Wednesday, November 23, 2011

मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक

मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक
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दर्द का क्या भरोसा,आ जाय जब तब
मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक
है बड़ी अनबूझ  ये जीवन पहेली
है कभी दुश्मन कभी सच्ची सहेली
बांटती खुशियाँ,कभी सबको हंसाती
कभी पीड़ा,दर्द के  आंसू रुलाती
क्या पता कब मौत आ दे जाय दस्तक
मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक
आसमां में जब घुमड़ कर मेघ छाते
नीर बरसा प्यास धरती की बुझाते
तो गिराते बिजलियाँ भी है कहीं पर
धूप,छाँव,सर्द ,गर्मी,सब यहीं पर
कौन जाने,कौन मौसम ,रहे कब तक
मनाते खुशियाँ रहो ,तुम जियो जब तक
कभी शीतल पवन जो मन को लुभाती
वही लू के थपेड़े बन है तपाती
धूप सर्दी में सुहाती बहुत मन को
वही गर्मी में जला देती बदन को
कौन का व्यहवार ,जाए बदल कब तक
मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Tuesday, November 22, 2011

मौसम में बदलाव आ गया

मौसम में बदलाव आ गया
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पहले सड़कों पर, ठेलों पर,आम भरे होते थे पीले
उनकी जगह नज़र आते है,एपल लाल लाल ,चमकीले
सोंधी सी खुशबू महकाते,ठेले गरम मूंगफली वाले
गज़क ,रेवड़ी भर कर सजते,जगह जगह स्टाल  निराले
रस में  डूबी गरम जलेबी,दिखलाती है अपना जलवा
मन को मोहित कर देता है,गरम गरम गाजर का हलवा
गोभी,आलू भरे   परांठे ,रोज रोज मन चाहे खाना
गरम गरम मक्की की रोटी,और सरसों का साग सुहाना
पीयें गरम चाय और कोफ़ी ,बार बार हम ,मन ये करता
मौसम खाने पीने वाला आया, जल्दी खाना  पचता
खुले खुले से तन को ढकते,सुन्दर शाल,कार्डिगन,स्वेटर
शाम हुई,तो आसमान को ,ढक लेती कोहरे की चादर
मन करता है तेज धूप में,,सूरज की ,बैठें,तन सेकें
और रात दुबके बिस्तर में,तन पर गरम रजाई ले के
बच्चे लिए ,उनींदी आँखें,लाद किताबों वाला बस्ता
सपना लिए बड़ा बनने का, नाप रहे स्कूल का रस्ता
थर थर थर तन काँप रहा है,कहर बहुत सर्दी ने ढाया
बिरहन जोहे  बाट पिया की,मधुर मिलन का मौसम आया
अपने प्रियतम से मिलने का,मन में मीता चाव आ गया
मौसम में बदलाव  आ गया

 

 

बदलता हुआ मौसम और तुम

बदलता हुआ मौसम और तुम
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उन दिनों आम का मौसम था,
जब गर्मी से,कुम्हला गए थे गाल तुम्हारे ,
और उनकी रंगत हो गयी थी,
आम जैसी पीली पीली और स्वर्णिम
अब सेवों का मौसम आगया है,
और अब सर्द हवाओं की छेड़छाड़ ने,
तुम्हारे गालों में भर दिया है,
गुलाबी रंग,
और अब तुम्हारे गालों की रंगत है,
सेव जैसी लाल लाल और रक्तिम
मौसमी फलों की तरह,
तुम भी रंग बदलती रहती हो,
गर्मी में गरम लू के थपेड़ों की तरह,
तो सर्दी में शीतल  हवाओं की तरह बहती हो
मेरी हमदम,
नया स्वाद और नूतन रंगत,
मौसम के संग,तुममे हर दम

