Saturday, December 3, 2011

जैसे जैसे दिन ढलता है------

जैसे जैसे दिन ढलता है------
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जैसे जैसे दिन ढलता है ,परछाई लम्बी होती है
जब दीपक बुझने को होता,बढ़ जाती उसकी ज्योति है
सूरज जब उगता या ढलता,
                            उसमे होती है शीतलता
इसीलिए वो खुद से ज्यादा,
                             साये को है लम्बा करता
और जब सूरज सर पर चढ़ता,
                              उसका अहम् बहुत बढ़ता है
दोपहरी के प्रखर तेज के,
                               भय से  साया भी  डरता है
परछाई बेबस होती  है,और डर कर  छोटी होती है
जैसे जैसे दिन ढलता है,परछाई लम्बी होती है
आसमान में ऊँची उड़ कर,
                               कई पतंगें इठलाती है
मगर डोर है हाथ और के,
                            वो ये बात भूल  जाती है
उनके  इतने ऊपर उठने ,
                            में कितना सहयोग हवा का
जब तक मौसम मेहरबान है,
                            लहराती है विजय पताका
कब रुख बदले हवा,जाय गिर,इसकी सुधि नहीं होती है
जैसे जैसे दिन ढलता है,परछाई लम्बी होती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, December 2, 2011

औरतें ,फूल जैसी होती है

औरतें ,फूल जैसी होती है
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औरतें फूलों की तरह होती है,
कभी जूही सी नाजुक,
कभी चमेली सी अलबेली,
कभी मोगरे सी मादक,
कभी गेंदे सी गठीली,
कभी गुलाब की रंगत लिए महकती,
मगर  कांटे वाली डालियों पर पलती,
सबकी अपनी अपनी खुशबू होती है
और जब शबाब पर होती है,
मादक महक फैलाती है
सबको लुभाती है
पर जब किसी देवता पर चढ़ जाती है
तो  सूरजमुखी की तरह,
सिर्फ अपने उसी देव,
सूरज को निहारती है
उसी पर सारा प्यार बरसाती है
और अपने बीजों को,
स्निग्धता से सरसाती है
और फिर बड़ी होकर,
गोभी के फूल की तरह,
सिर्फ खाने पकाने के काम में आती है
पहले भी फूल थी,
और फूल अब भी कहलाती है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Wednesday, November 30, 2011

तो समझ लो आ गयी है सर्दियाँ

तो समझ लो आ गयी है सर्दियाँ
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बदन ठिठुराती हवा चलने लगे
और सूरज जल्द ही ढलने  लगे
छुओ पानी,तो बदन गलने  लगे
प्रियतमा की जुदाई  खलने लगे
वक़्त की रफ़्तार कुछ थमने लगे
तेल नारियल का अगर  जमने लगे
शाम होते धुंधलका छाने लगे
कोहरा भी कहर  बरपाने लगे
ठण्ड बाहर निकलना मुश्किल करे
रजाई में दुबकने को दिल करे
मन करे,लें जलेबी का जायका
साथ में हो गरम प्याला चाय का
गर्म तलते पकोड़े,ललचाये मन
गाजरों का गर्म हलवा खायें हम
शाल ,स्वेटर से सुनहरा तन ढके
धूप में तन सेकना अच्छा  लगे
तेल की मालिश कराओ  लेट कर
मुंगफलियाँ गरम खाओ, सेक कर
लगे जलने गर्म हीटर,सिगड़ीयां
तो समझ लो,आ गयी है सर्दियाँ

मदन मोहन बहेती'घोटू'

मै-घोटू

मै-घोटू
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घोटू हूँ,घोट मोट ,घोट घोट खूब पढ़ा ,
      बड़ा हुआ,घाट घाट का पिया  पानी है
प्रेम किया घट घट से,गौरी के घूंघट से,
       घूँट घूँट रस पीकर, काटी   जवानी है
घटी कई घटनायें,पर घुटने ना टेके,
       कभी लाभ  कभी घाटा,ये ही जिंदगानी है   
घाटा बढ़ा कद मेरा,घुटन ने भी आ घेरा,
      घुट घुट कर जिंदगानी ,यूं ही  बितानी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, November 28, 2011

