Tuesday, May 29, 2012

अपना अपना नजरिया

    अपना अपना नजरिया
एक बच्चा कर में जा रहा था
एक बच्चा साईकिल चला रहा था
साईकिल वाले बच्चे ने सोचा,
           देखो इसका कितना मज़ा है
            कितना सजा धजा है
            न धूल है,न गर्मी का डर है 
               नहीं मारने पड़ते पैडल है
    क्या आराम से जी रहा है
कार वाले लड़के ने सोचा,
            मै कार के अन्दर  हूँ बंद
            मगर इस पर नहीं कोई प्रतिबन्ध
            जिधर चाहता है ,उधर जाता है
            अपने रास्ते खुद बनाता  है
  कितने मज़े से जी रहा है
दोनों की भावनायें जान,
ऊपरवाला  मुस्कराता है
कोई भी अपने हाल से संतुष्ट नहीं है,
दूसरों की थाली में,
ज्यादा ही घी नज़र आता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, May 25, 2012

विसंगति

    विसंगति

एक बच्ची के कन्धों पर,

                  स्कूल के कंधे  का बोझ है
एक बच्ची घर के लिए,
                  पानी भर कर लाती रोज है
एक को ब्रेड,बटर,जाम,
                      खाने में भी है नखरे
एक को मुश्किल से मिलते है,
                       बासी रोटी  के टुकड़े
एक को गरम कोट पहन कर
                        भी   सर्दी  लगती है 
एक अपनी फटी हुई  फ्राक में
                          भी ठिठुरती   है
एक के बाल सजे,संवरे,
                         चमकीले  चिकने है
एक के केश सूखे,बिखरे,
                         घोंसले  से बने  है
एक के चेहरे पर गरूर है,
                        एक में भोलापन है
इसका भी बचपन है,
                       उसका भी बचपन है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

संयम- दो कविताये

       संयम- दो कविताये
                   1
               चिक
मेरे शयनकक्ष में,रोज धूप आती थी सर्दी  में सुहाती थी
गर्मी में सताती थी
अब मैंने एक चिक लगवाली है और धूप से मनचाही निज़ात पा ली है
समय के अनुरूप
वासना की धूप
जब मेरे संयम की चिक की दीवार से टकराती है
कभी हार जाती है
कभी जीत  जाती है
                      २
         तकिया
जिसको सिरहाने रख कर के,
                           मीठी नींद कभी आती थी
जिसको बाहों में भर कर के
                         ,रात विरह की कट जाती थी
कोमल तन गुदगुदा रेशमी,
                        बाहुपाश में सुख देता था
जैसे चाहो,वैसे खेलो,
                         मौन सभी कुछ सह लेता था
वो तकिया भी ,साथ उमर के,
                        जो गुल था,अब खार  बन गया
बीच हमारे और तुम्हारे,
                           संयम की दीवार   बन गया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

Thursday, May 24, 2012

चिक

चिक
मेरे शयनकक्ष में,रोज धूप आती थी
सर्दी  में सुहाती थी
गर्मी में सताती थी
अब मैंने एक चिक लगवाली है
और धूप से मनचाही निज़ात पा ली है
समय के अनुरूप
वासना की धूप
जब मेरे संयम की चिक की दीवार से टकराती है
कभी हार जाती है
कभी जीत  जाती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, May 23, 2012

गाँव का वो घर-वो गर्मी की छुट्टी

 गाँव का वो घर-वो गर्मी की छुट्टी
          
मुझे याद आता है,गाँव का वो घर,
                        वो गर्मी की रातें, वो बचपन सलोना
ठंडी सी  छत पर,बिछा  कर के बिस्तर,
                       खुली चांदनी में,पसर कर के सोना
ढले दिन और नीड़ों में लौटे परिंदे,
                        एक एक कर उन सारों को गिनना
पड़े  रात तारे ,लगे जब निकलने,
                        तो नज़रे घुमा के,  उन सारों को गिनना
भीगा   बाल्टी में, भरे आम ठन्डे,
                         ले ले के चस्के,  उन्हें चूसना    फिर
एक दूसरे को पहाड़े सुनाना,
                          पहेली  बताना,  उन्हें  बूझना   फिर
जामुन के पेड़ो पे चढ़ कर के जामुन,
                           पकी ढूंढना  और  खाना  मज़े से
करोंदे की झाड़ी से ,चुनना करोंदे,
                           पकी खिरनी चुन चुन के लाना  मज़े से
अम्बुआ की डाली पे,कोयल की कूहू,
                           की करना नक़ल और चिल्ला के गाना
,कच्ची सी अमियायें ,पेड़ों पर चढ़ कर,
                           चटकारे ले ले के,मस्ती में    खाना
चूल्हे में लकड़ी  और कंडे जला कर,
                             गरम रोटियां जब खिलाती थी अम्मा
कभी लड्डू मठरी,कभी सेव पपड़ी,
                              कभी ठंडा शरबत   पिलाती थी अम्मा
 कभी चोकड़ी ताश की मिल ज़माना,
                             कभी सूनी सड़कों पे लट्टू  घुमाना
भुलाये  भी मुझको नहीं भूलती  है,
                              वो गर्मी की छुट्टी, वो  बचपन सुहाना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'         