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Monday, November 21, 2011

आओ मम्मी ,पापा खेलें

आओ मम्मी ,पापा खेलें
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बहुत बोर हो गए अकेले
आओ मम्मी पापा खेलें
रोज सवेरे तुम सजधज कर
बेठ कर में जाओ दफ्तर
और शाम को जब घर आओ
ब्रीफकेस भर पैसे लाओ
मै क्लब,किट्टी पार्टी जाऊं
नए नए गहने बनवाऊ
रोज घूमने बाहर जाये
पिक्चर देखें,पीजा खायें
अरे नहीं ये खेल पुराना
अब तो आया नया ज़माना
डेली ब्रीफकेस भर पैसा
है ये खेल बड़े खतरे का
बहुत खेल ये हमने खेले
आओ नेता नेता खेले
मै  नेता बन, बनू मिनिस्टर
दुनिया घूमू,तुमको लेकर
बस दो चार,डील हो जाये
कई करोड़ों ,रूपये आयें
नहीं रखेंगे पैसे घर में
पर स्विस बेंको में,डालर में
इतने पैसे जाये कमाये
अपनी सात पुश्त तर जाये
नहीं नहीं ये खेल  तुम्हारा
तो है बड़े टेंशन वाले वाला
अगर कोई स्केम खुल गया
तो  फिर सारा खेल धुल गया
टी.वी.पर बदनामी  हर दिन
  मंत्री पद से करो रिजाइन
सी.बी.आई, तंग करेगी
जेल तिहाड़ ,तुम्हे भेजेगी
ना बाबा ना ,यूं  घबराकर
तुमसे मिलने,मुंह लटकाकर
मै तिहाड़ में ना आउंगी
सबको क्या मुंह दिखलाउंगी
 इन खेलों में बड़े झमेले
आओ स्कूल स्कूल  खेलें
एंट्रेंस की तैयारी कर
करते रहें पढाई जम कर
तुम आई आई टी ,इंजिनीयर
और मै बन कर बड़ी डाक्टर
करें काम,हो नहीं टेंशन
सुख शांति से काटे जीवन
 काहे  को हम मुश्किल झेलें
आओ स्कूल स्कूल खेलें

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

 

Sunday, November 20, 2011

बढ रही है बड़ी ठिठुरन-रूमानी हो जाए हम तुम

बढ रही है बड़ी ठिठुरन-रूमानी हो जाए हम तुम
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सर्दियों  की इस सुबह में,बढ़ रही है बड़ी ठिठुरन
दुबक कर के ,रजाई में,चाय की लें ,चुस्कियां हम
शीत का है सर्द मौसम,और उस पर  घना कोहरा
और फिर ठंडी हवाएं, हो रहा है सितम दोहरा
नहीं सूरज   नज़र आता ,देख ये आलम जमीं पर
ओढ़ चादर कोहरे की,छुप गया है वो कहीं पर
देख  मौसम की रवानी,हो गया उद्दंड  पानी
रचाने को रास मिल कर,हवाओं संग,हो रूमानी
सूक्ष्म बूंदों में विभक्षित हो गया घुल मिल हवा से
और सूरज को छुपाया, देख ना ले,वो वहां से
छा रहा इतना धुंधलका,आज पंछी कम उड़े  है
देख मौसम की नजाकत,नीड़ में दुबके पड़े है
और तुम पीछे पड़ी हो,उठो,अब छोडो  रजाई
और तुम अंगड़ाई लेकर,भर रही हो ,तुम जम्हाई
आओ ना,शरमाओ ना तुम,हो गयी जो सुबह तो क्या
प्यार का है मधुर मौसम,चैन से लो,मज़ा इसका
'अजी छोडो,बुढ़ापे में,चढ़ रही मस्ती तुम्हे है
काम वाली भी अभी तक आई ना ,बर्तन पड़े है
मुझे चिंता काम की है ,और रूमानी हो रहे तुम'
सर्दियों की इस सुबह में,बढ़ रही है ,बहुत ठिठुरन

मदन मोहन बहेती'घोटू'

