गड्डों से बचो
घर से जब निकलो
संभल कर चलो
सोच समझ कर के,
बाहर पग धरो
हो सकता है,तुम्हारे पडोसी ने,
अपने फायदे के लिए,
या तुम्हे फ़साने
गड्डे खोद रखें हो,
जिनमे तुम या तुम्हारे बच्चे,
गिर सकते है,जाने,अनजाने
और प्रिंस या माही की तरह,
बन सकते है सिर्फ अफ़साने
याद रहे,गड्डे खोदना कठिन है,
पर उनमे गिरना बड़ा आसान है
और उनमे से निकलने में,
बड़ी मुश्किल में फंस जाती जान है
क्योंकि एक गड्डे से निकलने के लिए,
पास में दूसरे गड्डे भी खोदने पड़ते है
और आपस में जोड़ने पड़ते है
और इस कार्यवाही में,
इतना समय लग जाता है
कि गड्डे में गिरे आदमीका,
दम ही निकल जाता है
आज खेतों में खुले बोरवेल है
सड़कों पर खुले मेनहोल है
नफरत के गड्डे है
लालच के गड्डे है
नशीले पदार्थों के गड्डे है
बेईमानी और भ्रष्टाचार के गड्डे है
जरा सी भी असावधानी हुई,
हम इनमे गिर जाते है
मुश्किल से घिर जाते है
इसीलिए कहता हूँ,
घर से जब निकलो
संभल कर चलो
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Wednesday, June 27, 2012
Tuesday, June 26, 2012
ये मेरी कवितायेँ
ये मेरी कवितायेँ
जो मेरे अंतर को ,हिला हिला देती है
कभी मार देती है,कभी जिला देती है
कभी रुलाती मुझको और कभी सहलाती
जब मेरी पीडायें,कवितायेँ बन जाती
मेरे लब मौन और शांत रहा करते है
आँखों से आंसूं ना,शब्द बहा करते है
लेखनी दर्दों को,पहनाती जामा है
सिर्फ चंद लफ्जों में, पीर सब समाना है
उधड़ते रिश्तों को,भावों के धागे से
सुई ले तुरपतें है, पीछे या आगे से
पत्थर से उर पर है,जमी काई सी फिसलन
फिसल फिसल कर यादें,कवितायेँ जाती बन
कविता की हर पंक्ति ,कतरन है यादों की
कुछ टूटे सपनो की,कुछ झूंठे वादों की
जोड़ इसी कतरन को,बन जाता कम्बल है
एकाकी जीवन का, ये ही तो संबल है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
जो मेरे अंतर को ,हिला हिला देती है
कभी मार देती है,कभी जिला देती है
कभी रुलाती मुझको और कभी सहलाती
जब मेरी पीडायें,कवितायेँ बन जाती
मेरे लब मौन और शांत रहा करते है
आँखों से आंसूं ना,शब्द बहा करते है
लेखनी दर्दों को,पहनाती जामा है
सिर्फ चंद लफ्जों में, पीर सब समाना है
उधड़ते रिश्तों को,भावों के धागे से
सुई ले तुरपतें है, पीछे या आगे से
पत्थर से उर पर है,जमी काई सी फिसलन
फिसल फिसल कर यादें,कवितायेँ जाती बन
कविता की हर पंक्ति ,कतरन है यादों की
कुछ टूटे सपनो की,कुछ झूंठे वादों की
जोड़ इसी कतरन को,बन जाता कम्बल है
एकाकी जीवन का, ये ही तो संबल है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
इतना ही काफी है
इतना ही काफी है
बच्चे ,अब बढे हो गये है
अपने पैरों पर खड़े हो गये है
ख़ुशी है ,कुछ बन गये है
गर्व से पर तन गये है
कभी कभी जब मिलते
लोकलाज या दिल से
चरण छुवा करते है
कमर झुका लेते है
ये भी क्या कुछ कम है
खुश हो जाते हम है
नम्रता कुछ बाकी है
इतना ही काफी है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
बच्चे ,अब बढे हो गये है
अपने पैरों पर खड़े हो गये है
