Wednesday, August 17, 2011

विद्रोह के स्वर

विद्रोह के स्वर
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स्वर विद्रोह के अब,उभरने लगे है
जरा सी हो आहट, वो डरने लगे है 
करे कोई इनकी,जरा भी खिलाफत,
शिकंजा उसी पर, ये कसने लगे है
तारीफ़ में खुद की ,गाते कसीदे,
बुराई सुनी तो,भड़कने लगे है
 करे कोई अनशन या सत्याग्रही हो,
डंडे उसी पर बरसने  लगे है
हुई बुद्धि विपरीत,विनाश काले,
खुद ही जाल में अपने फंसने लगे है
किये झूंठे वादे और सपने दिखाए,
हकीकत ये 'वोटर',समझने लगे है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

डुगडुगी राजा

डुगडुगी  राजा
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जब से लोगों ने दिखाए थे काले झंडे
तब से कुछ दिन तक पड़े थे ये ठन्डे
पर टी वी पर आने की लालसा इतनी प्रबल है
करने लग गए फिर से बातें अनर्गल  है
जब भी कोई विद्रोह का स्वर उठाता है
तो इनका कुनबा ,उसकी चार पुश्तों की,
जन्मपत्री खंगालने में जुट जाता है
काजल के टीके को भी,काला दाग  कह कर के,
डुगडुगी बजायेंगे
अपने गिरेबान में तो ,झाँक कर के तो देखे,
खुद को पूरा काला पायेगे
वोह तो गनीमत है की आजकल,
हाय कमांड ने लगा दिया प्रतिबन्ध है
और इनकी जुबान बंद है
वर्ना ये फिर बकवास करते कुछ ऐसे
'अन्ना के नाम में ही अन्न है,
फिर वो भूख हड़ताल पर कैसे '?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'



Tuesday, August 16, 2011

बूढा होता प्रजातंत्र

बूढा होता प्रजातंत्र
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चौसठ साल का प्रजातंत्र
और साठ का  जनतंत्र
दोनों की ही उमर सठिया गयी है
और सहारे के लिए,हाथों में,लाठियां आ गयी है
मगर कुछ नेताओं ने,
सत्ता को बना लिया अपनी बपौती है
इसलिए लाठी,जो सहारे के लिए होती है
उसका उपयोग,हथियारों की तरह करवाने लगे है
और विरोधियों पर लाठियां भंजवाने लगे है
विद्रोह की आहट से भी इतना डरते है
की रात के दो बजे,सोती हुई महिलाओं पर,
लाठियां चलवाने लगते है
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे है
कुर्सी पर ही चिपक कर ,रहने के मंसूबें है
पर बूढ़े है,इसलिए आँखे कमजोर हो गयी लगती है
इसलिए विद्रोह की आग भी नहीं दिखती है
सत्ता के मद में पगलाये हुए है
शतुरमुर्ग की तरह,रेत में मुंह छुपाये हुए है
जनता की लाठी जब चलेगी
तो वो इनको उखाड़ फेंकेगी
फिर भी ये लाठियां चला रहे है
सत्ता न छिन जाये,घबरा रहें है
जनता त्रस्त है
पर अच्छे दिनों की आशा में आश्वस्त है
आज पंद्रह अगस्त है
  
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 

हम हजारे के समर्थक

हम हजारे के समर्थक
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हम हजारे के समर्थक,और हम जैसे हजारों
छेड़ होगा आसमां में,  एक पत्थर तो उछालो
         हुई मद में चूर सत्ता
         चला सत्याग्रही जत्था
ना रुकेंगे,ना झुकेंगे,भले लाठी हमें मारो
हम हजारे के समर्थक,और हम जैसे हजारों
          भले लगते अल्प है हम
           मगर दृढ़ संकल्प है हम
सरफरोशी की तमन्ना,जेल बार देंगे  हजारों
हम हजारे के समर्थक,और हम जैसे हजारों
           और अब विद्रोह के स्वर
           हो रहे है मुखर,प्रतिपल
दमन के दम पर न ये,सैलाब थम पायेगा यारों
हम हजारे के समर्थक,और हम जैसे हजारों

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Monday, August 15, 2011

कौन हो तुम ?

