Thursday, July 21, 2011

पंच तत्व

पंच तत्व
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पंचतत्व से   बना   हुआ है ,ये सारा   संसार
जल,नभ,पृथ्वी,वायु और अग्नि,जीवन का आधार
हुआ इन्ही तत्वों से मिल कर ,ये शरीर निर्माण
इन्ही पंच तत्वों को कहते है हम सब
भगवान
' भ 'याने भूमि या पृथ्वी,अपनी धरती माता
हमें अन्नजल सब कुछ देती ,सहनशील और दाता
अस्थि,मांस,नख,केश ,त्वचा सब,इस माटी से बनते
और शरीर का अंत होने पर माटी में जा मिलते
'ग'गरमीया अगन तत्व है,उर्जा का है साधन
इस की शक्ति से ही होता,खान पान का पाचन
'व'है वायु तत्व जीवन का,यही प्राण कहलाता
सांस,सांस,में भीतर जाता,नस नस में बस जाता
'अ'याने अपसु या पानी, कहलाता है जीवन
यहीतरल  है जिससे बहता,रक्त नसों में हर क्षण
'न ',नभ या आकाश हर जगह,व्यापक तत्व यही है
नस,नाड़ी या उदर जहाँ भी,खाली जगह  यही है
 जिनमे गुण इन पांच तत्व के,वो महान कहलाता
  इसीलिए कहते शरीर को है भगवान  बनाता

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

तू कमाल है

तू कमाल है
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तेरे गाल है गुलाबी
तेरे होंठ है शराबी
तेरी अदायें मदमाती
            तू कमाल है
तेरा रूप है सलोना
तेने किया जादूटोना
तेरे तन का कोना  कोना
              मालामाल है
तेरी बातें मदमाती
मुझ पे प्यार लुटाती
नाज़ नखरों से रिझाती
               तेरी चाल है
मेरी  प्यारी प्यारी मैना
मेरे दिल में ही रहना
तेरे चंचल चंचल नैना
             बेमिसाल है

घोटू

 

Wednesday, July 20, 2011

स्वर्ण सुंदरी

स्वर्ण सुंदरी
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तुम मुस्काती
तो गालो पर,
ऐसी प्यारी रंगत आती
जैसे नोट हज़ार रूपये का,
प्यारा, सुन्दर
और सोने की गिन्नी जैसे,
डिम्पल पड़ते हैं गालों पर
चमक आँख की हीरे जैसी,
और दांत हो जैसे मोती
तेरे सुन्दर तन की आभा,
जैसे स्वर्णिम आभूषण सी
सजा रखे है,कलश स्वर्ण के,
तुमने तन पर
रूप राशी तुम,
तुम्हारी हर मुद्रा,
स्वर्णिम मुद्रा से बढ़
लाख टके सी प्यारी बातें,
तुम तो मूरत हो सोने की,
और खजाना हो  चाहत का
अपने दिल की बंद तिजोरी में,,
मेरा दिल,
छुपा रखा है जाने कबका
वणिक पुत्र मै,लोभी स्वर्ण और रत्नों का,
तुम्हारा अनमोल खजाना,
चाहूं रोज रोज ही पाना
स्वर्ण सुंदरी!

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Tuesday, July 19, 2011

डुगडुगी

डुगडुगी
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सुनो डुगडुगी राजा
काहे रोज बजाते बाजा
करते नित्य ताज़ा ताज़ा,
              बकवास हो
तुम सत्ता में कभी थे
चुक चुके हो तुम कभी के
मन में सपने गद्दी के
                करते आस हो
करते बातें ऊलजुलूल
अपनी मर्यादा को भूल
बजते रहना यूं ही फिजूल
             कुछ भी बात हो
तुम जो बकते हो दिनरात
लोग बतलाते है बात
सर पर प्रिंस का है  हाथ
            उसके खास हो
घोटू

Monday, July 18, 2011

बारिश का मज़ा

बारिश का मज़ा
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बरस रहा हो पानी रिमझिम
और साथ में हो मै और तुम
छोटी सी छत्री  के  नीचे
दोनों संग संग भीजे भीजे
एक दूजे के तन से सट के
हो जाते है ,कुछ पागल से
तू भी व्याकुल,आँखे मूंदे
मोती सी पानी की बूँदें
 बह  कर के तेरे बालों  से
चमक रही तेरे गालों पर
और गरजते है जब बादल
सहमा करती तू डर डर कर
तड़ित चमकती,तू डर जाती
मुझसे लिपट लिपट सी जाती
तेरे भीगे तन को छूकर
मुझ में गर्मी सी जाती भर
गीले तन से चिपका आँचल
कर देता है मुझको  पागल
मन कहता घन रहे बरसते
पानी में हम रहे तरसते
मज़ा प्यास का मगर अजब है
बारिश का रोमांस  गजब है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

तेरे हाथ में

तेरे हाथ में
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तेरे हाथों की बनायी
दाल ,सब्जी,मिठाई,
मैंने  चाट चाट खायी
           डूब स्वाद में
पैसे पर्स  के मेरे
हाथ लगने पे तेरे
जाने कहाँ उड़ गए रे
           बात बात में
अपनी उंगली पे नचा के,
मुझे बहलाती सहला के
रख्खे दीवाना  बना के,
            दिन रात में
मन करती है बेकाबू
सच सच बतला तू
जाने कैसा है रे जादू
             तेरे हाथ में

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Sunday, July 17, 2011

आजन्म कुंवारों के प्रति

आजन्म कुंवारों के प्रति
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चाहते थे जिंदगी की रह में,
           हमसफ़र एक चाँद का टुकड़ा मिले
महक जाए जिंदगी का ये चमन,
            फूल कुछ एसा गमकता सा खिले
 चाहते थे रूपसी यूं मदभरी,
              जिधर से निकले नशीला हो समां
थाम ले दिल देखने वाले सभी,
              इस तरह की हो अनूठी दिलरुबां
पर समय का समीरण सब ले उड़ा,
                स्वप्न यौवन के सुनहरे ,खो गये
रूपसी इसी नहीं कोई मिली,
                प्रतीक्षा में केश रूपा  हो गये

मदन मोहन बहेती 'घोटू'