Friday, October 14, 2011

रावण का पुनर्जन्म

रावण का पुनर्जन्म
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रामायण की कथा ,मुझे अच्छी लगती है
राम से बेटे,
सीता सी पत्नी,
और लक्ष्मण से भाई
आज के सन्दर्भ में,ये बातें,
अविश्वसनीय तो है,
मगर एक बात आज भी सच्ची लगती है
की रावण नाभि में,अमृत कुंड था,
ये तथ्य आज भी नज़र आता है
  हम हर साल दशहरे पर रावण को मारते है
पर हर अगले दशहरे पर, 
उसका पुनर्जन्म हो जाता है
कोई कितनी ही कोशिश करे,
उसका कुछ नहीं बिगड़ सकता
ये भ्रष्टाचार का रावण है
कभी मर नहीं सकता

मदन मोहन बहेती]घोटू'

 

एक चिठ्ठी -मनमोहन सिंह जी के नाम

एक चिठ्ठी -मनमोहन सिंह जी के नाम
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आदरणीय मनमोहन सिंह जी,
सादर प्रणाम
(राम राम नहीं करूँगा ,
वर्ना आप मुझे बी जे पी का समझ लेंगे
और ये चिठ्ठी दिग्विजय सिंह को दे देंगे)
दशहरे के दिन आपको टी वी पर देखा,
रामलीला मैदान में
हाँ,उसी राम लीला मैदान में,
जहाँ आपकी सेना ने,
युद्ध के सारे नियमो का अवलंघन कर,
रात के दो बजे,
लाठी चार्ज किया था,
सोती हुई महिलाओं और साधू संतो पर
आपने मंचासीन होकर,
सोनिया जी के साथ में
धनुष बाण लेकर हाथ में
कागज के पुतले रावण पर तीर चलाया
हर साल की प्रक्रिया को दोहराया
जैसे हर साल आप पंद्रह अगस्त पर,
लाल किले पर भाषण देते हुए,
अपनी मृदुल वाणी में बतलाते है
की मंहगाई घटा देंगे
भ्रष्टाचार मिटा देंगे
पर ये दोनों बढ़ते ही जाते है
आप कुछ नहीं कर पाते है
और इसे गठबंधन की मजबूरी बताते है
वैसे ही दशहरे के दिन तीर चलाने से,
भ्रष्टाचार का रावण नहीं मर पायेगा
आपका तीर खाने को बार बार,
हर साल दशहरे को आएगा
क्योंकि उसकी महिमा प्रचंड है
आप लोगों की कृपा से,
उसकी नाभि में ,अमृत कुंड है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

सानिध्य सुख

सानिध्य सुख
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मुझे मत ऐसे निहारो,मचल जाए मन न मेरा
इन नज़र की बिजलियों से,जल न जाये बदन मेरा
कौन सी उर्जा छुपी है,तुम्हारे तन की छुवन में
फैलती विद्युत तरंगें, शिराओं में और बदन में
तुम्हारे आगोश में आ ,जोश भरता  है उछाले
होश ही रहता कहाँ है,पास में आकर  तुम्हारे
प्यार की उष्मा तुम्हारे ,इस तरह तन को तपाती
मोम सा मन पिघल जाता,जब मिलन बाती जलाती
उस मिलन की वारुणी से,मचलता मदहोश मन है
तैर कर आनंद उदधि में,बदन में आती थकन है
डूब तुम में समा कर मन,दूर हो जाता जहाँ से
इस तरह मुझको सताना,बताओ सीखा कहाँ से
रसीला,मादक बहुत है,मिलन रस का मधुर प्याला
तुम्हारे सानिध्य का सुख,बड़ा ही अद्भुत  निराला

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

रोटी मिलेगी

रोटी मिलेगी
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राहुल गांधीजी ,
आप किसी गरीब के घर जाते हो
दरवाजा खटखटाते हो
और मांगते हो ,रोटी मिलेगी
और वो गरीब परिवार
खुश होकर अपार
आपको  आलू की सब्जी पूरी खिलाता है
और धन्य हो जाता है
अगर वो ही गरीब परिवार
भूख से बेहाल
आपके घर आये
और गुहार लगाये
रोटी मिलेगी
तो सबसे पहले,
उसे आपकी सिक्युरिटी मिलेगी
फिर पोलिस वालों के  डंडे, तलाशी
थाने में इन्क्वायरी अच्छी खासी
 सुनने को बहुत खरी खोटी मिलेगी
हाँ,लोकअप में शायद,
खाने को जेल की रोटी मिलेगी

