Thursday, May 12, 2011

मजबूरी

       मजबूरी
       ----------
             १
पत्नी से कहने लगे, भोलू पति कर जोड़
आप हमीं को डाटती,हैं क्यों सबको छोड़
हैं क्यों सबको छोड़,पलट कर पत्नी बोली
मै क्या करूँ ,तेज  तीखी  है  मेरी   बोली
बड़े नाज़ और नखरे से मै पली हुई हूँ
नौकर चाकर वाले घर में बड़ी   हुई      हूँ
                  २
पत्नीजी कहने लगी,जाकर पति के पास
बतलाओ फिर निकालूँ,मन की कहाँ भड़ास
मन की कहाँ भड़ास,अगर डाटूं नौकर को
दो घंटे में छोड़ ,भाग जाएगा  घर को
सुनु एक की चार ,ननद से  जो कुछ बोलूँ
तुम्ही बताओ,बैठे ठाले  झगडा क्यों  लूं
                        ३
सास ,ससुर है सयाने,करते मुझसे प्यार
उनसे मै तीखा नहीं,कर सकती व्यवहार
कर सकती व्यवहार,मम्मी बच्चों की होकर
अपने नन्हे मासूमों को डाटूं क्यों कर
एक तुम्ही तो बचते हो जो सहते सबको
तुम्ही बताओ,तुम्हे छोड़ कर डाटूं  किसको?

मदन मोहन बहेती 'घोटू'


हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है

हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है
----------------------------------------------------
बीज तो मैंने उगा कर,खेत से अपने दिए थे,
फिर न जाने हो गयी क्यों,इस फसल में गड़बड़ी है
आ रहे है बालियों में,कुछ पके अनपके  दाने ,
और कितनी बालियाँ है ,जो अभी खली पड़ी है
 थी बड़ी उपजाऊ माटी,खाद भी मैंने दिया था
खेत को मैंने बड़े ही ,जतन से सिंचित किया था
हल चलाया था समय पर,करी थी अच्छी जुताई
और अच्छे बीज लेकर ,सही मुहुरत में बुवाई
उगे खा पतवार सारे ,छांट कर मैंने निकाले,
बहुत थे अरमान लेकिन ,गाज मुझ पर गिर पड़ी है
हो गयी क्या गड़बड़ी है ,जो फसल सूखी पड़ी है
न तो ओले ही गिरे थे,और ना ही पड़ा  पाला
सही मौसम ,सही बारिश ,सभी कुछ  देखा संभाला
मगर पश्चिम की  हवाएं ,कीट ऐसे साथ लायी
कर दिया बर्बाद ,फसलें,पनपने भी नहीं पायी
कर रहा हूँ जतन भरसक,लाऊ ऐसा कीटनाशक,
जो की फिर से लहलहा दे,फसल जो सूखी पड़ी है
हो गयी क्या गड़बड़ी है,फसल जो सूखी  पड़ी  है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Wednesday, May 11, 2011

