Sunday, May 8, 2011

मच्छर

मच्छर
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मच्छरों से त्रस्त एक महिला ने
पूछा अपनी पड़ोसन नवविवाहिता  पड़ोसिन से
आप मच्छरों को कैसे भगाती है?
कौन सी दवा काम में  लाती है?
नवविवाहिता बोली शरमा कर
जी ,हमें तंग नहीं करते  है मच्छर
दर असल हमारे बेडरूम का वातावरण इतना रोमांटिक है
कि मच्छर भी रोमांटिक हो जाते है
एक दूसरे में खो जाते है
हमको बिलकुल नहीं सताते है
पड़ोसिन बोली,
हाँ तभी वे सब के सब
थके हारे जब
हमारे यहाँ आते है
तो भिनभिनाते है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'



Saturday, May 7, 2011

मातृदिवस

मातृदिवस
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 मातृदिवस को मत रहने दो,तुम केवल एक मात्र दिवस
 रोज करो सेवा माता की    ,रोज  मनाओ   मातृदिवस
माँ झरना आशिवादों का ,  माँ ममता का  सागर है
माँ सुरसरी स्नेह  की है, कोई न माँ से बढ़  कर है
माता का ही तो प्रसाद  है,ये तुम्हारा तन ,मन ,धन
जन्मदायिनी ,पालक, पोषक,सब माता है करो नमन
माँ का ऋण न चुका पाओगे,कितनी ही सेवा करलो
खुश किस्मत हो ,माँ है, आशीर्वादों  से झोली  भरलो
रोज करो सेवा माता  की ,रोज मनाओ मातृदिवस
मातृदिवस को मत रहने दो,तुम केवल एक मात्र दिवस

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

कारण -गरमी का

कारण -गरमी  का
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चार छुट्टियाँ मिलाती,मर्दों को महीने में
औरतें अधिकतर ही ,छुट्टियाँ मनाती है
तारे भी कई बार ,तड़ी मार देतें है,
अमावास को चंदा की भी छुट्टी  आती है
चार माह बरसते है ,बरस भर में बदल कुल,
और हवा अक्सर ही ,छुट्टी कर जाती  है
काम बिना छुट्टी कर,सूरज जब मन ही मन,
जलता है ,तो किरणों में ,फिर गरमी आती है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Thursday, May 5, 2011

उपदेश

    उपदेश
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पत्नीजी थी डाटती,पतिजी थे भयभीत
अस्थि चर्म मम देह मह,तामे इसी प्रीत
तामे इसी प्रीत ,काम में हो जो इतनी
तो फिर कम हो जाए ,मुसीबत मेरी कितनी
साडी तक भी नहीं समेटना तुमको आती
रोज बनाते ,बेल न पाते ,गोल चपाती

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

प्रेम रस

प्रेम रस
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भले कंटीली तीखी अंखिया
भले रसीली मीठी बतियाँ
गोरा आनन  चाँद सरीखा
सुन्दर नाक नक्श सब तीखा
भले अंग अंग हो मदमाया
बदन छरहरा ,कंचन काया
नाज़ुक,कमसिन,यौवन पूरा
पर सारा सौन्दर्य अधूरा
भरे न पिया ,प्रेमरस गागर
तब तक न हो रूप उजागर

मदन मोहन बहेती घोटू'

चाह

    चाह
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प्रियतम!
मै नहीं चाहती,
चाय की पत्ती की तरह,
तुम संग ,घुलूं,मिलूँ,
और तुम मेरा सारा रस लेकर
मुझे ,शेष स्वादहीन पत्तियों की तरह
फ़ेंक दो
मै तो,
इंस्टंट कोफी की तरह
तुम में घुल मिल कर,
एक रस हो कर जीना चाहती हूँ
इसीलिए ,चाय नहीं ,
कोफी पीना  चाहती हूँ

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

सौन्दर्यानुभूति

 सौन्दर्यानुभूति
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मुझे ,
सूरज से ज्यादा,
मोहित करते हैं,
सूरज को ढकने वाले बादल
जिन में से छन छन कर,
आलोकित होती है,
सूरज की स्वर्णिम आभाHide all
और उससे भी ज्यादा,
आल्हादित करती है
सुन्दर ,सुडोल ,शोढ्सी के,
सुगठित तन पर
अल्पदर्शी वस्त्रों से झांकती हुई  कंचुकी
और कंचुकी की कगारों को तोडती हुई
यौवन की मधुरिम आभा

मदन मोहन बहेती 'घोटू'