     कौन हो तुम
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देख तुमको मै चमत्कृत
हुए दिल के तार झंकृत
रूप सुन्दर परी सा धर
आई अम्बर से उतर कर
चन्द्र सा मुख,तुम सजीली
तुम्हारी चितवन नशीली
भंगिमाएं मन लुभाती
तुम सुरा सी मदमदाती
मोहिनी , सुन्दर बड़ी हो
स्वर्ण की जैसे छड़ी हो
देख कर सौन्दर्य प्यारा
हुआ पागल मन हमारा
रूप का तुम हो खजाना
ह्रदय चाहे तुम्हे पाना
खोल कर सब द्वार मन के
तुम्हारे संग मधुमिलन के
स्वप्न प्यारे ,सजाता ,मै
क्योंकि लगता विधाता ने,
तुम्हे फुर्सत से गढा है
निखर कर यौवन चढ़ा है
और ना अब तुम सताओ
कौन हो तुम,अब बताओ ?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

भ्रम

     भ्रम
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भ्रमर  को भ्रम था कली को प्यार उससे,
                   मगर कलिका सोचती थी भ्रमर काला
जिंदगी में मिले साथी कोई सुन्दर,
                   चाह थी यह और भ्रमर को त्याग डाला
और पवन संग रही भिरती,डोलती, वह,
                     मिलन के सपने सजाये, बड़ी आतुर
और आवारा पवन सब खुशबू चुरा कर,
                     मौज लेकर जवानी की हो गया फुर
और अब वह सोच कर के यह दुखी है,
                      पवन से तो भ्रमर ही ज्यादा भला था
दिये उसने कई चुम्बन के मधुर क्षण,
                     भले काला और थोडा मनचला था
 भ्रमर भ्रम में था की वो कलिका भ्रमित थी,
                     चाह में रंग रूप के उलझी  रही वो
क्योंकि काला था रसिक प्रेमी भ्रमर वो,

                       त्याग कर के अब बहुत पछता रही वो
देख कर रंग रूप केवल बाहरी तुम,
                        अहम निर्णय जिन्दगी  के नहीं लेना
कई प्रेमी मिलेंगे,रस चूस लेंगे,
                         मगर सच्चे प्यार को ठुकरा न देना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


  

Saturday, August 13, 2011

हम पुलिस है

हम पुलिस है
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जब थे वो सत्ता में
हम थे उनकी सुरक्षा में
उन्हें सेल्यूट ठोकते थे
उनके इशारों पर डोलते थे
पर जब परिस्तिथियाँ बदली
सत्ता उनके हाथों से निकली
और वो विपक्ष में है
पर हम तो सत्ता के पक्ष में है
और जब वो करते है प्रदर्शन
सत्ताधारियो के इशारे पर हम
उन पर लाठियां भांजते है
जब की हम जानते है
भविष्य के बारे में क्या कह सकते है
वो कल फिर सत्ता में आ सकते है
पर हमारी तो ये ही मुसीबत है
कि हम कुर्सी के सेवक है
आज जिन्हें लाठी मार कर पड़ता है रोकना
कल उन्ही को पड़ सकता है सलाम ठोकना
कई बार सत्ता के इशारे पर
अपने ज़मीर के भी विरुद्ध जाकर
सभी मर्यादाओं को,अलग ताक पर रख कर
सो रही औरते और संतों पर
रात के दो बजे भी लाठियां मारी है
क्या करें नौकरी की ये लाचारी है
कभी अपने आप पर भी ये मन कुढ़ता है
नौकरी में क्या क्या करना पड़ता है
अपनी ही हरकतों से आ गए अजीज है
 हमारे मन को कचोटती यही टीस है
जी हाँ ,हम पुलिस  है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'