Saturday, September 3, 2011

तुम नहीं थी

तुम नहीं थी
---------------
नींद मुझको नहीं आई,तुम नहीं थी
कामनाये  कसमसाई ,तुम नहीं थी
चांदनी थी रात शीतल
याद तुम आई प्रतिपल
बड़ा ही बेचैन था मन
और तन की बढ़ी सिहरन
ओढ़ ली मैंने रजाई,तुम नहीं थी
मगर उष्मा नहीं आई,तुम नहीं थी
नींद  रूठी,उचट कर के
बांह में तकिये  को भर के
बहुत कोशिश की ,की सोलूं
कुछ मधुर सपने संजोलूँ
पड़ो तुम जिनमे दिखाई, तुम नहीं थी
नींद यादों ने उड़ाई,तुम नहीं थी
याद आया महकता तन
अकेली पड़ गयी धड़कन
क्या बताऊँ ,आप बीती
किस तरह से रात बीती
भोर तक भी सुध न आई,तुम नहीं थी
बस तुम्हारी याद आई,तुम नहीं थी
जिंदगी में,इस, हमारी
अहमियत क्या तुम्हारी
तुम न थी,जब जान पाया
प्यार को पहचान पाया
समझ  में ये बात आई,तुम नहीं थी
बड़ी जालिम है जुदाई,तुम नहीं थी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सच्ची तृप्ति

सच्ची तृप्ति
--------------,
रोज रोज फ्रीजर में,
रखा पुराना खाना,
माइक्रोवेव ओवन में,
गरम करके खाता हूँ
पर मुझको लगता है,
सिर्फ पेट भरने की,
औपचारिकता निभाता हूँ
वर्ना खाने का जो स्वाद,
माँ के हाथ की पकाई,
गरम गरम रोटियों में,
सरसों के साग की ,
सौंधी सी खुशबू में,
और गन्ने के रस की खीर में आता है,
सच्ची तृप्ति तो वही दिलाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

यादें

यादें
----
तेज धूप गर्मी से,
जब छत की ईंटों के,
थोड़े जोड़ उखड जाते है
और बारिश होने पर,
जोड़ों की दरारों में,
कितने ही अनचाहे,
खर पतवार निकल जाते है
जीवन की तपिश से,
जाने अनजाने में,
रिश्तों के जोड़ों में,
जब दरार पड़ती है
और बूढी आँखों से,
बरसतें है जब आंसू,
तो बीती यादों के
कितने ही खर पतवार,
बस उग उग आते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

अमरुद का पेड़

अमरुद का पेड़
-----------------
एक छोटा पौधा रोंपा था,मैंने घर की बगिया में
मधुर फलों की आशा की थी,इस बेगानी दुनिया में
सींचा मैंने अति ममत्व से,बच्चों सा  ,पोसा ,पाला
बड़े जतन से,सच्चे मन से,रोज रोज देखा,भाला
धीरे धीरे पौधा विकसा,उगी टहनियां,हुआ घना
उसने हाथ पैर फैलाये,आज गर्व से खड़ा,तना
चिकना तना,रजत सी आभा,भरा पूरा सा रूप  खिला
लगे चहकने,पंछी ,तोते, एसा नया स्वरूप मिला
उसका कद,मेरे भी कद से,दूना,तिगुना बढ़ा हुआ
मैंने बोया था जो पौधा,आज वृक्ष बन खड़ा हुआ
पिछले बरस,एक टहनी पर,देखे, दो अमरुद लगे
मेरे नन्हे से बेटे के,  जैसे थे  दो  दांत   उगे
और इस साल,भरा है फल से,फल छोटे है,कच्चे है
एसा लगता टहनी पर चढ़,खेल रहे ,कुछ बच्चे है
पर नियति की नियत अजब है,उसने है दिल तोड़ दिया
फल पकने का मौसम आया,मैंने वो घर ,छोड़ दिया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, September 1, 2011

हिंदी-अंग्रेजी


हिंदी-अंग्रेजी
--------------

पंडित देशीलाल से,मिले विदेशी  चंद
हिंदी इंग्लिश के लिए,शुरू हो गया द्वन्द
शुरू हो गया द्वन्द,आई बातों में तेजी
देशी बोले छात्र बिगड़ते पढ़ अंग्रेजी
बचपन से ही जानवरों के नाम पढ़ाते
तो बच्चों में संस्कार पशुओं के आते