मैके में बाकी सब कुछ था, साजन तेरा प्यार नहीं था

मैके में बाकी सब कुछ था,
                   साजन तेरा प्यार नहीं था
मेरे स्वप्न  सुनहरे तो थे,
                        पर पाया आकार नहीं था
मेरे प्यारे पापाजी थे,
                         स्नेहिल ,व्यस्त, मगर रोबीले
स्नेहिल ,व्यस्त ससुरजी भी हैं,
                            मगर सास के आगे ढीले
मम्मी थी ममता की मूरत,
                           मेरी शिक्षक और सखी थी
था कठोर अनुशासन उनका,
                            लेकिन दिल से मोम  रखी थी
ये कर ,वो कर,ऐसे मत कर,
                              जाने क्या क्या था समझाया
वर्ना तेरी सास कहेगी,
                                 तेरी माँ ने कुछ न सिखाया
बहुत प्यार करती सासू माँ,
                                  लेकिन थोडा सास पना है
सासू शक्कर,पर टक्कर की,
                                 यह मुहावरा, कहा सुना है
कभी डाट ती,ताने देती,
                                    किन्तु बाद में समझाती है
घर घर रहन सहन का अंतर,
                                     तौर तरीके बतलाती है
उनके प्यारे से बेटे पर ,
                                 मैंने कर अधिकार लिया है
यही गिला है उनके मन में,
                                  आखिर माँ तो होती माँ है
और ननद प्यारी बहना सी,
                                   है मासूम बड़ी चंचल सी
बहुत प्यार करती भाभी से,
                                   बातें सभी बताती दिल  की
मइके में सबको लगता था,
                                     बेटी नहीं , पराया धन है
पर अपना सा लगता ये घर,
                                        यहीं बिताना अब जीवन है
जब मै बड़ी हुई साजन के ,
                                      लगे जागने  सपने मन में
तुमसा जीवन साथी पाकर,
                                        खुशियाँ सभी मिली जीवन में
छेड़ा छाडी, मान मनोव्वल ,
                                            दिन रंगीन ,महकती राते
एक दूसरे में खो जाना,
                                   ख़तम न हो , वो मीठी  बातें
 मेरे जीवन  का ये उपवन,
                                       तब इतना गुलजार नहीं था
मइके में बाकि सब कुछ था,
                                        साजन तेरा प्यार  नहीं था

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

                                     
 

Tuesday, May 10, 2011

ससुराल संहिता

         ससुराल संहिता
        --------------------
                 १
कुछ साथी कोलेज के,मिले दिनों के बाद
निज पत्नी ,ससुराल पर,चली बात में बात
चली बात में बात,एक बोला मुस्काकर
यारों अपना तो दिल उलझा दिल्ली  जाकर
'घोटू' कहा दूसरे ने सर पर कर धरके
'अस्सी तो फस गए जाल  में 'जालंधर' के'
                    2
कहा तीसरे मित्र ने,बड़े गर्व के साथ
मिली 'मुरादाबाद' में,मन की मुझे मुराद
मन की मुझे मुराद,तभी चोथा मुस्काया
मै तो अपनी 'अली' 'अलीगढ' से हूँ लाया
'घोटू' कहा पांचवें ने भर आहें ठंडी
मेरे घर में आई 'चंडीगढ़' से 'चंडी'
                         3
छटवें के दिल की कली,कोलकत्ता की नार
बाँहों का घेराव जो,करती बारम्बार
करती बारम्बार,सातवें की थी बारी
बोला 'हाथ' हमारे आई ,'हाथरस' वाली
कह घोटू कविराय,आठवां हंस कर बोला
गिरा हमारे घर में,बम्बई का बम गोला


मदन मोहन बहेती 'घोटू'  
               

सवैया

         सवैया
       ----------
                 1
सीस पर सुहाय रहे ,केसन के दल पर दल,
         फेसन के मारे वा में तेल नहीं डारो है
मुखड़े पर पोत लियो ,मन भर के पाउडर,
         गरदन को रंग मगर ,दिखे कारो कारो है
फेशन की रोगिन ने ,जोगिन को रूप धरयो,
         पहन लियो भगवा सो कुर्तो ढीरो ढारो है
बल खाती बिजली से,बरस रही बदली से ,
             फेशन की पुतली से ,पड्यो हाय पालो है
                       २
सुरमा लगे लियो,अखियन अरु पलकन पर,
             सूरमा सी डोलत है, वर करे नैनन के
तनी रहे तन्वांगी, तुनक तुनक बात करे,
              ताने दे तान तान ,घात करे तन तन के
मुस्कावत ,मनभावत,चाहत पर शरमावत,
                  बनी ठनी रूपकनी,बात करे बन बन के
होटन हंसी फूट जाये,'घोटू' मन लूट जाए,
                  हाथन से छूट जाये, रूठ जाये मन मन के

मदन मोहन  बहेती 'घोटू'

               


