Thursday, May 5, 2011

अर्थ का अनर्थ

   अर्थ का अनर्थ
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मैंने जब उनसे पूछा ,जीने की राह बतादो,
वो गए सीडियों तक और ,जीने की रह बता दी
वो लगे बैठ कर सीने,कुछ कपडे नए ,पुराने,
जब मैंने उनको सीने से लगने की चाह  बता दी
मै बोला आग लगी है, तुम दिल की आग बुझा दो
,वो गए दौड़ ले आये,दो चार बाल्टी पानी
देकर सुराही वो बोले,जी चाहे उतना पी लो,
मैंने जब उनको अपनी ,पीने की चाह  बता दी

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

नायिका भेद

नायिका भेद
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सुबह हुआ हो गयी काम में व्यस्त नायिका
नौकर,महरी, बीमारी से त्रस्त नायिका
बढती महंगाई ,खर्चे से   ग्रस्त नायिका
मन से ,तन से ,दोनों से ,अस्वस्थ नायिका
अच्छे दिन की आशा से ,आश्वस्त नायिका
शाम ढले तक हो जाती है पस्त   नायिका
मिला पति का प्यार हो गयी मस्त नायिका
रोज इसी ढर्रे की है अभ्यस्त  नायिका

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Wednesday, May 4, 2011

मेरा पहला पहला प्यार

मेरा पहला पहला प्यार
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मेरे दिल के एक कोने में,नाम तुम्हारा बसा हुआ है

उम्र बालपन की थी मेरी,प्यार ,इश्क कुछ ज्ञान नहीं था
नारी और पुरुष के अंतर ,का भी ज्यादा भान  नहीं था
पहली बार देख लड़की को,लगा की क्या होती है लड़की
मिलने और बातें करने की ,थी मन में जिज्ञासा भड़की
तुम्हे देख कर मेरे दिल में,कुछ कुछ पहली बार हुआ था
तुम्हारी भोली नज़रों ने,मेरा नाजुक ह्रदय छुआ था
तुमसे दो बातें करने को,मेरा मन मचला करता था
तुम्हारा हँसना,मुस्काना,इस दिल को पगला करता था
मेरे मन, मष्तिष्क,सभी में ,छवि तुम्हारी ही थी छाई
तुमसे मिलना ,बातें करना,होता था कितना सुखदायी
वो तुम्हारी चंचल आँखे,वो तुम्हारा प्यारा आनन्
एक गुदगुदी सी करता था ,कितना गदगद होता था मन
नयन तरसते थे दर्शन को ,मन में तुम बिन चैन नहीं था
वो बचपन का पागलपन था ,या फिर पहला प्यार वही था
फिर तुम चल दी अपने रस्ते,मै भी निकला अपने रस्ते
एक निरी भावुकता थी वो,भुला दिया बस हँसते हँसते
पर उर आँगन में अब भी पदचाप तुम्हारा छपा हुआ है
मेरे दिल के एक कोने में ,नाम तुम्हारा बसा हुआ है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 

सा पर बा भारी पड़ता है

सा पर बा भारी पड़ता है
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 बाल सदा है सर के ऊपर,सूरज को ढक लेते बादल
बा याने बीबी भारी है,श याने हर एक शोहर पर
सूखे पर बारिश है भारी,शातिर पर भारी बम बारी
सा याने की ओसामा पर,बहुत पड़े ओबामा भारी

