Sunday, March 11, 2012

मै तुम्हारा प्रीतम हूँ

मै तुम्हारा प्रीतम हूँ

तुम तो मेरी प्रेम सुधा हो,मै तुम्हारा प्रीतम हूँ


तुम मधुबाला ,मै मधु प्रेमी,तुम रसवंती,मै प्याला

मै हूँ भ्रमर ,कली तुम खिलती,प्रेमभरी मै मधुशाला
तुम वीणा के तार बजाती,मै तुम्हारी सरगम हूँ
तुम तो मेरी प्रेमसुधा हो, मै तुम्हारा प्रीतम हूँ
तुम गंगा सी कल कल करती,उज्जवल,चंचल,जलधारा
लहरें उठा बुलाता तुमको,मै तो हूँ सागर खारा
हम तुम खोते इक दूजे में,मै तो वो ही संगम हूँ
तुम तो मेरी प्रेमसुधा हो,मै तुम्हारा प्रीतम हूँ
मै हूँ धूप भरी दोपहरी,शीतल ,मधुर,चांदनी तुम
तुम्हारी धुन पर मै नाचूं,ऐसी मधुर  रागिनी तुम
तुम सुख देता मधुर मिलन हो,मै प्यारा आलिंगन हूँ
तुम तो मेरी  प्रेमसुधा हूँ,मै तुम्हारा प्रीतम  हूँ

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

तुम बदली पर प्यार न बदला

तुम बदली पर प्यार न बदला

घटाओं से बाल काले आज  श्वेताम्बर  हुए  है

गाल चिकने गुलाबी पर झुर्रियां,सल पड़ गए है
हिरणी से नयन तुम्हारे, कभी  बिजली गिराते
चमक  धुंधली पड़ी ऐसी,छुप रहे ,चश्मा चढाते
और ये गर्दन तुम्हारी,जो कभी थी मोरनी सी
आक्रमण से उम्र के अब ,हुई द्विमांसल घनी सी
मोतियों सी दन्त लड़ी के,टूट कुछ मोती गये है
क्षीरसर में खिले थे जो वो कमल  कुम्हला गये है
कमर जो कमनीय सी थी,बन गयी है आज कमरा
पेट भी अब फूल कर के,लटकता है बना  दोहरा
पैर  थे स्तम्भ कदली के हुए अब हस्ती पग है
अब मटकती चाल का,अंदाज भी थोडा अलग है
शरबती काया तुम्हारी,सलवती अब हो गयी है
प्यार का लेकिन खजाना,लबालब वो का वही है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

दिल्ली -वाणी

दिल्ली -वाणी

गया मौसम चुनावों का,सर्दियाँ हो गयी कम है

कट गया माया का पत्ता, हुई सत्ता मुलायम है
चैन की ली सांस सबने,लोग थोडा मुस्कराये
फाग आया,जिंदगी में,रंग होली ने  लगाये
देख लोगों को विहँसता, केंद्र से आवाज़ आई
पांच रूपया ,पेट्रोल के ,दाम बढ़ने को है भाई
झेल भी लोगे  इसे तुम,भूल कर के मुस्कराना
याद रखना ,पांच दिन में,बजट भी है हमें लाना
बोझ मंहगाई का इतना,हम सभी पर लाद देंगे
किया तुमने दुखी हमको,दुखी हम तुमको  करेंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, March 9, 2012

हिरण्यगर्भा सत्ता

हिरण्यगर्भा  सत्ता

है हिरण्य गर्भा ये सत्ता,कितने ही नेता हिरणाक्ष

कैसे करें स्वर्ण का दोहन,हरदम रहती इस पर आँख
कुछ हिरण्यकश्यप के जैसे,सत्तामद में रहते चूर
कुछ प्रहलाद ,सत्य के प्रेमी,पाते  पीड़ायें भरपूर
ईर्ष्या बनी होलिका बैठी ,गोदी में लेकर प्रहलाद
खुद जल गयी,जला ना पायी,सत्य सदा  रहता आबाद

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सुनो भागवत है क्या कहती

सुनो भागवत  है क्या कहती

मुझे दिला दो,स्वर्णाभूषण,तुम हरदम जिद करती रहती

                                       सुनो ,भागवत है क्या कहती
कलयुग आया था धरती  पर,बैठ परीक्षित स्वर्ण मुकुट पर
उसको ये वरदान प्राप्त है, उसका वास,  स्वर्ण के अन्दर
और तुम पीछे पड़ी हुई हो, तुमको स्वर्णाभूषण लादूं
पागल हूँ क्या,जो कलयुग को,गले तुम्हारे से लिपटा दूं
और यूं भी सोना मंहगा है,दाम चढ़ें है आसमान पर
गहनों की क्या जरुरत तुमको,तुम खुद ही हो इतनी सुन्दर
सोने का ही चाव अगर है,हम तुम साथ साथ  सो लेगे
स्वर्ण हार ना,बाहुपाश का,हार तुम्हे हम पहना देंगे
पर मै इतना  मूर्ख नहीं  जो ,घर में कलयुग आने दूंगा
स्वर्ण तुम्हे ना दिलवाऊंगा,ना ही तुमको लाने दूंगा
प्यार तुम्हारा,सच्चा गहना, तुम हो मेरे  दिल में रहती
                                      सुनो भागवत है क्या कहती

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुटर -गूं

 गुटर -गूं

आओ हम तुम साथ मिल कर ,करें आपस में गुटर-गूं


गर्दनो को पास लाकर,एक दूजे से सटा कर

मै उडूं,फिर लौट आऊँ,पंख अपने फडफडा कर
चोंच में भर लाऊं दाना,और तुम्हारी चोंच में दूं
आओ हम तुम ,साथ मिल कर,करें आपस में गुटर-गूं
कोई हमको देखता है,तो हमें क्या,देखने दो
प्यार रत हम युगल प्रेमी,प्यार में बस डूबने दो
गोल आँखे,घुमा कर के,तुम मुझे,मै तुम्हे देखूं
आओ हम तुम युगल प्रेमी,करें आपस में गुटर-गूं
पास बैठें,हम सिमट कर,कभी थोड़े दूर  हट कर
एक दूजे को समर्पित,एक दूजे से लिपट कर
अंग से अपने लगा कर, पूर्ण मन की चाह कर लूं
आओ हम तुम साथ मिल कर,करें आपस में गुटर -गूं

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

आओ हम होली मनाये

आओ हम होली मनाये

मेट कर मन की कलुषता,प्यार की गंगा बहाये

                        आओ हम होली  मनाये
अहम् का  जब हिरनकश्यप,प्रबल हो उत्पात करता
सत्य का प्रहलाद उसकी कोशिशों से नहीं मरता
और ईर्ष्या, होलिका सी,गोद में   प्रहलाद लेकर
चाहती उसको जलाना,मगर जाती है स्वयं  जल
शाश्वत सच ,ये कथा है,सत्य कल थी,आज भी है
लाख कोशिश असुर कर ले,जीतता प्रहलाद  ही है
सत्य की इस जीत की आल्हाद को ऐसे मनाये
द्वेष सारा,क्लेश सारा, होलिका में हम जलायें
भीग जायें, तर बतर हो ,रंग में अनुराग के हम
मस्तियों में डूब जाये, गीत गायें ,फाग के हम
प्यार की फसलें उगा,नव अन्न को हम भून खायें
हाथ में गुलाल  लेकर ,एक दूजे   को     लगायें
गले मिल कर,हँसे खिलकर,ख़ुशी के हम गीत गाये
                                आओ हम होली मनाये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'