भावनाए मेरी भी समझा करो तुम
मै समझता हूँ तुम्हारी भावनाएं,
भावनाएं मेरी भी समझा करो तुम
चाहती हो तुम कि मै तुमको सराहूं
तुम्हारे सौन्दर्य में, मै डूब जाऊं
तुम्हारी तारीफ़ हरदम रहूँ करता,
प्रेम में रत,मै तुम्हारे गीत गाऊँ
मै समझता हूँ तुम्हारी कामनाएं,
कामनाएं मेरी भी समझ करो तुम
कर दिया है,जब सभी कुछ तुम्हे अर्पण
प्यार क्यों प्रतिकार में मांगे समर्पण
एक दूजे के बने हम परिपूरक,
एक दूजे कि प्रतिच्छवी ,बने दर्पण
मै महकता हूँ तुम्हारी सुगंधी से,
गंध से मेरी कभी महका करो तुम
मै उमड़ता भाव हूँ,तुम हो कविता
और शीतल चन्द्रमा तुम,मै सविता
कलकलाती बह रही ,आतुर मिलन को,
प्यार का मै हूँ समंदर,तुम सरिता
जिस तरह मै चहकता हूँ तुम्हे लख कर,
देख मुझको भी कभी चहका करो तुम
मै समझता हूँ तुम्हारी भावनाए,
भावनाएं मेरी भी समझा करो तुम
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Thursday, April 12, 2012
Wednesday, April 11, 2012
रखो ख्याल तुम बुजुर्गों का
रखो ख्याल तुम बुजुर्गों का
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उठालो फायदा जी भर के तुम बुजुर्गों का
ये तो हैं,एक समन्दर भरा ,तजुर्बों का
प्रेम से जब भी उसमे डुबकियाँ लगाओगे
थोड़े गहरे से ही ,मोती को ढूंढ लाओगे
मिला है साया बुजुर्गों का बड़ी किस्मत से
खजाना भरलो उनकी दुआओं की दौलत से
बड़ी तकदीर से ही साथ मिलता है इनका
इनका साया ओ सर पे साथ मिलता है इनका
ये खुशनसीबी है कि तुमको मिला है मौका
करो सन्मान,रखो ख्याल तुम बुजुर्गों का
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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उठालो फायदा जी भर के तुम बुजुर्गों का
ये तो हैं,एक समन्दर भरा ,तजुर्बों का
प्रेम से जब भी उसमे डुबकियाँ लगाओगे
थोड़े गहरे से ही ,मोती को ढूंढ लाओगे
मिला है साया बुजुर्गों का बड़ी किस्मत से
खजाना भरलो उनकी दुआओं की दौलत से
बड़ी तकदीर से ही साथ मिलता है इनका
इनका साया ओ सर पे साथ मिलता है इनका
ये खुशनसीबी है कि तुमको मिला है मौका
करो सन्मान,रखो ख्याल तुम बुजुर्गों का
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
बूढी सत्ता
बूढी सत्ता
हमारे देश की है लाचारी
बूढ़े है अधिकतर सत्ताधारी
बड़ी कमजोर इनकी सेहत है
एनीमिक,खून की जरूरत है
इसलिए एसा बजट है बनता
प्रेम से खून चुसाए जनता
स्वर्ण पर टैक्स ये लगाते है
आजकल स्वर्ण भस्म खाते है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
हमारे देश की है लाचारी
बूढ़े है अधिकतर सत्ताधारी
बड़ी कमजोर इनकी सेहत है
एनीमिक,खून की जरूरत है
इसलिए एसा बजट है बनता
प्रेम से खून चुसाए जनता
स्वर्ण पर टैक्स ये लगाते है
आजकल स्वर्ण भस्म खाते है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
किसी से प्यार करो तो जानो
किसी से प्यार करो तो जानो
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नशा कितना किसी की चाहत में,
किसी से प्यार करो तो जानो
मज़ा क्या रूठने, मनाने में,
कभी मनुहार करो तो जानो
तुम्हारी 'ना' से टूट जाता दिल,
कभी इनकार करो तो जानो
कैसे पत्थर भी पिघल जातें है,
कभी इसरार करो,तो जानो
अहमियत वादों की क्या होती है,
कभी इकरार करो तो जानो
रास्ता दिल का कितना टेढ़ा है,
निगाहें चार करो तो जानो
तुम्हे जो चाहता है उस दिल को,
कभी गुलजार करो तो जानो
दिया है दिल तो जां भी दे देंगे,
कभी एतबार करो,तो जानो
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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नशा कितना किसी की चाहत में,
किसी से प्यार करो तो जानो
मज़ा क्या रूठने, मनाने में,
कभी मनुहार करो तो जानो
तुम्हारी 'ना' से टूट जाता दिल,
कभी इनकार करो तो जानो
कैसे पत्थर भी पिघल जातें है,
कभी इसरार करो,तो जानो
अहमियत वादों की क्या होती है,
कभी इकरार करो तो जानो
रास्ता दिल का कितना टेढ़ा है,
निगाहें चार करो तो जानो
तुम्हे जो चाहता है उस दिल को,
कभी गुलजार करो तो जानो
दिया है दिल तो जां भी दे देंगे,
कभी एतबार करो,तो जानो