विरोधाभास

विरोधाभास
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तैलीय पदार्थ,जैसे अखरोट,तिल,आदि,
और तले हुए नमकीन,
जब पुराने पड़ जाते है,
उन पर तेल चढ़ जाता है
उनका स्वाद बिगड़ जाता है
कोई नहीं खाता है 
इसके विपरीत,
जब किसी की शादी होती है,
तो एसा रिवाज है,
कि शादी के पहले,
दूल्हा या दुल्हन पर तेल चढ़ाया जाता है
कहते है कि एसा करने पर,
उनके रूप में निखार आता है
पर ये विरोधाभास है,
जो मेरी समझ में नहीं आता है

घोटू

Sunday, November 27, 2011

याद आती है हमें वो सर्दियाँ....

याद आती है हमें वो सर्दियाँ....
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गर्म गुड के गुलगुलों के दिन गये
बाजरे के  खीचडों  के  दिन गये
अब तो पिज़ा और नूडल चाहिये,
हाथ वाले  सिवैयों के   दिन गये
सर्दियों में आजकल हीटर जलें,
संग तपते अलावों के दिन गये
तीज और त्योंहार पर होटल चले,
पूरी  ,पुआ ,पुलाओं के  दिन गये
बिना चुपड़ी तवे की दो चपाती,
आलुओं के परांठों के दिन गये
गरम रस की खीर या फिर लापसी,
उँगलियों से चाटने के दिन गये
बैठ छत पर तेल की मालिश करे,
धूप में तन तापने के दिन गये
बढ न क्लोरोस्टाल जाये,डर कर इसलिए,
जलेबियाँ उड़ाने के दिन गये
गरम हलवा गाजरों का याद है,
रेवड़ियाँ चबाने के दिन गये
धूप  खाती थी पड़ोसन छतों पर,
उनसे नज़रें मिलाने के दिन गये
याद आती है हमें वो सर्दियाँ,
वो मज़ा अब उड़ाने के दिन गये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ग़ज़ल -- तकियों के क्या करें दोस्ती.......

         ग़ज़ल
तकियों के क्या करें दोस्ती.......
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तकियों से क्या करें दोस्ती,आये पास सुला देतें है
शीशे के प्याले अच्छे है,भर कर जाम,पिला देते है
बहुत मुश्किलें,जीवनपथ पर,पत्थर,कंकर है,कांटे है,
पर जूते है सच्चे साथी,रास्ता पार करा देते है
एक बार जो तप जाए तो,बहुत उबाल दूध में आता,
लेकिन चंद दही के कतरे,सारा दूध जमा देते है
अरे इश्क करने वालों का,ये तो है दस्तूर पुराना,
मालुम है कलाई थामेंगे,बस ऊँगली पकड़ा देते है
दो बुल (bull )अगर प्यार से मिलते,बन जाते नाज़ुक बुलबुल से,
चार प्यार के बोल तुम्हारे,पत्थर भी पिघला देते है
सुना केंकड़ों की बस्ती में,यदि कोई ऊपर उठता है,
कई केंकड़े टांग खींच कर,नीचे उसे गिरा देते है
मारो अगर  किसी हस्ती को,पब्लिक में जूता या थप्पड़,
ब्रेकिंग न्यूज़ ,मिडिया वाले,हीरो तुम्हे बना देते है
यही नियम होता प्रकृति का,कि चिड़िया के बच्चे बढ़  कर ,
उड़ना  सीख,अधिकतर देखा,अपना नीड़ बना लेते है
सुनते धरम,दान,पूजा से,अगला जनम सुधर जाएगा,
इस चक्कर में कई लोग ये,जीवन यूं ही गवां देते है
जीवन चुस्की एक बरफ की,समझदार कुछ खाने वाले,
चूस चूस कर,घूँट घूँट कर,इसका बड़ा मज़ा लेते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'