Tuesday, August 30, 2011

अनशन के बाद

 १
लालूजी ने संसद में भाषण दिया
और बतलाया कि किस तरह आक्रोश में,
जनता ने एक एम.पी.को ट्रेन से उतार दिया
सत्ताधारियों!यह तो एक ट्रेलर था,
पर इससे आप जनता के मूड को ताड़ सकते है
भष्टाचार नहीं मिटाया,
तो आज तो ट्रेन से उतारा,
कल सत्ता कि कुर्सी से उखाड़ सकते है
   २
अन्ना के अनशन के बाद,
एक जेब कतरे ने,
अपने ढंग से विद्रोह जतलाया
कि उसने तीन सांसदों कि जेब काट,
उन्हें अपना निशाना बनाया
उसने संकल्प किया है,
कि जिनने जनता कि जेब काटी है
उनसे शांतिपूर्ण ढंग से बदला लूँगा
अब सिर्फ नेताओं की ही जेब काटूँगा

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Saturday, August 27, 2011

हुंकार

हुंकार
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अब सड़कों पर उतर आई है,जनता भर कर क्रोध में
लोकपाल बिल लाना होगा,भ्रष्टाचार विरोध में
तम्हे चुना,संसद में भेजा,मान तुम्हारे वादों को
समझ नहीं पायी थी जनता,इतने भष्ट इरादों को
तुमने सत्ता में आते ही,जी भर लूट खसोट करी
कोई करे क्या,राज्य कोष को,लगे लूटने जब प्रहरी
जनसेवा को भूल ,लिप्त तुम थे आमोद प्रमोद में
अब सड़कों पर उतर आई है जनता भर कर क्रोध में
कई करोड़ों लूट ले गया,राजा  अपनी  गाडी  में
खेल खेल में,कई करोड़ों ,लूट लिए कलमाड़ी ने
आदर्शों की सोसाइटी में,आदर्शों का हनन हुआ
भष्टाचार,लूट,घोटाले,रोज रोज का चलन हुआ
कठपुतली बन,नाचे तुम,पूंजीपतियों की गोद में
अब सड़कों पर उतर आई है जनता भर कर क्रोध में
सुरसा से मुख सी मंहगाई,रोज रोज बढती जाती
 कैसे नेता हो जो तुमको,ये सब नज़र नहीं आती
 काबू इसे नहीं कर सकते,कहते हो,मजबूरी है
नहीं पास में हाथ तुम्हारे,कोई जादू की छड़ी है
बहुत त्रसित है और दुखी है,जनता है आक्रोश में
अब सड़कों पर उतर आई है,जनता भर आक्रोश में
लूट देश का पैसा कितना,स्विस बेंकों में भेज दिया
पास मगर चालीस बरसों में,लोकपाल बिल नहीं किया
शोषक जब होती है सत्ता,जन आक्रोश उमड़ता है
मिश्र,लीबिया सा गद्दी को,छोड़ भागना पड़ता है
देखो जन जन,लोग करोड़ों,अब सब हुए विरोध में
अब सड़कों पर उतर आई है,जनता भर आक्रोश में
लोकपाल बिल लाना होया,भ्रष्टाचार विरोध में

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, August 25, 2011

अन्ना का अनशन-प्रतिक्रियाएं

अन्ना का अनशन-प्रतिक्रियाएं 
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                 १
जब से अन्ना ने किया है अनशन,
रिश्वत खोरों का बुरा हाल है
उन्हें खाने को कुछ नहीं मिल रहा,
उनकी भी भूख हड़ताल है
                 २
एक बूढा संत,दस दिनों से भूखा है
पर सरकार का रुख,अभी तक रूखा है
करोड़ों लोग,अन्नाजी के साथ है
पर सत्ता तो भ्रष्टाचारियों के हाथ है
सबकी मांग है कि भ्रष्टाचार मिट जाए
और जन लोकपाल बिल पास हो जाये
पर भ्रष्टाचारी कहते है कि इतनी जल्दी,
ये बिल कैसे पास कर पायेंगे
अगर भ्रष्टाचार मिट जाएगा ,तो बच्चे क्या खायेंगे
मगर वो ये नहीं समझ पा रहे है,
कि अगर भ्रष्टाचार नहीं मिटा पाए,
तो जनता उन्हें मिटा  देगी
अगले चुनाव में उन्हें,
सत्ता से हटा देगी