Monday, May 9, 2011

तू ही तू है आँखों में

 तू ही तू है आँखों  में
------------------------
पहले सपने, फिर तेरी छवि,छाई यूं है आँखों में
दिल के हर कोने में बस तू ,तू ही तू है आँखों में
तुझसे पल भर की भी दूरी ,अब मुझको मंजूर नहीं,
चैन नहीं तुझको देखे बिन,एसा क्यूं है आँखों में
तुझे  देखता हूँ में जब जब ,निज सुध बुध खो देता हूँ
मंत्र मुग्ध सा मै हो जाता ,क्या जादू है आँखों में
है सुरमई ,कभी कजरारी ,मतवाली तेरी चितवन
मुझ पर डोरे डाल फसाती,मुझको तू है आँखों में
कभी दहकती अंगारों सी,कभी बरसती बिन बादल,
या फिर कोई जलजला आना,हुआ शुरू है आँखों में
सोयी थी या रोई थी,क्यों हुयी सुर्खरू ये  आँखें,
की रुखसार ,लबों की मेचिंग,तूने यूं है आँखों में
राहें तक तक,बैठा अब तक ,थक थक आँखें लाल हुई,
नहीं विरह के ,किन्तु जलन  से,अब आंसूं है,आँखों में
कोई कहता हिरणी सी है,कोई मछली,खंजन सी,
या तो कोई अजायबघर है,या फिर जू है आँखों में
नयन द्वार को,ढक कर,काले चश्मे से क्यों छुपा लिया
छुप छुप मुझको देख रही हो,या फिर फ्लू है  आँखों में

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

यादें --बचपन की

यादें --बचपन की
--------------------
मेरे बचपन की कुछ यादें,
स्मृतिपटल पर जब छाती है
मुझको कितना  तडफाती है
हम दो छोटे भाई बहन थे,
मम्मीजी थी ,पापाजी थे
बस छोटा सा परिवार था
सब के मन में भरा प्यार था
पापा कई बार बाहर से ,
आते थे ,रबड़ी लाते थे
थोड़ी थोड़ी सब खाते थे,
पर अतृप्त ही रह जाते थे
और अधिक रबड़ी खाने की ,
सदा लालसा रहती मन में
उस बचपन में
लेकिन एक बार पापाजी ,
बहुत अधिक रबड़ी ले आये
सबको देदी छूट प्रेम से,
जो भी चाहे ,उतना खाए
किन्तु अधिकता से रबड़ी की,
अरुचि सी थी मन में छाई
कई दिनों तक घर में फिर रबड़ी ना आई
मैंने इससे इतना सीखा,
किसी चीज की अधिकता,
अरुचिकर बना देती है
उसके स्वाद को
इसीलिए सहेज कर रखा है
बचपन की इस याद को
एक बार बस उत्सुकता से,
मैंने पूछ लिया पापा से
पापा ये क्या होती बियर
क्यों आकुल व्याकुल रहते है
लोग इसे पीने के खातिर
तो फिर एक दिवस पापाजी ,
बियर की एक बोतल लाये
थोड़ी खुद ली ,मम्मी को दी,
और एक एक घूँट ,हमको भी
 चखने को दिया
पर बियर की उस कडवी घूँट,
और तीखे तीखे स्वाद ने
मेरी उस उत्कंठा को,
 हमेशा   हमेशा के लिए दफ़न कर दिया
अगर मै उस दिन वो  कडवी घूँट ना पीती
तो मन में उत्कंठा ,हमेशा ही बनी रहती
जीवन का कितना बड़ा सच
सीखा था मेरे मन ने
उस बचपन में
और जब मेरी सहेलियां आती थी
और मुझे अपनी जन्म दिवस पार्टी में बुलाती थी
तो मेरा छोट भाई मेरे पीछे पड़ता था
की क्या पार्टी में,छोटा भाई भी आ सकता था
और पार्टी का शौक़ीन
 ,वो छोटा भाई ,बड़ा होने पर
काम में इतना व्यस्त हो जाता है
की पार्टियों में जाने से कतराता है
सच ,वक्त कैसे बदल जाता  है
बचपन के वो संस्कार
याद आतें है बार बार
पर परिस्तिथियाँ जीवन में,
कितना परिवर्तन लाती है
मेरे बचपन की कुछ यादें,
स्मृतिपटल पर जब छाती है
मुझको कितना तडफाती  है

श्वेता,  इलाहाबाद