Monday, March 28, 2011

वणिक पुत्र

           
मैंने तुम्हारी महक को,
प्यार की ऊष्मा देकर
अधरों के वाष्प यन्त्र से,
इत्र बना कर,
दिल की शीशी में,एकत्रित कर लिया है,
ता कि उम्र भर खुशबू ले सकूँ
मैंने तुम्हारा यौवन रस,
मधुमख्खी कि तरह,
बूँद बूँद रसपान कर,
दिल के एक कोने में
मधुकोष बना कर,संचित कर लिया है,
ता कि जीवन भर ,रसपान कर सकूँ
मैंने तुम्हारे अंगूरी अधरों से,
तुम्हारी मादकता का आसवन कर
एकत्रित कि गयी मदिरा को,
पर्वतों के शिखरों में,छुपा कर भर दिया है
ताकि उम्र भर पी सकूँ
क्योंकि संचय करना,मेरा रक्त गुण है
मै एक वणिक पुत्र हूँ



Sunday, March 27, 2011

आ तेरा श्रृंगार करूँ मै

आ तेरा  श्रृंगार करूँ मै
तुझको जी भर प्यार करूँ मै
बूढा  तन,सल भरी उंगलियाँ,
हीरा जड़ित अंगूठी उनमे
दोपहरी की चमक आ गयी ,
हो जैसे ढलते सूरज में
जगमग मोती की लड़ियों से ,
आजा तेरी मांग भरूं  मै
आ तेरा श्रृंगार करूँ मै
बूढ़े हाथों की कलाई पर
स्वर्णिम कंगन ,खन खन करते
टहनी पर जैसे पलाश की
सुन्दर फूल केसरी झरते
इस पतझड़ के मौसम में भी
आ बासन्ती रंग भरूं मै
आ तेरा श्रृंगार करूँ मै
मणि माला का बोझ ग्रिव्हा पर,
और करघनी झुकी कमर में
नयी नवेली सी लगने का
शौक चढ़ा है ,बढ़ी उमर में
अपनी धुंधली सी आँखों से
आ तेरा दीदार करूँ मै
आ तेरा श्रृंगार करूँ मै




Saturday, March 19, 2011

खेलो होली

घरवालों संग खेलो होली ,घरवाली संग खेलो होली
साला तो शैतान बहुत है ,तुम साली संग खेलो होली
जिनको सदा देखते हो तुम ,हसरत भरी हुई नज़रों से
जवां पड़ोसन ,प्यारी समधन,दिलवाली संग खेलो होली
यूँ तो सलहज सहज नहीं है,बस होली का ही मौका है,
कस कर पकड़ो रंग लगा,मतवाली के संग खेलो होली
लेकर रंग भरी पिचकारी,तन को इतना गीला करदो,
चिपके वस्त्र दिखे सब कुछ उस छवि प्यारी संग खेलो होली

अबकी होली

अबकी होली में हो जाये,कुछ एसा अदभुत चमत्कार
 हो जाये भ्रष्टाचार स्वाहा, महगाई,झगड़े, लूटमार
सब लाज शर्म को छोड़ छाड़,हम करें प्रेम से छेड़ छाड़
गौरी के गोरे गालों पर ,अपने हाथों से मल गुलाल
जा लगे रंग,महके अनंग,हर अंग अंग हो सरोबार
इस मस्ती में,हर बस्ती में,बस जाये केवल प्यार प्यार
दुर्भाव हटे,कटुता सिमटे,हो भातृभाव का बस प्रचार
अबकी होली में हो जाये,कुछ एसा अदभुत चमत्कार

आओ होली मनाएं

आओ होली मनाएं
पहले दिन
पुरानी वेमन स्तायें
दुर्भावनाएं ,कटुता,और
बैरभाव की होली जलाएं
और दुसरे दिन
सदभावनाओं की गुलाल
भाईचारे का अबीर
और प्रेम के रंगों से
मिलजुल कर होली मनाएं






Tuesday, March 15, 2011

जल

            जल
होता है मानव शरीर में ,सत्तर प्रतिशत से ज्यादा जल
कल कल कर बहती सरिता सा,धीरे धीरे बहता हर पल
कई तरंगें उठती रहती ,जैसे सागर की हो लहरें
लेकिन शांति बनी रहती है ,मन के अन्दर जाकर गहरे
कभी भावना का जलसागर ,शांत सरोवर जैसा रहता
कभी बाढ़ जब आजाती है,तो फिर तोड़ कगारें बहता
लेकिन कुछ बातें होती है,जो की हिला देती अंतर को
तो उठती है लहर सुनामी,तहस नहस करती घर भर को
पूर्ण चन्द्र या चंद्रमुखी को,पास देख मन होता चंचल
होता है मानव शरीर में,सत्तर प्रतिशत से ज्यादा जल
,

Sunday, March 13, 2011

मै तृप्त हो गयी

      मै तृप्त हो गयी
प्यासा था तनमन अन्तरतर
तूने दिया अंजुरी भर जल
          मै तृप्त हो गयी
मेघा घिर घिर कर आते थे
अविरल जल भी बरसाते थे
   मै रहती प्यासी की प्यासी
मेरे मन में अँधियारा था
भले चांदनी उजियारा था
मै अपूर्ण, थी पूरनमासी
तुमने जला प्रेम की बाती
जगमग रातें की मदमाती
            मै तृप्त हो गयी
इस जीवन में सूनापन था
चुप चुप फीका सा जीवन था
      तुम आये तो स्वाद आ गया
तुमने आकर फूल खिलाये
बगिया महकी,हम मुस्काए
      एक नया उन्माद छा गया
जब तुम्हारी खुशबू महकी
तुम भी बहके ,मै भी बहकी
         मै तृप्त हो गयी