घोटू

Wednesday, August 24, 2011

साड़ी

साड़ी
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कई बार मै सोचा करता हूँ रातों में
नारी नर से अग्रणीय क्यों सब बातों में
घर घर वह देवी सी क्यों पूजी जाती है
नर नौकर पर नारी रानी कहलाती है
इसका कारण मुझे समझ में अब आया है
शायद यह सब केवल साडी की माया है
साडी,जी हाँ,किन्तु आप चकराते क्यों है
साडी देखी उधर नज़र ललचाते क्यों है
साडी ना,साडी वाली के गुनगाहक है
साडी को कर रहे तिरस्कृत ये नाहक है
सचमुच  ही हम  पुरुष लोग है बड़े अनाड़ी
अभी तलक पहचान ना पाए ,क्या है साडी
पेंट कोट के इस लफड़े में पड़े हुए हैं
झूंठे  फेशन के चक्कर में अड़े हुए है
अरे पेंट के बटन टूटते धोबी के घर
और पाजामे का नाड़ा भी होता बाहर
टूटे बटन सियो,नाड़े का फिर हंगामा
बतलाओ,साडी अच्छी या पेंट पाजामा
दोनों टांगें बिछुड़ा करती पाजामे में
दरजी का खर्चा होता है सिलवाने में
साडी मिला रही टांगों को ,वह भी ढक कर
निश्चित  ही साडी ही है इन सब से बेहतर
साडी,गागर,जिसमे सागर भरा हुआ है
इतने गुण है ,कि हम सब का भला हुआ है
मौका पड़ने पर चादर भी बन जाती है
खूब बिछाओ,ओढो,सभी काम आती है
'करटन' सा लटका सकते हो दरवाजे पर
सब्जी भी तुम ला सकते हो झोली  भर कर
गर्मी में आँचल का फेन बना सकते हो
बिन रुमाल के भी तुम काम चला सकते हो
झगडे कि नौबत आये तो कमर कसोगे
मौके पर फांसी का फंदा बांध सकोगे
तन ढकता है,मक्खी मच्छर दूर भगेंगे
और फट गयी,तो दो पेटीकोट बनेंगे
इतनी अच्छी,फिर भी फेशन कहलाती है
इसीलिए तो साडी सबके मन भाती है
जब गलती होती तो नाम प्रभू का लेते
पर अब गलती करने पर हम'सारी' कहते
तो क्या ये सारी या साडी देवीजी है
शायद इसीलिए नारी इन पर रीझी है
जितनी देवी कि तस्वीरें पड़ी दिखायी
कोई भी स्कर्ट धारिणी नज़र ना आयी
हो सकता है साडी ही पूजी जाती हो
या साडी के कारण वो देवी कहलाती हो
कुछ भी हो जी ,साडी सचमुच,'दी ग्रेट'है
दुःख में देती काम,मनुज की बड़ी 'पेट' है
दुःख में राजा नल के आयी कौन अगाड़ी?
साथी थी वह दमयंती की आधी साडी
चीर हरण के समय द्रोपदी पर जब बीती
लाज रखी उसकी वह भी तो साडी ही थी
यह पुराण की कथा कह रही बन कर ज्योति
पांच पति से बढ़ कर है एक साडी होती
इतनी बातें सोच आज आया हूँ कहने
मेरे पुरुष दोस्तों,हम भी साडी पहने
सच कहता हूँ,सुख और सुविधा हो जायेगी
साडी लख,साडी वाली भी ढिग आएगी
पेंट कोट में कसे कसे रहने के बदले
साडी में हम हो जायेंगे उरले,पुरले
बचत योजना है ये,खर्चा  घट जायेगा
दरजी का,धोबी का खर्चा  कट जायेगा
 आधा दर्जन साडी घर में सिर्फ रखेंगे
उलट पुलट कर मियां बीबी पहन सकेंगे
होगी इतनी बचत,योजना सफल बनेगी
खुद साडी लायेंगे,बीबी और मनेगी
एक ड्रेस में इक्वल होंगे सब नर नारी
बहुत बोअर कर दिया आपको,अच्छा,सारी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 
 

