Wednesday, September 14, 2011

मैया,बहुत दिनन में आयी

(सोनिया जी के वेदेश से वापस आने पर)
              पद
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मैया,बहुत दिनन में आयी
दस जनपथ सूना सूना था,समय  कटा दुःख दायी
भ्रष्टाचार हटे  जनता  ने,ऐसी मुहिम  चलायी
चिदंबरम की चल चित भयी,गयी कपिल कुटिलाई
अन्ना जी के आन्दोलन ने,सबको धूल चटायी
सभी विपक्षी एक हो गये,संसद चल ना पायी
सांसद के खरीद मुद्दे पर,अमर  जेल भिजवायी
अब चुनाव  नज़दीक आत है,जन जागृति है छायी
अब तो तुम्ही सहारा  मैया,देत न राह दिखायी
कोई लोलीपोप चुसा दो,जनता को भरमायी
सत्ता सुख भोगें राहुल को,हम पी एम बनायी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, September 13, 2011

ओरेंज काउंटी-मेरा नया घर

ओरेंज काउंटी-मेरा नया घर
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नारंगी अट्टालिकाओं को छूकर,
उगता हुआ नारंगी सूरज
विशाल तरणताल में,
जल क्रीडा करते हुए स्त्री पुरुष
गेंद को बास्केट में डाल कर,
अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का,
अभ्यास करते हुए युवक
राजनेतिक पार्टियों की तरह,
गेंद को एक दूसरे के पाले में डाल कर,
टेनिस खेलते हुए निवासी
फंवारों में उछल उछल कर,
नाचते हुए प्रमुदित बच्चे
अपने नन्हे मुन्नों को,
बल उपवन में खेलाती मातायें
धार्मिक वातावरण की खुशबू से,
महकता हुआ मंदिर
झर झर झरते हुए झरने
 हरा भरा सुरम्य वातावरण
 प्रभु ने आसमान से जब इस ,
अद्भुत आवासीय क्षेत्र को देखा तो,
प्रसन्न होकर,प्रसाद स्वरुप,
अपना एक प्रासाद ,ऊपर से गिरा दिया
जो यहाँ के निवासियों का,
मनोरंजन स्थल (क्लब) बन गया
मै,अपने विशाल बंगले की तनहाइयों को छोड़,
इस हंसती खेलती बस्ती में बस कर,
बहुत खुश हूँ
क्योंकि 'ओरेंज काउंटी'
एक सम्पूर्ण आवासीय परिसर है,
जहाँ खुशियाँ बसती है,
और जिंदगी हंसती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, September 11, 2011

विकास की आंधी

हमारा छोटा सा घर था,
और उस पर एक छोटी सी छत थी
जहाँ हम सर्दी में ,कुनकुनी धूप का आनंद उठाते थे
 तेल की मालिश कर ,
नंगे बदन को,
सूरज की गर्मी में तपाते थे
और गर्मी की चांदनी रातों में,
सफ़ेद चादरों पर
जब शीतल बयार चलती थी,
तो तन में सिहरन सी होती थी
हमारी हर रात मधुचंद्रिका सी होती थी
पर विकास की आंधी में,
हमारे घरों के आसपास ,
उग आई है,बहुमंजिली इमारते
और बदलने पड़  गयी है,हमें अपनी आदतें
बड़ी मुश्किलें वेसी खो गयी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

,

दृष्टिकोण

दृष्टिकोण
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एक बड़े बंगले में,रहते थे,
हम दो प्राणी अकेले
जैसे एक बड़े से गेरेज में पड़ी हों,
दो निरीह सी सायकिलें
तनहाइयों के साये में,
सन्नाटे हमें काटते थे
और उस बंगले में,जब डर लगता था,
हम एक दुसरे की बगलें झांकते थे
बगल के बंगले वाले,
सब रहते थे,अपने अपने में व्यस्त
कभी कभी दिखने पर,
एक खोखली सी मुस्कराहट के,
हो गये थे अभ्यस्त
बाहर सड़क पर,
आते जाते वाहनों का शोर होता था
घर के आगे की बगिया में,
हरे भरे पौधे और खिले फूलों को देख,
मन आनंद विभोर होता था
और अब हम,एक बहुमंजिली ईमारत की,
ऊपरी मंजिल पर आकर बस गए  है
और इतनी ऊँचाई पाने के बाद,
बड़े बड़े वृक्ष भी,
बौने दिखने लग गए है
सूरज  भी नीचे से उगता दिखता है
और चाँद पास से ,ज्यादा चमकीला दिखता है
नीचे सड़कों पर,रेंगते वाहनों का शोर,
सहम सहम कर हम तक आता है
और जब मन घबराता है
तो गेलरी से ,नीचे झांक लेते है
ऊपर से सब अदने नज़र आते है,
हम खुद  को इतना ऊंचा आंक लेते है
आस पास के पड़ोसियों से,
सोसायटी के फंक्शनों में,या लिफ्ट में,
हाय,हल्लो कह कर मुस्कराते है
लाफिंग क्लब में,साथ साथ हँसते हँसते,
कुछ दोस्त बन जाते है
आस पास के छोट घरों की छतों पर,
झाँकने का अधिकार हमें मिल गया है
हम आत्म गर्वित है,
हमारा दृष्टिकोण ही बदल गया है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