  


Sunday, May 20, 2012

देश की कुंडली

       देश की कुंडली
एक तरफ तो भ्रष्ट सारी मंडली है
और दूजी तरफ भज भज मंडली है
क्या नहीं विकल्प कोई तीसरा है,
किस तरह की  देश की ये  कुंडली है
यहाँ पर सियार  है,सारे  रंगे है
लूटने में , देश को, मिल कर लगे है
कोई भी एसा  नज़र आता नहीं है
लुटेरों से जिसका कुछ नाता नहीं है
किस तरह से पेट भर पाएगी जनता,
जो भी रोटी उठाते है,वो जली है
किस तरह की देश की ये कुंडली  है
हर तरफ है,भ्रष्टता का बोलबाला
लक्ष्मी ,स्विस बेंक में ,मुंह करे काला
बढ़ रही मंहगाई अब सुरसा मुखी है
परेशां ,लाचार सी जनता दुखी  है
कहाँ जाए,रास्ता दिखता नहीं है,
आज  काँटों से भरी ,हर एक गली है
किस तरह की ,देश की ये कुंडली है
सह रहे क्यों,इस तरह,ये मार है हम
पंगु क्यों है,हुए क्यों लाचार  है हम
क्यों हमारा खून ठंडा  पड़ गया  है
आत्म का सन्मान क्यों कर मर गया है
फूटना ज्वालामुखी का है सुनिश्चित,
लगी होने धरा में कुछ खलबली  है
किस तरह की देश की ये कुंडली है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, May 19, 2012

सबसे बड़ा अजूबा

     सबसे बड़ा अजूबा
खुदा की खुदाई से,
खुदा के बन्दों ने,कुछ पत्थर खोद निकाले
और अपनी मृत काया को सुरक्षित रखने को,
विशालकाय पिरेमिड बना  डाले
और ये पिरेमिड आज एक अजूबा है
अपनी संगेमरमर सी सुन्दर बेगम की याद में,
एक बादशाह ने,धरती की कोख से,निकले संगेमरमर
और लगा दिए कब्रगाह में,बना दिया ताजमहल
और ये ताजमहल आज एक अजूबा है
और चीन के शासकों ने,
सुरक्षित रखने को अपनी सीमायें
धरती के सीने से,कितने ही पत्थर खुदवाये
और बना डाली एक लम्बी चौड़ी दीवार
जिसे कोई भी न कर सके पार
ये चीन  की दीवार भी आज एक अजूबा है
इसी तरह ब्राजील में,पहाड़ की चोंटी पर,
हाथ फैलाए क्राइस्ट का पुतला,
या जोर्डन में पेट्रा का महल,
रोम का कोलोसियम
या पेरू का माचु पिचु
ये सारे अजूबे बनाए है ,
भगवान के गढ़े एक अजूबे ने,
जिसे कहते है इंसान
और बनाए गए है,चीर कर सीना,
उस धरती माता का,
जो अपने आप में अजूबा है महान
जिसकी कोख में एक बीज डाला जाता है
तो हज़ारों दानो में बदल जाता है
जिसके सीने पर कई उत्तंग शिखर है
और तन पर लहराते कई समंदर  है
तो आओ,पहले हम इन अजूबों को सराहें
पर उस सृष्टि कर्ता को नहीं भुलायें
जिसके इशारों पर रोज सूरज निकलता है
चाँद घटता और बढ़ता है
हवायें लहलहाती है 
पुष्पों से खुशबू आती है
क्योंकि ये सृष्टि और वो सृष्टि कर्ता ,
जो सृष्टि का संचालन करता है ,
अपने आप में संसार का सबसे बड़ा अजूबा है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'