मदन मोहन  बाहेती 'घोटू'

Thursday, October 13, 2011

छोटी दुनिया-बड़ा नजरिया

छोटी  दुनिया-बड़ा नजरिया
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मैंने पूछा लिफ्ट  मेन से
ऊपर नीचे, नीचे ऊपर
बार बार आते जाते हो
लोगों को अपनी मंजिल तक,
रोज़ रोज़ तुम पंहुचाते हो
छोटे से इस कोठियारे में,
दिन भर टप्पा खाते रहते,
तुमको घुटन नहीं होती है?
लिफ्ट मेन बोला  मुस्का  कर
सर,ये तो अपनी ड्यूटी है
इससे ही रोटी मिलती है
लिफ्ट भले ही ये छोटी है,
पर इसमें दुनिया दिख जाती
हरेक सफ़र में नूतन चेहरा,
हर फेरे में नयी  खुशबूये
बार बार मेरे साथ
लिफ्ट में ऊपर नीचे जाकर
झूला झूलने का सुख पाकर
खुश होते हुए बच्चे
अचानक एक दूसरे से मिल जाने पर,
हाय, हल्लो करते हुए पडोसी
बच्चों के भरी स्कूली बेग थामती हुई
अस्त व्यस्त मातायें,
कोलेज जाने के नाम पर,
पिक्चर का प्रोग्राम बनाते हुए,
युवक युवतियां
अपने मालिक मालकिन की ,
बुराइयाँ करते हुए,
नौकर नौकरानियां
सुबह सुबह अख़बारों का बण्डल उठाकर,
दुनिया जहाँ की खबर बाँटने वाले,
न्यूज़ पेपर वेंडर
बहुओं की बुराई करती हुई सासें,
और सासों की आलोचना करती हुई बहुए
अपने पालतू कुत्ते को
पति से ज्यादा प्यार करती महिलाएं
बसों की भीड़ से उतर
पसीने में तर बतर
कुछ थके हारे पस्त चेहरे
अपनी बीबी के आगे भीगी बिल्ली बनते,
बड़े बड़े रोबीले साहेब
शोपिंग कर ढेरों बैगों का ,बोझ उठाये
थकी हुई पर प्रसन्न  महिलायें
हर बार
आती है एक नयी खुशबू की फुहार
नए नए परिधानों में
नए पुराने लोग
विभिन्न वेशभूषाएं
भिन्न भिन्न भाषाएँ
मुझको इस छोटे से घर में
हिंदुस्तान नज़र आ जाता
कभी बिछड़ों को मिलाता हूँ
कभी जुदाई के दृश्य देखता हूँ
ऊपर नीचे करते करते
मै रोज़ दुनिया के कई रंग देखता हूँ
और आप सोचते है की मुझे घुटन होती होगी
क्योंकि मै एक छोटे से डिब्बे में सिमटा हूँ
मै तो इस छोटे से डब्बे में भी,
खुश रहता हूँ, चेन से


मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

रचायें महारास ,हम तुम

आज छिटकी चांदनी है
मिलन की मधु यामिनी है
पूर्ण विकसा चन्द्रमा है
यह शरद की पूर्णिमा है
आओ आकर  पास हम तुम
रचायें महारास ,हम तुम
राधिका सी सजो सुन्दर
मै तुम्हारा कृष्ण बन कर
बांसुरी पर तान छेड़ूं
मिलन का मधुगान छेड़ूं
रूपसी तुम मदभरी सी
व्योम से उतरी परी सी
थिरकती सी पास आओ
बांह में मेरी समाओ
प्यार में खुद को भिगो कर
दीवाने मदहोश होकर
रात भर हों साथ हम तुम
रचायें महारास  हम तुम
चाँद सा आनन तुम्हारा
और नभ में चाँद प्यारा
मंद शीतल सा पवन हो
चमकता नीला गगन हो
हम दीवाने मस्त नाचें
लगे चलने गर्म साँसें
भले सब श्रिंगार बिखरे
मोतियों का  हार बिखरे
जाय कुम्हला ,फूल ,गजरा
आँख से बह चले  कजरा
तन भरे उन्माद हम तुम
रचायें महारास हम तुम

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Thursday, October 6, 2011

दशानन

दशानन
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लंकाधिपति रावण के,
दस सर थे ,पर,
पेट एक ही था
झुग्गीवाली गरीबी के रावण के  भी,
दस सर होते हैं,
मगर पेट भी दस होते है
इसीलिये,
एक राज करता था,
दूसरे रोते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'