Friday, July 8, 2011

शिकवा

  शिकवा
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पहले तो आग लगायी,
रूप से अदाओं से
चंचल सी चितवन से,
मदमाते भावों से
और  अब आँखों से ,
आंसू ढलकाती हो
बन कर के दमकल तुम,
आग क्यों बुझाती हो

घोटू

 

Thursday, July 7, 2011

बच्चे बड़े हो गए है

बच्चे बड़े हो गए है
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शादी के बाद,
जब हमारे बच्चे हुए,
हमारी शरारतों पर लगाम लग गयी
हर बार सुनना पड़ता था बस यही
अरे, कुछ तो शर्म करो ,
बच्चे बड़े हो रहे है
धीरे धीरे बच्चे बड़े होकर स्कूल जाने लगे
तो हम अपने फालतू खर्चे घटाने लगे
बच्चों के भविष्य की चिंता में,
पैसे बचाने लगे
दिमाग में रहता था हरदम ये ख़याल
खर्चा करो संभाल,
क्योंकि बच्चे बड़े हो रहे है
और अब जब बच्चे सचमुच बड़े हो गए है
अपने पैरों पर खड़े हो गए है
अब उनका अपना एकीकृत परिवार है
मियां,बीबी,बच्चे,बस ये ही संसार है
माँ बाप,भाई बहन,ये सब जो रिश्ते नाते है
इन्हें फोन पर कभी 'हाय''हल्लो' कह कर निभाते है
फादर्स दे पर एक कार्ड पिता को,
और मदर्स दे पर एक कार्ड माँ को देते है
और अपना दायित्व निभा देते है
समझदार और प्रेक्टिकल ये हो गए है
हाँ,बच्चे सचमुच में बड़े हो गए है
माँ बाप अब भी परेशान है
सोचते है ,कि बच्चे नादान है
आज अपने दंभ में,सबको भुला कर,
अपने आप में खो रहें है
ये भी भूल जाते हैं कि ,
उनके बच्चे भी बड़े हो रहे है
उनकी समझ में ये नहीं आता है
कि इतिहास अपने आप को दोहराता है
अपना किया वो ही भरेंगे
उनके बच्चे जैसा देखेंगे,वैसा ही करेंगे
जिनके छोटे छोटे फल,
पहुँच से बहुत परे है,
ऐसे छायाविहीन खजूर के ,
ऊंचे वृक्ष बन कर खड़े हो गए है
बच्चे क्या सचमुच बड़े हो गए है ?




मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

   

Wednesday, June 29, 2011

दांत की बात

दांत की बात
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जब हम हँसते,तो दिखते है
 जब कुछ खाते तो पिसते है
  च
मका करते तड़ित रेख से,
सर्दी हो ,किट किट करते है
आँख,कान या हाथ ,पैर सब,
तन पर दो दो पीस दिये है
 लेकिन प्रभु ने थोक भाव से,
दांत हमें बत्तीस दिये है
सबसे सख्त अंग मानव का,
लेकिन साथ दिया है कोमल
अन्दर है नाजुक सी जिव्हा,
अधर चूमते रहते बाहर
आते है सब अंग जनम से,
ये आते है ,मगर ठहर के
वी. आई. पी.मेहमानों जैसे,
शकल दिखाते,एक एक कर के
एक बार जो अंग मिल गया,
संग रहता है जीवन सारा
 लेकिन सिर्फ दांत ऐसे है,
जो तन पर उगते दोबारा
दांतों तले दबाते उंगली,
जब हम अचरज में आ जाते
दांतों काटी रोटी होती,
तब हम गहरे दोस्त कहाते
अगर किसी को हरा दिया तो,
कहते खट्टे दांत कर दिये
तुमने दांत निपोर दिये क्यों,
बिना बात के अगर हंस दिये
हुआ प्रलय,डूबी धरती,तब
वराह रूप ले भगवन आये
उठा धरा अपने दांतों पर,
प्रभु थे जल से बाहर लाये
एक दन्त भगवान गजानन,
पूजा प्रथम सदा पाते है
दांत छुपे रहते मानव के,
और दानव के दिखलाते है
हाथी और रिश्वतखोरों की
लेकिन होती बात अलग है
दिखलाने के दांत और है,
और खाने के दांत अलग है
अगर निहत्थे जो गर तुम हो,
एक मात्र हथियार यही है
काट दांत से,दूर भगो तुम,
सबसे अच्छा वार यही है
है बच्चों के दांत दूध के,
अर्ध चन्द्र जैसे उगते है
दांत किसी सुन्दर रमणी के,
मोती के जैसे लगते है
हिलते दांत बुढ़ापे में हैं,
और नकली भी लग जाते है
रोज रोज मंजन कर के हम,
ख्याल दांत का,रख पाते है
जो भी शब्द ,निकलता मुंह से,
दांतों को छू कर आता है
दांत खिलखिला,उनका हँसना,
'घोटू' के मन को भाता है
खाना,पीना,हँसाना,गाना,
है सब में महत्त्व दांतों का
बात दांत की सुन कर मेरी,
ख्याल रखोगे ,तुम दांतों का