Monday, August 22, 2011

अन्ना है कान्हा,

अन्ना है कान्हा,
जनता है गोपियाँ
कान्हा ने बांसुरी बजाई
गोपियाँ दौड़ी आई
हो रही है कृष्णलीला,
रामलीला मैदान में
भ्रष्टाचार है कंस जैसा
पर सब को है भरोसा
भ्रष्टाचार करने वाले,
कंस का अंत होगा
घोटू
 

Sunday, August 21, 2011

वो लेट क्यों आते है?

वो लेट क्यों आते है?
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कुछ लोग पार्टियों में,
हमेशा देर से आते है
और सबका अटेंशन पाते है
उनका ये सोचना है,
कि सजने सँवारने में इतना टाइम लगाओ

लेटेस्ट फेशन के कपड़ों में,पार्टी में जाओ
और देखने वाले हों बस
केवल आठ या दस
तो बताओ आपको क्या मज़ा आएगा?
सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा
मज़ा तो तब है,जब आपकी एंट्री हो
चारों तरफ अच्छी जेन्ट्री हो
पचासों लोगों कि निगाहें
आप पर आकर ठहर जाए
हर कोई आपसे मिलना चाहेगा
आपका सजना संवारना सफल हो जाएगा
जब पार्टी शबाब पर होती है
आपकी आमद गुलाब सी होती है
लेट आने पर मिलती है सभी कि अटेंशन
अरे ये तो है प्रकृति का नियम
क्योंकि जब पैदा होता इंसान है
तो होते दो हाथ,दो पैर,आँखें और कान है
पर शरीर के कुछ अंग जो देर से आते है
तो सबसे ज्यादा अटेंशन पाते है
जैसे मर्दों कि दाड़ी मूंछे,लेट आती है
और औरतों के यौवन का उभार लेट आता है
मन को कितना लुभाता है
ये ही वो चिन्ह है कि जिनको,
जवानी कि पहचान कहा जाता है
लेट आना प्रतीक है यौवन का,
इसलिए जब पार्टी  जवान होती है
  वो नज़र आते है
अब समझ गए ना,
वो पार्टी में लेट क्यों आते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

