Thursday, August 4, 2011

मैंने तुमसे जो भी माँगा,

मैंने तुमसे जो भी माँगा,
तुमने दूना कर दे डाला
अपनेपन से और समर्पण,
से मेरा संसार सवांरा
मैंने माँगा तुसे चुम्बन
तुमने मुझे दिया आलिंगन
मैंने पकड़ी एक बांह थी,
तुमने बाहुपाश दे डाला
मैंने चाहा प्यार मिलन का
तुमने देकर सुख जीवन का
फूल खिला मेरे आँगन को,
तुमने खुशबू से भर डाला
जब से आई परेशानियाँ
आगे बढ़ कर साथ है दिया
बन कर सच्चा जीवनसाथी,
गिरते गिरते मुझे  संभाला
मैंने तुमसे जो भी माँगा,
तुमने दूना  कर दे डाला

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

मेरी प्यारी प्यारी बेटी

मेरी प्यारी प्यारी बेटी
मुझको सदा प्यार है देती
जबसे आई है जीवन में
फूल खिले मेरे आँगन में
चहका  करती थी घर भर में
सबको दोस्त बनाती पल में
मेरे सुख में सबसे आगे
मरे दुःख में सबसे आगे
खुश होती,हंसती,मुस्काती
दुःख होता आंसू ढलकाती
चेहरा आइना सा बन के
सारे भाव दिखाता मन के
मिलनसार,प्यारी,निश्छल है
जीवन को जीती हर पल है
उसके एक नहीं,दो दो घर
एक ससुराल,एक है पीहर
दो दो मम्मी,दो दो पापा
अंतर रखती नहीं जरासा
तालमेल सबसे बैठा कर
दोनों घर में खुशियाँ दी भर
बेटे बदले,करके शादी
लेकिन बदल न पाती
हुई परायी,पर अपनापन
महकाया है मेरा जीवन
मेरे जीवन की उपलब्धी
मेरी प्यारी प्यारी बेटी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

आज घिरे है फिर से बादल,

आज घिरे है फिर से बादल,शायद बारिश हो सकती है
एसा जब जब भी होता है,आशाएं मन में जगती है
लेकिन कितनी बार हवाएं,भटका देती है बादल को,
अपने साथ बहा ले जाती,कुछ दीवानी सी  लगती है
श्यामल श्यामल,मनहर बादल,जब छाते है आसमान में,
कब बरसेंगे,प्यास बुझाने,आस लगा,धरती  तकती है
लेकिन बादल आवारा से,थोडा बरस,दूर जा भगते,
कुछ बूंदों से,बरस बरस की,लेकिन प्यास नहीं बुझती है
फिर से आयेंगे,फिर फिर के,और बरसेंगे फिर जी भर के,
पिया मिलन की आस संजोये,धरती विरहन सी लगती है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

शाख और पत्ते

शाख और पत्ते
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पत्ते रहते अगर शाख के संग जुड़े है
तेज धूप हो,फिर  भी रहते हरे भरे है
मगर शाख से टूट,अलग हो यदि गिर जाते
तो कुम्हलाते और सूख अस्तित्व गवांते
सदा शाख संग जुड़ रहने में हित तुम्हारा
क्योकि वृक्ष की नस नस में है जीवनधारा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Monday, August 1, 2011

,गुठलियाँ

सफलता है आम का रस ,गुठलियाँ है जूझना
आम का असली मज़ा है,गुठलियों को चूसना
  घोटू

Saturday, July 30, 2011

कल रात मैंने एक सपना देखा

कल रात मैंने एक सपना देखा
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कल रात मैंने एक सपना देखा,
मै रेगिस्तान में भाग रहा हूँ
और भागते भागते भटक गया हूँ
फिर थक कर गिर पड़ा हूँ
मेरे हाथ कट कर,
मेरे शरीर से छिटक कर,
दूर हो गए है
मेरे होंठ,प्यास से सूखने लगे है
और मेरी आँखों पर पट्टी बंधी है
कुछ हाथ,मदद के लिए ,मेरी तरफ,
बढ़ने की कोशिश कर रहे है,
पर पहुँच नहीं पा रहे है
तभी आसमान से एक परी उतरती है
वह मुझे  सहलाती है,
शीतल जल पिलाती है
और मेरी आँखों की पट्टी खोलती है
मैंने देखा,एक जादू सा हो गया है
मेरे हाथ मेरे शरीर से फिर जा जुड़े है
मदद करने वाले हाथों ने,
मेरे करीब आकर,मुझे उठाया है,
और मरुस्थल में अचानक,
हरियाली छा गयी है ,
और फूल खिलने लगे है
क्या था ये सपना?
मेरी आँखें खुली तो मैंने देखा,
रेगिस्तान में मेरा भटकना,
कोरी मृग तृष्णा थी ,
वो परी मेरी पत्नी थी
 वो हाथ, मेरे बच्चे थे
,मेरे माँ बाप,भाई बहन और मित्रों के हाथ,
मेरी मदद को बढ़ना चाह रहे थे
पर मेरी आँखों पर,
अहम् और अहंकार की पट्टी बंधी थी,
जिसके खुलते ही,
सब फिर से मिल गए
और रेगिस्तान में फूलखिल गए

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

 

बचपन की बातें, जब याद आती है बड़ा तडफाती है

बचपन की बातें,
जब याद आती है
बड़ा तडफाती  है
बरषा के बहते पानी में ,
कागज की नावों के ,
पीछे दोड़ने वाला, मै,
अब कागज के नोटों के ,
पीछे दोड़ता रहता हूँ
शाम ढले,छत पर बैठ,
नीड़ में लौटते हुए पंछियों को गिनना,
और बाद में उगते हुए तारों की गिनती करना ,
जिसका नित्य कर्म होता था,
अब नोट गिनने में इतना व्यस्त हो गया है,
कि उसके पास,
प्रकृति के इस अद्भुत नज़ारे को ,
देखने का समय ही नहीं है
माँ का आँचल पकड़,
चाँद खिलौना पाने कि जिद करनेवाला,
अब खुद व्यापार कि दुनिया में,
सूरज,चाँद बन कर चमकने को आतुर है
ठुमुक ठुमुक कर ,धीरे धीरे चलना सीख कर,
जीवन कि दौड़ में,
सबसे आगे निकलने कि होड़ में,
अधीर रहता है
माँ से जिद करके,
माखन मिश्री खाने वाला,
अब न तो माखन  खा सकता है न मिश्री,
क्योंकि,क्लोरोसट्राल  और शुगर,
दोनों ही बड़े हुए है,
क्यों छाया है मुझमे ये पागलपन?
क्या ये ही है जीवन?
कहाँ खो गया वो प्यारा बचपन ?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'