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 

Tuesday, June 28, 2011

समुद्र मंथन

    समुद्र मंथन
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प्यार तुम्हारा
है अथाह सागर सा गहरा,
और मेरु पर्वत के जैसा ये मेरा मन
जब समुद्र  का  होता मंथन
चौदह रत्न  प्रकट दिखलाते
रूप तुम्हारा 'रम्भा' जैसा,
और चमकीली 'मणि' जैसी तुम्हारी आँखें
'इंद्र धनुष' सी छटा,
'चन्द्र' सा सुन्दर आनन,
'शंख' बजाते सांसों के स्वर
रूप 'हलाहल'
'वारुणी' जैसे अधर मुझे कर देते पागल
'कामधेनु'और 'कल्पवृक्ष' सी
मेरी सभी कामनाएं तुम पूरी करती
'धन्वन्तरी' सी,
दग्ध ह्रदय की पीड़ा हरती
प्रेम 'लक्ष्मी',जब मै साथ तुम्हारा पाता,
'एरावत' सा मत्त गयंद हुआ करता मन,
और 'उच्च्श्रेवा' घोड़े सी दोड़ लगाता
रूप मोहिनी सा धर आती
मुझे देवता समझ प्रेम से,
'अमृत'घट से ,घूँट सुधा की मुझे पिलाती
तो अमरत्व मुझे मिल जाता
तृप्त तृप्त सा हो जाता मन
चौदह रत्न मुझे मिल जाते
जब होता है समुद्र मंथन

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'


Monday, June 27, 2011

बच्चा रो रहा था

बच्चा रो रहा था
पिता ने कहा, देख शेर आया
बच्चा चुप हो गया
बच्चा फिर रोया,
पिता ने कहा,देख हव्वा आया
बच्चा चुप हो गया
बच्चा फिर रोया
पिता ने कहा,देख माँ आई,
बच्चा चुप हो गया
बताओ,बच्चा डर से चुप हुआ प्यार से ?

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

वर्षा गीत

वर्षा गीत
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बदल घुमड़े,घिर घिर ,घुम घुम
पानी बरसा,रिमझिम, रिमझिम
मस्तीवाला,प्यारा मौसम
बचपन नाचा,छमछम,छमछम
उछल उछल कर,छपछप,छपछप
गीली माटी,थप थप,थप थप
हाथ उठा कर,नाचें,कूदें
पकड़ रहे पानी की बूँदें
नन्हे होंठ,पुष्प से खिल खिल
किलकारी भरते,किल किल किल
राग द्वेष ना,चिंता,उलझन
कितना निश्छल,प्यारा बचपन
भोले भाले,चंचल,चंचल
हँसते गाते,हरपल,पल पल
ठुम ठुम ठुमके,कदम सुहाने
अपनी ही धुन में मस्ताने
माँ बुलाएगी,जबतक,तबतक
नाच रहें हैं,छप छप,छप छप
माँ डाटेंगी,तो रो देंगे
प्यार करेंगी,फिर हंस देंगे
सो जायेंगे,थक,थक,थक थक
माँ के आँचल,से लग लग लग

मदन मोहन बाहेती 'घोटू

Tuesday, June 21, 2011

कवितायेँ-किसम किसम की ----------------------------------

    कवितायेँ-किसम किसम की
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बिना किसी लाग लपेट,
बेईमानी,भ्रष्टाचार,
दुर्दशा दर्शाती,
        नंगी सी  कविता
दो चार पंक्तियाँ
क्षणिकाएं या दोहे,
छिपी हुई पर सार्थक,
          चड्डी सी कविता
दिल के बहुत करीब,
भावनाओं के उभार,
दर्शाती है निखार,
          चोली सी कविता
ऊपर से दिखे एक,
पर नीचे मतलब दो,
द्विअर्थी या श्लेष,
          पायजामा कविता
द्रोपदी के चीर सी,
जितना भी पढ़ते जाओ,
उतनी ही बढती जाये,
        साडी सी कविता
अलंकर आभूषित,
मन को लुभानेवाली,
शब्दों से सजी धजी,
      श्रंगार सी कविता

मदन मोहन  बाहेती 'घोटू'