इंटरव्यू -कृष्ण कन्हैया से

इंटरव्यू -कृष्ण कन्हैया से
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कल मैंने डेयरी पर देखा
हुलिया एक अजीब ,अनोखा
लम्बे बाल लिया काँधे था
सर पर मोर पंख बांधे था
मैंने उसको हिप्पी जाना
पर लगता था कुछ पहचाना
आखिर मैंने पूछ ही डाला
क्या है भैया नाम तुम्हारा?
बोला बड़ा अचम्भा लाये
मुझको तुम पहचान न पाये
पूजो रोज़ जिसे तुम भैया
मै गोकुल का किशन कन्हैया
मै बोला कान्हा,जय कृष्णा
दूर करी नैनों की तृष्णा
धन्य हुआ जो दर्शन पाया
लेकिन नहीं समझ में आया
'क्यू' में यूं क्यूं आप खड़े है
क्या राधा से आज लड़े है?
बोले ना ये बात नहीं है
राधा जी  तो साथ नहीं है
मै तो आया ऐसे ही था
हाल जानने इस धरती का
इतने में ही भूख लग गयी
दिखा कहीं ना दूध या दही
लोगों ने यह ठौर बताया
पता पूछता हूँ मै आया
मै बोला प्रभु धन्य भाग है
हमसे कितना अनुराग है
मुझको सेवा का अवसर दो
मेरी कुटिया पवित्र करदो
नहीं विदुर की पत्नी जैसे
खिलवाऊँ कैले के छिलके
 बल्कि असली दूध मिलेगा
और अमूल का मख्खन होगा
'बटर टोस्ट ' के साथ खाइए
भगवन मेरे साथ आइये
मै उनको अपने घर लाया
बैठाया,जलपान कराया
फिर बोला उपकार करो प्रभु
थोडा सा इंटरव्यू  दो प्रभु
बोले माफ़ करो तुम भैया
मेरे पास ना टका,रुपैया
चावल खाए सुदामा के थे
जो भी था,उसको डाला दे
अब खाकर मख्खन तुम्हारा
ये गलती ना करूं दुबारा
कुछ भी मेरे पास नहीं है
मै बोला ये बात नहीं है
मेरा मतलब इतना केवल
दे दो कुछ प्रश्नों के उत्तर
बरसों बाद आप है आये
कैसा तुमको यहाँ लगा है ?
बोले भैया,गया ज़माना
अब क्या गाऊं गीत पुराना
ना वो गोकुल,ना वो गायें
नहीं गोपियाँ,क्या बतलाये
पहले दूध दही था  बहता
अब बोतल,पाउच में रहता
पहले जब माखन की हंडिया
लेकर जाती गोपी,सखिंया
मै उनको छेड़ा करता था
हंडीयाये फोड़ा करता था
अब छेड़ूं तो क्या बतलाऊं
सर पर कई सेंडिल खाऊं
अब वो प्यारे वक़्त को गए
ग्वाले भी होशियार हो गए
सारा दूध टिनो में भर कर
बेच रहे रख साईकिल पर
और गोपियाँ अपने घर में
खुश है अपने ट्रांजिस्टर में
सुनती हैं जब फ़िल्मी गाने
कौन सुने मुरली की ताने?
क्या बतलाऊ तुमको भैया
सूख गयी है जमुना मैया
घर घर में बाथरूम हो गए
चीर हरण के चांस खो गए
मैंने उन्हें टोक ही डाला
माफ़ करो नंदजी के लाला
आलोचक है निंदा करते
चीर हरण थे तुम क्यों करते?
कृष्ण कन्हैया बोले झट से
मै ना डरता आलोचक से
चीर हरण यदि मै ना करता
तो बतलाओ कैसे रखता
लाज द्रोपदी की दुनिया में
चीर बढाता भरी सभा में
मेरे पास स्टोक ना होता
तो बतलाओ फिर क्या होता?
चीर हरण कर कर मै लाया
मैंने था स्टोक बढाया
तो मौके पर काम आ गया
मेरा कितना नाम छा गया
वैसे कई चीज ऐसी  है
जो अब भी पहले जैसी है
राजनीती का रंग वही है
उल्टा सीधा ढंग वही है
नेता  चुन दिल्ली जाते है
लेकिन  कभी नहीं आते है
लेने खबर क्षेत्र की अपने
जैसे कभी किया था  हमने
गोकुल से चुन मथुरा आया
लेकिन  कभी लौट ना पाया
इतना उलझ गया वैभव से
भेजा सन्देशा उद्धव से
  पहले भी संयुक्त कई दल
कौरव जैसे बने बढा बल
पर पांडव से युद्ध कराया
ये है राजनीती की माया
अच्छा देर हुई बंधुवर
मुझको जाना है अपने घर
इतने में ही मुझे सुनाया
जागो,कितना दिन चढ़ आया
श्रीमती जी जगा रही थी
मेरा सपना भगा रही थी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'