीब आते हो ,तन जल जल जाता है
मगर दूर रहना भी मन को खल जाता है
प्यास बुझाने आते ,बर्षा के मौसम में
पर बादल बाधा बन जाते मधुर मिलन में
आते हो कुछ देर के लिए ,छुप जाते हो
आँख मिचोली कर के मन को अकुलाते हो
और शिशिर में आस मिलन की जब जगती है
शीत लहर की चुभन, दग्ध तन को करती है
किन्तु तरसता रहता है मन तुम्हारे बिन
नहीं समय मिलता तुमको ,होता छोटा दिन
फिर आता है जब बसंत का मौसम प्यारा
मादकता से पुलकित होता तन मन सारा
होली का मदनोत्सव या  वेलेंटा इन डे
तुम्हारा सानिध्य तार छूता है तन के
प्यार लुटाते हो मुझ पर तुम जी भर भर जी
कहा धरा ने ये सूरज से ,प्रिय सूरज जी


Tuesday, February 8, 2011

एक कहानी -एक कविता - पारस पत्थर


     (बाल कविता)
श्रम से डरता एक किसान
करता संतों का सन्मान
धरम करम में था विश्वास
गया एक साधू के पास
साधू  बाबा का ध्यान
सेवा करने लगा किसान
साधू बोले आँखे खोल
क्या है इच्छा बच्चा बोल
बोला कृषक ,धन्य जय साधो
एक पारस पत्थर दिलवादो
खेत खोद जा बच्चा अपना
पूरा होगा तेरा सपना
साधू बाबा का वरदान
लगा खोदने खेत किसान
उसने हांके हल और बख्खर
मिला नहीं पर पारस पत्थर
उसने बोया उपजा नाज
आ बोले साधू महाराज
श्रम का पारस पत्थर होना
मिटटी भी बन जाती सोना