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
खाते पीते नेता
खाते पीते नेता
देश के प्रेम की बातें हमें सिखाते है
छेदते है उसी थाली को,जहाँ खाते है
ये जो नेताजी,सीधे सादे से दिखाते है
बड़े खाऊ है,खूब रिश्वतें ये खाते है
है बिकाऊ,बड़े मंहगे में बिकाते है
हमने पूछा कि आप इतना पैसा खाते है
फिर भी क्यों आप सदा भूखे ही दिखाते है
छुपा के ये कमाई,कहाँ पर रखाते है
हमारी बात सुन,नेताजी मुस्कराते है
अजी हमारे स्विस कि बेंकों में खाते है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
देश के प्रेम की बातें हमें सिखाते है
छेदते है उसी थाली को,जहाँ खाते है
ये जो नेताजी,सीधे सादे से दिखाते है
बड़े खाऊ है,खूब रिश्वतें ये खाते है
है बिकाऊ,बड़े मंहगे में बिकाते है
हमने पूछा कि आप इतना पैसा खाते है
फिर भी क्यों आप सदा भूखे ही दिखाते है
छुपा के ये कमाई,कहाँ पर रखाते है
हमारी बात सुन,नेताजी मुस्कराते है
अजी हमारे स्विस कि बेंकों में खाते है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Monday, April 9, 2012
अहमियत-बीबी की
अहमियत-बीबी की
सुबह उठ कर पत्नी को पुकारते है,सुनो चाय लाओ
थोड़ी देर बाद फिर आवाज़,सुनो नाश्ता बनाओ
क्या बात है ,आज अभी तक अखबार नहीं आया है
जरा देखो तो ,किसी ने दरवाजा खटखटाया है
अरे आज बाथरूम में ,साबुन नहीं है क्या
और देखो तो,कितना गीला पड़ा है तौलिया
अरे ,ये शर्ट का बटन टूटा है, जरा लगा दो
और मेरे मौजे कहाँ है,जरा ढूंढ के ला दो
लंच के डब्बे में बनाये है ना,आलू के परांठे
दो ज्यादा रख देना,मिस जूली को है भाते
देखो अलमारी पर कितनी धुल जमी पड़ी है
लगता है कई दिनों से डस्टिंग नहीं की है
गमले में पौधे सूख रहे है,क्या पानी नहीं डालती हो
दिन भर करती ही क्या हो बस गप्पे मारती हो
शाम को डोसा खाने का मूड है,बना देना
बच्चों की परीक्षाये आ रही है,पढ़ा देना
सुबह से शाम तक कर फरमाईशें नचाते है
चैन से सोने भी नहीं देते,सताते है
दिनभर में बीबीयाँ कितना काम करती है
ये तब मालूम पड़ता है जब वो बीमार पड़ती है
एक दिन में घर अस्त व्यस्त हो जाता है
रोज का सारा रूटीन ही ध्वस्त हो जाता है
आटे दाल का सब भाव पता पड़ जाता
बीबी की अहमियत क्या है ,ये पता चल जाता
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
सुबह उठ कर पत्नी को पुकारते है,सुनो चाय लाओ
थोड़ी देर बाद फिर आवाज़,सुनो नाश्ता बनाओ
क्या बात है ,आज अभी तक अखबार नहीं आया है
जरा देखो तो ,किसी ने दरवाजा खटखटाया है
अरे आज बाथरूम में ,साबुन नहीं है क्या
और देखो तो,कितना गीला पड़ा है तौलिया
अरे ,ये शर्ट का बटन टूटा है, जरा लगा दो
और मेरे मौजे कहाँ है,जरा ढूंढ के ला दो
लंच के डब्बे में बनाये है ना,आलू के परांठे
दो ज्यादा रख देना,मिस जूली को है भाते
देखो अलमारी पर कितनी धुल जमी पड़ी है
लगता है कई दिनों से डस्टिंग नहीं की है
गमले में पौधे सूख रहे है,क्या पानी नहीं डालती हो
दिन भर करती ही क्या हो बस गप्पे मारती हो
शाम को डोसा खाने का मूड है,बना देना
बच्चों की परीक्षाये आ रही है,पढ़ा देना
सुबह से शाम तक कर फरमाईशें नचाते है
चैन से सोने भी नहीं देते,सताते है
दिनभर में बीबीयाँ कितना काम करती है
ये तब मालूम पड़ता है जब वो बीमार पड़ती है
एक दिन में घर अस्त व्यस्त हो जाता है
रोज का सारा रूटीन ही ध्वस्त हो जाता है
आटे दाल का सब भाव पता पड़ जाता
बीबी की अहमियत क्या है ,ये पता चल जाता
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
कारण -गरमी का
कारण -गरमी का
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चार छुट्टियाँ मिलाती,मर्दों को महीने में
औरतें अधिकतर ही ,छुट्टियाँ मनाती है
तारे भी कई बार ,तड़ी मार देतें है,
अमावास को चंदा की भी छुट्टी आती है
चार माह बरसते है ,बरस भर में बदल कुल,
और हवा अक्सर ही ,छुट्टी कर जाती है
काम बिना छुट्टी कर,सूरज जब मन ही मन,
जलता है ,तो किरणों में ,फिर गरमी आती है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
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