Sunday, June 12, 2011

लंका दहन

लंका दहन
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लंका का राजा रावण,
था महान वैज्ञानिक ,
और उसकी सोच थी,
बड़ी आधुनिक
उसके पास,आधुनिकतम,
हथियारों का भंडार था
उसका खुद का हेलिकोप्टर,पुष्पक,
बेमिसाल था
उसने जब लंका का टाउन प्लानिग किया
जल वितरण के लिए,नलों की व्यवस्था की,
लोग बोले, उसने वरुण को कैद कर लिया
 लंका के सारे घरों का डिजाइन एक जैसा करवाया
सभी भवनों के शिखरों को सोने से मंडवाया
इसीलिए लंका,सोने की लंका कहलाई
पर बाद में इसी ने मुसीबत ढाई
बाकि तो सब ठीक था
पर उसका सिविल मेंटेनन्स विभाग ,
थोडा वीक था
सीताजी की तलाश में,
हनुमानजी ने ,जब लंका का हर घर खंगाला था
तो कई छतों पर,
सोने की परत उखड़ी पड़ी थी,
नीचे कुछ काला काला था
हनुमानजी ने जब विवेचन किया
तो पाया की काली काली चपड़ी थी,
जिस पर था सोने के पतरे को मड दिया
और अंत में जब सीताजी ,
रावण के फार्महाउस 'अशोक वाटिका' में मिली
 और रावण द्वारा पकडे जाने पर,
हनुमानजी की पूँछ जली
कहते है हनुमानजी का दिमाग,
कंप्यूटर से भी तेज था,
उन्हें छतों पर,सोने की परत के नीचे,
काली काली चपड़ी की याद आई
तो उन्होंने छतों पर छलांग लगायी
और क्योंकि चपड़ी ,बहुत ज्वलनशील होती है,
उसमे आग लग गयी
और सोने की लंका जल गयी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Saturday, June 11, 2011

      चाँद
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झिलमिल सितारों की ओढ़े चुनरिया है,
गोल मोल चमकीला,मुखड़ा ,सुहाना है
औरत सा चंदा भी ,चमके है रातों में,
चाँद सा चेहरा ये,नारी की उपमा है
बदल से  घूंघट को,उठा,गिरा लेता है,
महीने में एक दिन की छुट्टी भी लेता है,
अंग्रेजी भाषा में,इसको 'शी' कहते है
तो फिर क्यों हिंदी में,पुर्लिंग चंदरमा है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

,

मेरी मीता

मेरी मीता
तुम बिन, हर दिन,
एसा बीता
रीता रीता
दिन आया फिर सांझ हो गयी
रजनी काजल आंझ  सो गयी
मैंने ,हर पल ,
भोर प्रतीता
मेरी मीता
शरद,ग्रीष्म ,कुछ जान न पाया
ऋतुओं को  पहचान न पाया
हर मौसम था ,
तीता,तीता
मेरी मीता
तुममे खोयी मेरी आँखे
उडी सपन की लेकर पांखें
मिला नहीं ,
मेरा मनचीता
मेरी मीता
प्रेमपंथ में भटक भटक कर
जब पहुंचा प्रीतम पनघट पर
पाया पनघट,
रीता,रीता
मेरी मीता

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Friday, June 10, 2011

मेह सुख -देह सुख

मेह सुख -देह सुख
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सूरज के,यौवन की,
प्रखर तेज किरणों का,
पाया जो आलिंगन,
तप्त हुई धरती
अवनि की तपस देख,
घुमड़ घुमड़ घिरे मेघ,
अम्बर पर छाये,
आश्वस्त हुई धरती
मेघों ने गरज गरज,
गया जब मिलन गीत,
साजन के सपनो में,
मस्त हुई धरती
बारिश की फुहारें,
भिगा गयी सब तन मन,
सौंधी सी गंधायी,
तृप्त हुई धरती

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

तुम खरबूजे,मै खरबूजा

तुम खरबूजे,मै खरबूजा
हम दोनों में फर्क बहुत क्यों,
एक है मीठा ,फीका दूजा
एक जात के हम दोनों,
फिर भी क्यों है इतना अंतर
लोग मुझे कहते है दानव,
तुम कहलाते,देव,पैगम्बर
लोग घृणा करते है मुझसे,
तुम्हारी होती है पूजा
तुम खरबूजे,मै खरबूजा
 रूप रंग में बड़ा फर्क है,
अलग अलग हम क्यों दिखते है
इतना रंग भेद क्यों होता,
हम सस्ते,महंगे बिकते है
सब खरबूजे, फिर भी,कोई,
'सिंह''खान' है,कोई 'डिसूज़ा'
तुम खरबूजे,मै खरबूजा
है विभिन्न रंगों के गूदे,
कहीं सफ़ेद,हरा,  या पीला
अलग,अलग है रंग रक्त का,
देखो प्रभु की कैसी लीला
खरबूजे को देख बदलता ,
है क्यों रंग ,हरेक खरबूजा
तुम खरबूजे,मै खरबूजा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

हवा,धरती और बादल

हवा,धरती और बादल
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हवाओं मुस्कराओ आज तुम,  दिन फिर गए मेरे
कि देखो आज छाये है धुमड कर घन,गगन घेरे
गरज है ये नहीं घन की,मिलन का गीत आता है
बुझाने प्यास उर की आज मेरा मीत आता है
धरा ने जो कहा ये तो,यूँ मुस्का के ,हवा बोली
तेरे साजन,हमारे भी,तो कुछ लगते,  अरी भोली
करेंगे दिल मेरा ठंडा,तुम्हारी,प्यास के पहले
कलेजे से मेरे लग कर,लगेंगे फिर गले तेरे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

 

Thursday, June 9, 2011

मै कपास का फूल

मै कपास का फूल
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मै कपास का फूल विकस कर फूट रहा हूँ
मेरा उजला बदन रुई सा झांक रहा है
और बिनोले काले काले ,
छुपे हुए है मुझ में उलझे
मेरी रुई बन जायेगी धागा कत के
और जब कभी कोई ललना,
सुई छेद में ,जब पिरोएगी, कोई धागा,
तो फिर उसके होंठ लगूंगा,मै बढभागा
धागे बुन कर वस्त्र बनेगे
कितनो के ही अंग ढकेंगे
 और बन कर रूमाल ,काम में ,मै आऊंगा
पोंछ पसीना,
कोमल कोमल गालों को, मै सहलाउंगा
और बिनोले,
 बन कर के आहार पशु का,
दूध,दही बन कर बरसेंगे 
कितनो की ही भूख हरेंगे
सर्दी में,मै,ऊष्मा दूंगा,
बन कर रजाई,तन पर छाऊंगा
और गर्मी में,
उजली चादर बन कर ,छत पर बिछ जाऊँगा
मेरा जन्म हुआ है जगती की सेवा को,
हर एक रूप में,काम तुम्हारे मै आऊंगा
मै कपास का फूल,विकस कर फूट रहा हूँ

मदन मोहन बहेती 'घोटू'