Tuesday, May 10, 2011

सवैया

         सवैया
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                 1
सीस पर सुहाय रहे ,केसन के दल पर दल,
         फेसन के मारे वा में तेल नहीं डारो है
मुखड़े पर पोत लियो ,मन भर के पाउडर,
         गरदन को रंग मगर ,दिखे कारो कारो है
फेशन की रोगिन ने ,जोगिन को रूप धरयो,
         पहन लियो भगवा सो कुर्तो ढीरो ढारो है
बल खाती बिजली से,बरस रही बदली से ,
             फेशन की पुतली से ,पड्यो हाय पालो है
                       २
सुरमा लगे लियो,अखियन अरु पलकन पर,
             सूरमा सी डोलत है, वर करे नैनन के
तनी रहे तन्वांगी, तुनक तुनक बात करे,
              ताने दे तान तान ,घात करे तन तन के
मुस्कावत ,मनभावत,चाहत पर शरमावत,
                  बनी ठनी रूपकनी,बात करे बन बन के
होटन हंसी फूट जाये,'घोटू' मन लूट जाए,
                  हाथन से छूट जाये, रूठ जाये मन मन के

मदन मोहन  बहेती 'घोटू'

               


Monday, May 9, 2011

तू ही तू है आँखों में

 तू ही तू है आँखों  में
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पहले सपने, फिर तेरी छवि,छाई यूं है आँखों में
दिल के हर कोने में बस तू ,तू ही तू है आँखों में
तुझसे पल भर की भी दूरी ,अब मुझको मंजूर नहीं,
चैन नहीं तुझको देखे बिन,एसा क्यूं है आँखों में
तुझे  देखता हूँ में जब जब ,निज सुध बुध खो देता हूँ
मंत्र मुग्ध सा मै हो जाता ,क्या जादू है आँखों में
है सुरमई ,कभी कजरारी ,मतवाली तेरी चितवन
मुझ पर डोरे डाल फसाती,मुझको तू है आँखों में
कभी दहकती अंगारों सी,कभी बरसती बिन बादल,
या फिर कोई जलजला आना,हुआ शुरू है आँखों में
सोयी थी या रोई थी,क्यों हुयी सुर्खरू ये  आँखें,
की रुखसार ,लबों की मेचिंग,तूने यूं है आँखों में
राहें तक तक,बैठा अब तक ,थक थक आँखें लाल हुई,
नहीं विरह के ,किन्तु जलन  से,अब आंसूं है,आँखों में
कोई कहता हिरणी सी है,कोई मछली,खंजन सी,
या तो कोई अजायबघर है,या फिर जू है आँखों में
नयन द्वार को,ढक कर,काले चश्मे से क्यों छुपा लिया
छुप छुप मुझको देख रही हो,या फिर फ्लू है  आँखों में

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

यादें --बचपन की

यादें --बचपन की
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मेरे बचपन की कुछ यादें,
स्मृतिपटल पर जब छाती है
मुझको कितना  तडफाती है
हम दो छोटे भाई बहन थे,
मम्मीजी थी ,पापाजी थे
बस छोटा सा परिवार था
सब के मन में भरा प्यार था
पापा कई बार बाहर से ,
आते थे ,रबड़ी लाते थे
थोड़ी थोड़ी सब खाते थे,
पर अतृप्त ही रह जाते थे
और अधिक रबड़ी खाने की ,
सदा लालसा रहती मन में
उस बचपन में
लेकिन एक बार पापाजी ,
बहुत अधिक रबड़ी ले आये
सबको देदी छूट प्रेम से,
जो भी चाहे ,उतना खाए
किन्तु अधिकता से रबड़ी की,
अरुचि सी थी मन में छाई
कई दिनों तक घर में फिर रबड़ी ना आई
मैंने इससे इतना सीखा,
किसी चीज की अधिकता,
अरुचिकर बना देती है
उसके स्वाद को
इसीलिए सहेज कर रखा है
बचपन की इस याद को
एक बार बस उत्सुकता से,
मैंने पूछ लिया पापा से
पापा ये क्या होती बियर
क्यों आकुल व्याकुल रहते है
लोग इसे पीने के खातिर
तो फिर एक दिवस पापाजी ,
बियर की एक बोतल लाये
थोड़ी खुद ली ,मम्मी को दी,
और एक एक घूँट ,हमको भी
 चखने को दिया
पर बियर की उस कडवी घूँट,
और तीखे तीखे स्वाद ने
मेरी उस उत्कंठा को,
 हमेशा   हमेशा के लिए दफ़न कर दिया
अगर मै उस दिन वो  कडवी घूँट ना पीती
तो मन में उत्कंठा ,हमेशा ही बनी रहती
जीवन का कितना बड़ा सच
सीखा था मेरे मन ने
उस बचपन में
और जब मेरी सहेलियां आती थी
और मुझे अपनी जन्म दिवस पार्टी में बुलाती थी
तो मेरा छोट भाई मेरे पीछे पड़ता था
की क्या पार्टी में,छोटा भाई भी आ सकता था
और पार्टी का शौक़ीन
 ,वो छोटा भाई ,बड़ा होने पर
काम में इतना व्यस्त हो जाता है
की पार्टियों में जाने से कतराता है
सच ,वक्त कैसे बदल जाता  है
बचपन के वो संस्कार
याद आतें है बार बार
पर परिस्तिथियाँ जीवन में,
कितना परिवर्तन लाती है
मेरे बचपन की कुछ यादें,
स्मृतिपटल पर जब छाती है
मुझको कितना तडफाती  है