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Tuesday, May 3, 2011

सच ,तुम जैसी हो ,बड़ी अच्छी हो

जब मै सोया होता हूँ,
तो मुझे झझकोर कर,
यूँ तो तुम मुझे कई बार जगाती हो
शायद मेरे खर्राटों से तंग होकर,
या बच्चों को स्कूल छोड़ने जाने के लिए,
या चाय का प्याला ठंडा न हो जाये इसलिए,
लेकिन कभी कभी जब तुम मुझे,
प्यार से सहला कर,यूँ ही जगा देती हो
तो तुम्हारी ये मादक जगाहट,
सचमुच मुझे निहाल कर देती है
या कभी जब तुम सज धज कर,
मेरे सामने आती हो
और तुम्हारे बिना पूछे की तुम कैसी लग रही हो
मै तुम्हारी तारीफ़ कर देता हूँ
तो तुम्हारे चेहरे पर आई ,संतुष्टि की मुस्कान
सच मुच बड़ी लुभावनी होती है
या जब नौकर या कामवाली बाई के ना आने पर
जब तुम बहुत व्यस्त और पस्त हो जाती हो
तो तुम्हारे कामो में मेरे  थोड़े से हाथ बँटा देने पर
तुम्हारी आँखों में आया धन्यवाद् का भाव
मुझे कितना गदगद कर देता है
या फिर जब कभी भी तुम मिठाई बनाती हो,
और मेरे डाईबिटिक होने के बावजूद भी
मीठी मीठी मनुहार कर
पहले मुझे चखाती हो
सच जीवन में कितना मिठास भर जाता है
या फिर तुम्हारे बिना जिद किये ,
जब मै तुम्हारे लिए कोई साडी या गहना,
तुम्हे सरप्राईज गिफ्ट देने को ले आता हूँ
तो तुम्हारा मुझ से ख़ुशी से लिपट जाना
कितना रोमांचक होता है
कभी कभी जब मेरी कुछ बात
तुम्हारी समझ में नहीं आती
पर तुम मुस्कराकर समझ जाने का अभिनय करती हो
तब कितनी समझदार लगती हो
और जब मेरी शरारत के जबाब में
तुम भी शरारत पर उतर आती हो
तो जिंदगी में कितना आनंद आ जाता है
बस तुम इसी तरह
मेरी जिंदगी में
हंसी ख़ुशी और रस की बरसात करती रहना
क्योकि तुम मुझ से बे इन्तहां मोहब्बत करती हो
और दिल की सच्ची हो
सच ,तुम जैसी हो ,बड़ी अच्छी हो

मदन मोहन बहेती 'घोटू'





Monday, May 2, 2011

अवहेलना

 क्या आपने कभी,
अपनी एक  दो दिन की बड़ी
दाढ़ी पर हाथ फेरा है
खुरदरे ,कंटीले ,चुभने वाले बाल
जिन्हें बार बार काटने को जी चाहता है
और हम उन्हें काटते भी हैं
पर निर्लज्ज फिर बढ जाते है
और लगते है चुभने
ये ही बाल,जब काटे नहीं जाते
तो बढ़ जाते है रेशमी मुलायम होकर
जिन्हें बार बार सहलाने को जी चाहता है
आदमी का छोटापन ,
उसे बना देता है
एक दो दिन की बढ़ी दाढ़ी के जैसा
खुरदुरा ,कंटीला और चुभने वाला
और उसका बढ्प्पन,उसे बनाता है
रेशमी ,मुलायम बालों जैसा
सबके मन को लुभानेवाला.
तो क्यों न हम,
छोटे लोगों के टुच्चे पन की तरफ
ध्यान ही न दें
शायद हमारी यह अवहेलना ही
उन्हें रेशमी  ,मुलायम बनादे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

रावण हर युग में मरता है

रावण हर युग में मरता है
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कितना ही हो ज्ञानी ,ध्यानी,कितनी ही भाषा का ज्ञाता
किन्तु बुद्धि यदि विध्वंशक हो ,सारा ज्ञान धरा रह जाता
ट्विन टॉवर पर हो हमला या,सीताजी का हुआ अपहरण
ओसामा बिन लादेन या फिर ,हो दशमुख लंकापति रावण
किन्तु कर्म हो अगर अधर्मी,करनी का फल मिलता ही है
ओसामा बिन   हो या रावण,  दुष्ट हमेशा   मरता   ही  है
आतंकी ,आतंकवाद को,एक दिन झुकना ही पड़ता है
त्रेता युग हो या फिर कलयुग, रावण हर युग में मरता है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'