Saturday, November 19, 2011

माँ के सपनो में बसा-गाँव का पुराना घर

माँ के सपनो में बसा-गाँव का  पुराना घर
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मिनिट मिनिट में सारी बातें,माँ अब भूल भूल जाती है
लेकिन उसे पुराने घर की, यादें बार बार आती है
दूर गाँव में कच्चा घर था
फिर भी कितना अच्छा घर था
लीप पोत कर उसे सजाती
माटी की खुशबू थी आती
और कबेलू  वाली छत थी
बारिश में जो कभी टपकती
सच्चा  प्यार वहां पलता था
मिटटी का चूल्हा जलता था
लकड़ी और कंडे जलते थे
राखी से बर्तन मंजते थे
दल भरतिये में थी गलती
अंगारों पर रोटी सिकती
खाने को बिछता था पाटा
घट्टी से पिसता था आटा
शाम ढले फिर दिया बत्ती
चिमनी,लालटेन थी जलती
 सभी काम खुद ही करते थे
कुंए से पानी भरते थे
पीट धोवना,कपडे धुलते
बच्चे सब जाते स्कूल थे
बाबूजी    ऑफिस  जाते  थे
संझा को सब्जी लाते थे
कभी पपीता कभी सिंघाड़े
खाते थे मिल कर के सारे
ना था टी वी,ना ट्रांजिस्टर
बातें करते साथ बैठ कर
बच्चे सुना पहाड़े  रटते
होम वर्क बस ये ही करते
सुन्दर और सादगी वाला
वो जीवन था बड़ा निराला
चलता रहा समय का चक्कर
और हुआ पक्का,कच्चा घर
बिजली आई,नल भी आये
ट्रांजिस्टर,टी.वी. भी लाये
वक़्त लगा फिर आगे बढ़ने
बेटे गए नौकरी करने
और बेटियां गयी सासरे
नहीं कोई भी रहा पास रे
बस माँ थी और बाबूजी थे
संग थे दोनों,बड़े सुखी थे
लेकिन लगा वक़्त का झटका
छोड़ साथ,माँ का,हम सब का
बाबूजी थे स्वर्ग  सिधारे
और हो गया घर सूना रे
जहाँ कभी थी रेला पेली
बूढी  माँ,रह गयी अकेली
बेटे उसे साथ ले आये
पर उस घर की याद सताए
पूरा जीवन जहाँ गुजारा
ईंट ईंट चुन जिसे संवारा
बाबूजी संग ,हँसते गाते
जिसमे बसी हुई है यादे
सूना पड़ा हुआ है वो घर
पर माँ का मन अटका उस पर
और  अब माँ बीमार पड़ी है
लेकिन जिद पर रहे अड़ी है
एक बार जा,वो घर देखूं,आंसू बार बार लाती है
वो यादें,वो बीत गए दिन,बिलकुल भूल नहीं पाती है
मिनिट मिनिट में सारी बातें,माँ अब भूल भूल जाती है
लेकिन उसे पुराने घर की,यादें बार बार आती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, November 18, 2011

ख्वाब सुनहरे

ख्वाब सुनहरे
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एश्वर्या सुन्दर बहुत,चेहरे पर है आब
विश्व सुंदरी  का मिला था जब उसे खिताब
था जब उसे खताब,आपको क्या बतलाऊ
मन में आया ख्वाब,गले से उसे लगाऊ
लेकिन ब्याह रचाया उसने ,हुई पराई
ख़ुशी हुई जब उसके घर में बेटी आई
                   २
बेटी हिरोईन बने,बीस बरस के बाद
और मेरा पोता बने,हीरो उसके साथ
हीरो उसके साथ,प्यार उनमे हो जाये
फिर  वो दोनों मिले जुले और ब्याह रचाये
हो सपने  साकार,बहुत रोमांचत है मन
लगे लगाऊ,एश्वर्या हो मेरी समधन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'