श्वेता,  इलाहाबाद


             

सोचालय

 सोचालय
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 वह तो मेरा सोचालय है,जिसको शोचालय कहते तुम
मेरी कितनी ही सुन्दर रचनाओं का,ये   है       उदगम
 मेल निकल जाता है तन से ,भाव उभरते है मन में,
यह तो वो शंतिस्थल है ,जिसमे रहते तुम केवल तुम

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Sunday, May 8, 2011

मै हरिश्चंद्र हूँ

मै हरिश्चंद्र हूँ
मगर मै वो हरिश्चंद्र नहीं,
जो अपने वचनों की रक्षा के लिए
अपने बीबी बच्चों को बेच दे,
अपने आप को बेच दे
और सत्य पर अडिग रहे,
मै भी अपने वचनों की रक्षा करता हूँ
मगर उन वचनों की,
जो शादी के समय मैंने अपनी पत्नी को थे दिए,
और बीबी बच्चो का पेट पालने के लिए
मै जल्लाद के घर
भी हो सकता हूँ नौकर
बेचता मै भी हूँ अपने आप को
अपने इन्ही वचनों को निभाने को
परिवार की भूख मिटाने को
छोटा मोटा फेवर पाने को
सच से डिग जाता हूँ
झट से बिक जाता हूँ
रोज रोज बिकता हूँ
सत्य मै भी बोलता हूँ
जैसे मैंने अभी जो बात कही है
एक दम सत्य है,सही है
मै जो हूँ वही हूँ
मै हरिश्चंद्र हूँ,
पर वो हरिश्चंद्र नहीं हूँ

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

तुम डाल डाल -हम पात पात

तुम डाल डाल -हम पात पात
तुम भी नेता ,हम भी नेता
हम दोनों की है एक जात
हम एक गली में रहते है
पर एक दूजे से लड़ते है
नित भौं भौं करते रहते है
आपस में खूब झगड्तें है
पर जब खाना पीना हो तो
हम हो जाते है साथ साथ
तुम डाल डाल ,हम पात पात
जब तुम भी कम और हम भी कम
फिर आपस में कैसी अनबन
तुम भी भूखे ,हम भी भूखे
तो फिर क्यों करनी लाज शरम
बन जाए खिचड़ी क्यों ना हम,
आपस में करके मुलाक़ात
तुम दाल दाल ,हम भात ,भात
तुम बैठे हो पद पर अच्छे
हम तो है तुम्हारे चमचे
जब है सब ही फल फूल रहे
तो हम भी क्यों ना करें मजे
तुम भरे कडावों से बांटो
हम है फैलाये खड़े हाथ
तुम डाल देव,हम पात पात

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

एक अनार -सौ बीमार

एक अनार -सौ बीमार
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एक शुष्क दफ्तर में
काम करने
जब एक आधुनिका नार आ गयी
तर हो गया ,वातावरण दफ्तर का,
बहार  आ गयी
 उसके करीब आने की होड़
लोगों में इतनी बढ़ गयी
की दफ्तर की काया ही बदल गयी
साहब खुश थे,
काम की इफ़िसिएन्सि बढ़ गयी
देख कर के ये हाल
हमने कहा यार,
ये तो है वो ही मिसाल
एक अनार ,सो बीमार
हमारा ये कहना,
उनके एक बुजुर्ग से आशिक को
नहीं सुहाया
उन्होंने हमें समझाया
आप भी गजब ढाते है
एक सुमुखी 'नार' को 'अनार' बतलाते है
काहे एक 'अबला' को सताते है
 हमने कहा श्रीमान
हम एक 'नार'को 'अनार' कहें
तो आप बुरा मान जाते है
और खुद एक 'बला' को'अबला' बताते है
हमारी बात सुन,
पहले तो वो हमें ताकने लगे
और क्योंकि वो बगल में बैठी थी,
बगलें झाँकने  लगे

मदन मोहन बहेती 'घोटू'