अंग्रेजी की प्राइमर,चिड़िया खाना एक
A से होता 'एस' है,C से होती 'केट '
C से होती केट,'डोग' होता है D से
F 'फोक्स'G 'गोट',H ,मतलब मुर्गी से
घोटू O  से 'ओक्स'और P से 'पिग' सूअर
R 'रेट' और Z 'जेब्रा',सभी जानवर
3
बात विदेशीचंद ने,सुनी लगाकर ध्यान
 'क्लीन शेव्ड 'से फेस पर,फ़ैल गयी मुस्कान
फ़ैल गयी मुस्कान,कहा यदि यही सचाई
तो जो आज देश में बड़ी भुखमरी छाई
उसका कारण है बच्चे हिंदी पढ़ते है
पढ़ते कम है,खाने पर ज्यादा मरते है

बच्चा जब चालू करे,अपना अक्षर ज्ञान
अ से पढ़े 'अनार'वो,आ से होता 'आम'
आ से होता आम,'ईख 'ई ,इ से 'इमली
और अं से 'अंगूर ,'ककड़ीयां' क से पतली
ख से 'खरबूजा'खाने को जी चाहेगा
खाक पढ़ेगा बच्चा,पेटू हो जाएगा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


  

न नौ मन तेल होगा,न राधा नाचेगी


न नौ मन तेल होगा,न राधा नाचेगी
------------------------------------------
(कुछ प्रतिक्रियाएं )
                  १
राधा को नाचना तो नहीं आता,
मगर बहाने बनाती है
कभी आँगन को टेढ़ा बताती है
तो कभी नौ मन तेल मांगेगी
क्योंकि वो जानती है,
न नौ मन तेल होगा होगा,
न राधा नाचेगी
   २
राधा, नाचने के लिए,
अगर नौ मन तेल लेगी
तो इतने तेल का क्या करेगी?
क्या पकोड़ियाँ तलेगी?
और अगर इतनी पकोड़ियाँ खायेगी
तो खा खा कर मोटी हो जाएगी
फिर कमर कैसे मटकायेगी
और क्या नाच भी पाएगी?
       3
  हमारे कृष्ण कन्हैया
 कितने होशियार थे
बांसुरी बजा देते थे
और बिना नौ मन तेल के,
राधा को  नचा देते थे
जैसे मिडिया वाले,
टी.वी. बजा बजा देते है
सत्ता की राधा को,
नचा नचा देते है
         ४
अगर नौ मन तेल बचाना है,
और राधा को नचाना है
तो कोई आइटम सोंग बजा दो
खुद भी नाचने लगो,
और राधा को भी नचा दो
           ५
शादी के पहले,
तुमने नौ मन तेल देकर ,
राधा को खूब नचाया
पर शादी के बाद,
जब रुक्मणी आएगी
तो तुम्हे इतना नचाएगी
की मज़ा आ जायेगा
तुम्हारा,नौ मन से भी ज्यादा,
तेल निकल जायेगा
            6
गोकुल में,
जब थे कृष्ण और राधा
दूध ,दही,मक्खन खाते थे
और दोनों,गोप गोपियों के संग,
नाचते गाते थे
मक्खन और घी इतना होता था,
की हर कोई,
पुए,पूरी और पकवान,
देशी घी ने पकाता होगा
तेल कौन खाता होगा?
 इसलिए मेरा ये मत है
की ये मुहावरा ही गलत है
          ७
नाचने के लिये,
नौ मन तेल की मांग करना,
एक दम,ना इंसाफी है
राधा को नचाने के लिये,
तो बांसुरी की धुन,
और कान्हा का प्यार ही काफी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

मै भी अन्ना-तुम भी अन्ना

मै भी अन्ना-तुम भी अन्ना
--------------------------------
मै भी अन्ना,तुम भी अन्ना,हम सब है अन्ना का सब बल
अड़े मिटाने को आन्दोलन,चिदंबरम जी और श्री सिब्बल
और साथ में ,लाठी लेकर,दिल्ली पुलिस दिखाती सब बल
देखा जन सैलाब उमड़ता,मन मसोस के चुप थे केवल
साधू वेश में,अग्निवेश जी,बन कर के कुटिलों के साथी
करते बात फोन पर दीखे,अन्ना को बतलाते हाथी
काम कर रहे हैं जयचंद का,लगा लगा जय हिंद का नारा
लूट रहे मोहम्मद गौरी बन,भ्रष्टाचारी, देश हमारा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'