(यह कविता मेरे नए घर इंदिरापुरम में
शिफ्ट होने के बाद लिखी गयी है)

Thursday, September 8, 2011

देहली पोलिस उचाव

देहली पोलिस उचाव
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हम सशक्त है,हम सक्षम है
हम रात को सोते हुए,
नर नारियों और संतों पर,
रात के दो बजे भी,
लाठियां भांज सकते है
हम,सत्याग्रह पर जा रहे ,
गांधीवादी अन्नाजी को,
सुबह सबह उनके घर से,
गिरफ्तार कर,
तिहार जेल में  पहुंचा सकते है
क्योकि ये सरकार की,
भ्रष्टाचार और काले धन की ,
नीतियों के खिलाफ,
विद्रोह कर,
जनता को भड़का कर,
देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए,
खतरा बन सकते है
फिर हमें,
हमारे हजारों लाल बत्ती वाले,
नेताओं की भी सुरक्षा देखनी होती है
हम इन्ही व्यवस्थाओं में,
इतने व्यस्त रहतें है,
कि आतंकवादी गतिविधियों पर,
नज़र रखने के लिए,
हमारे पास समय बहुत कम है
इसीलिए देहली हाईकोर्ट जेसी ,
संवेदनशील जगहों पर भी,
विस्फोट हो जाते बम है
कहने को हम मे बहुत दम है
हम सशक्त है,हम सक्षम है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Wednesday, September 7, 2011

चंचला लक्ष्मी

चंचला लक्ष्मी
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आदमी की आसुरिक प्रवर्तियाँ,
और देविक  वृत्तियाँ,
जब साथ साथ मिल कर,
दुनियादारी की मथनी से,
रत्नाकर का मंथन करती हैं,
तब प्रकट होती है लक्ष्मी
लक्ष्मी,जो न देवताओं की हुई,
ना दानवों की,
इन सभी जवान चाहने वालों को छोड़,
उसने पुरुष पुरातन को चुना,
क्योंकि वो जानती  है
'ओल्ड इज गोल्ड'
और गोल्ड लक्ष्मी का ही एक रूप है
रम्भा और वारुणी,(शराब)
लक्ष्मी की सहोदर बहने है,
जिनका उपयोग,
कई समझदार लोग,
लक्ष्मी को पाने के लिए करते है
और कुछ दबंग नेता,
लक्ष्मी को पाने के लिए,
उसके भाई शंख की तरह,
अपनी बुलंद आवाज मे
भाषण बाजी करते हुए, बजते है
और लक्ष्मी के आने पर,
उसके दूसरे भाई एरावत की तरह,
मद मस्त हाथी से झूमते हुए चलते है
यह  जानते हुए भी,
की जाने कब लक्ष्मी,
अपने तीसरे भाई 'उच्चाश्रेवा'घोड़े के साथ,
तेज गति से,
कहीं भी भाग सकती है
क्योकि लक्ष्मी चंचला है,
चपला है,
गतिमान है,
अमर के घर से संसद में जा सकती है
गिरती हुई सरकार को भी बचा सकती है
उसको एक जगह बैठना,
बिलकुल पसंद नहीं ,
घूमती फिरती रहती है,
स्वीजरलेंड ,
उसकी पसंदीदा जगह है,
जहाँ की बेंकों में वो,
चैन से आराम करती है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Monday, September 5, 2011

शैतान शिष्या और टीचर

शैतान शिष्या और टीचर
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            १
परेशान टीचर हुई,शिष्या थी शैतान
बोली तुमको ठीक मै,करू  पकड़ कर कान
करू पकड़ कर कान,दूर शैतानी सारी
हफ्ते भर जो बन जाऊं मम्मी तुम्हारी
शिष्या बोली ,सच टीचर,मै तो हूँ रेडी
पर क्या ये प्रस्ताव मान जायेंगे डेडी
                २
डेडी जी  ने जब सुना,बेटी का प्रस्ताव
मुदित हुआ मन, बढ़ गया,बाँछों  का फेलाव
बाँछों का फेलाव,कहा इच्छा हो जैसी
पर तुम्हारी टीचर है दिखने में कैसी
मम्मी बोली उसको आने तो घर में
वो क्या,उसको ठीक करू मै हफ्ते भर में

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'