Sunday, June 19, 2011

फादर डे

फादर डे
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साल भर में
 एक दिन पिता का
एक दिन माता का,
उस दिन ,माता या पिता को,
धन्यवाद का कार्ड या भेंट देकर,
हो जाती कर्तव्य की पूर्ती है
अरे! ये तो विदेशी संस्कृति है
हमारे संस्कार तो,
हर पल ,हर दिन,
माँ बाप को समर्पित होना सिखाते है
फिर भी हम माता पिता का ऋण,
नहीं चुका पाते हैं
आज हम जो,
सांसें ले रहे है,
फलफूल रहे है,
खुशहाल और आबाद है
ये पिताजी की प्रेरणा और तपस्या है,
और माँ का आशीर्वाद है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'



शाश्वत सत्य

शाश्वत सत्य
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भारत की धर्मपरायण जनता,
जब श्रद्धा लुटाती है
मंदिर और मठों की,
साधू और संतों की
चांदी ही चांदी है
भक्त लोग गुरुओं पर,
श्रद्धा के पत्र पुष्प,
प्रेम से चढातेहैं
चमत्कार होता है,
ये  सारे पत्र पुष्प,
नोटों के बण्डल में ,
बदल बदल जाते है
अगर धर्म गुरुओं के,
सोने के कमरे में
मिलता जो सोना है 

अचरज क्यों होना है?

मंदिर के गर्भगृह में ,
मिलता यदि अरबों का खजाना है
तो क्यों चकराना है?
मगर इस जीवन का,
सत्य ये शाश्वत है
राजा हो,रानी हो
संत,गुरु,ज्ञानी हो
खाली हाथ आता है
खाली हाथ जाता है'
 मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

Friday, June 17, 2011

मैंने कहा पति हूँ मै,,कोई चपरासी नहीं,



दफ्तर में काम काम,घर पर भी ना आराम,
                 बन कर तेरा गुलाम, काम नहीं आऊंगा
चाम के चक्कर में,नाच बहुत नाचा मै,
                  तेरे इशारण पर, नाच नहीं पाऊंगा
इहाँ जाव,उहाँ जाव,साग और सब्जी लाव
                  बच्चो को घुमाय लाव,कहाँ कहाँ जाऊँगा
 मैंने कहा पति हूँ मै,,कोई चपरासी नहीं,
                   मेरा पत राखोगी तो,प्रीत बरसाउंगा
         2
 
मक्खन के समोसे से,गाल तुम्हारे चिकने,
                    रसगुल्ले सी प्यारी,आँखें तुम्हारी है
खुर्जा की खुरचन सी,स्वाद भरी संगत है
                    रबड़ी  के लच्छों सी,बातें तुम्हारी है
  जब तू मुस्कावत है,तो मन को भावत है,
                   लेकिन नचावत है मोहे, पड़े भारी है
मैंने कहा पति हूँ मै,,कोई चपरासी नहीं,
                    चोबे हूँ,ओबे (obey )की,आदत हमारी है

  मदन मोहन बहेती 'घोटू'
,
                   

बारिश है पर दूर सजन है

बारिश है पर दूर सजन है
चूल्हा ठंडा पड़ा हुआ है,सिगड़ी बिगड़ी ,नहीं अगन है
बारिश है  पर दूर सजन है
है स्टोव बिसूरता उसमे पर मिटटी का तेल नहीं है
ओ पीहर की प्यारी प्रियतम,मेरा घर भी जेल नहीं है
आजकेतलीसूनी सूनी,भाग गयी है,चाय निगोड़ी
ठंडा मौसम,भूख लगी पर,कौन खिलाये,मुझे पकोड़ी
तेल पड़ा है,प्याज पड़े है,मगर पास में ना बेसन है
बारिश है पर दूर सजन है
पाकिट  भर सिगरेट पड़ी है,लेकिन सील गयी है माचिस
भुट्टा छिलकों बीच दबा है,कैसे पाऊं ,भुट्टे का 'किस'
बाहर रिमझिम है गीलापन ,लेकिन मेरा उर सूखा है
ओ दिलवाली! ये दीवाना तेरे दर्शन का भूखा है
'पी घर' से तो मन उकताता,पर 'पीहर' से लगी लगन है
बारिश है पर दूर सजन है

घोटू

मुकरियां

मुकरियां
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   १
जब जब देखूं,मन में भावे
व बिन मोहे ,कछु न सुहावे
मोको वासे  सच्चो प्रेमा
को सखी साजन, नहीं सिनेमा
       २
रात पड़े तब मोहे सतावे
पलक बसे अरु मोहि  सुलावे
दुक्ख भुलावे ,मोरा मितरा
को सखी साजन,न सखी निदरा
           ३
रात पड़े तब मो पर छावे
गरम करे मोरि ठण्ड भगावे
मजा देत है मोहि सुलाई
को सखी साजन,नहीं रजाई
          ४
दुबली,टेडी,ऊँची,नीची
प्यारी लागत रस में सींची
पीत वर्ण अति सुन्दर देबी
को सखे सजनी,नहीं जलेबी

घोटू
(सन १९५५-५६ में मध्यभारत की हाई स्कूल की
हिंदी पुस्तक में कुछ मुकरियां पढ़ी थी और लिखी भी थी
वो ही पुरानी मुकरियां प्रस्तुत है )



Thursday, June 16, 2011

दोहे

दोहे
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कातिल है कोई कहे,काफ़िर कोई बताय
कोई कडवी 'पिल' कहे,बातें कुटिल बनाय

वैसे है ज्ञानी बड़ा,है कानूनी कीट
बातूनी है गज़ब का,लोग बताये 'चीट'

सर पर तो है सफेदी,मन काला घनघोर
तेरे मन कछु और है,तेरे मुख कछु और

'सिम्बल' एरोगंस' का,चेहरे पर मुस्कान
संबल है सरकार का बढबोला इंसान
,
घोटू

Wednesday, June 15, 2011

,मै एक सोशल वर्कर हूँ

मै एक सोशल वर्कर हूँ
समाज की सेवा करना मेरा' पेशन' है
आज की हाई सोसायटी में ये ही फेशन है
गरीब बच्चों को पढाना,
ब्लड डोनेशन केम्प लगवाना,
अनाथालय में खाना और कपडे बटवाना,
और ये सब करते हुए फोटो खिंचवाना,
ये सब अब मेरी दिनचर्या बन गया है,
मुझे समाजसेवा का नशा चढ़ गया है
 और ये सिलसिला एसा चलता है
कि मै इतनी व्यस्त हो जाती हूँ,
कि मुझे अपने बूढ़े बीमार सास ससुर की,
 खबर लेने का भी टाइम नहीं मिलता है
वो तो घर के है,उनकी क्या चिंता करना
मुझे तो है समाज की सेवा  करना,
जिसके लिए मै हमेशा तत्पर हूँ
हाँ,मै एक सोशल वर्कर हूँ

मदन मोहन बहेती 'घोटू'