ख़ुशी है ,कुछ बन गये है
गर्व से पर तन गये है
कभी कभी जब मिलते
लोकलाज या दिल से
चरण छुवा करते है
कमर झुका लेते है
ये भी क्या कुछ कम है
खुश हो जाते हम है
नम्रता कुछ बाकी है
इतना ही काफी है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
नाम पर मत जाओ
नाम पर मत जाओ
सूर है सूरज में,सूर याने चक्षु हीन,
सबको पथ दिखलाता,जग मग कर के जगती
सूरज में रज भी है,रज याने धूलि कण,
जा न सके सूरज तक, बहुत दूर है धरती
इसीलिये कहता हूँ,नाम पर मत जाओ,
डंक बड़ा चुभता है,पर बजता है डंका
नाम भ्रमित करते है,माला के दाने का,
वजन एक माशा है,पर कहलाता मनका
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
सूर है सूरज में,सूर याने चक्षु हीन,
सबको पथ दिखलाता,जग मग कर के जगती
सूरज में रज भी है,रज याने धूलि कण,
जा न सके सूरज तक, बहुत दूर है धरती
इसीलिये कहता हूँ,नाम पर मत जाओ,
डंक बड़ा चुभता है,पर बजता है डंका
नाम भ्रमित करते है,माला के दाने का,
वजन एक माशा है,पर कहलाता मनका
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Monday, June 25, 2012
बूढ़े माँ बाप और बच्चे
बूढ़े माँ बाप और बच्चे
धरा पर भगवान प्रकटे,कृष्ण के अवतार में
भुलाया माँ बाप का सब प्यार आ संसार में
यशोदा मैया और बाबा नन्द का दिल तोड़ कर
भुला सब कुछ,गये मथुरा,कृष्ण गोकुल छोड़ कर
राज के और रानियों के,चक्करों में यूं फसे
छोड़ कर ,माँ बाप बूढ़े, द्वारिका में जा बसे
अपने पालक,जन्मदाता ,को भुला एसा दिया
पलट कर मथुरा न आये,रुख न गोकुल का किया
जब किया भगवान ने, ये चलन है संसार का
मोल किसने चुकाया,माँ बाप के उपकार का
खटकने लगते है वो ,आँखों में बन कर किरकिरी
बच्चों को मिल जाती है जब,बीबी,अच्छी नौकरी
छोड़ते माँ बाप बूढों को तडफने वास्ते
भूल सबको, जीतें है वो सिर्फ अपने वास्ते
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
धरा पर भगवान प्रकटे,कृष्ण के अवतार में
भुलाया माँ बाप का सब प्यार आ संसार में
यशोदा मैया और बाबा नन्द का दिल तोड़ कर
भुला सब कुछ,गये मथुरा,कृष्ण गोकुल छोड़ कर
राज के और रानियों के,चक्करों में यूं फसे
छोड़ कर ,माँ बाप बूढ़े, द्वारिका में जा बसे
अपने पालक,जन्मदाता ,को भुला एसा दिया
पलट कर मथुरा न आये,रुख न गोकुल का किया
जब किया भगवान ने, ये चलन है संसार का
मोल किसने चुकाया,माँ बाप के उपकार का
खटकने लगते है वो ,आँखों में बन कर किरकिरी
बच्चों को मिल जाती है जब,बीबी,अच्छी नौकरी
छोड़ते माँ बाप बूढों को तडफने वास्ते
भूल सबको, जीतें है वो सिर्फ अपने वास्ते
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
परेशानी-गर्मी की
परेशानी-गर्मी की
गर्मियों में इस कदर ,मुश्किल है जीना हो गया
हवायें लू बन गयी, पानी पसीना हो गया
और डर ने पसीने के,हाल है एसा किया
पास भी अब पटखने में,बिदकती है बीबियाँ
बड़ी मनमौजी हुई है, आती जाती रात दिन
अंखमिचौली खेलती ,बिजली सताती रात दिन
आजकल उतनी हंसीं ,लगती नहीं है हसीना
चेहरे का मेकअप बिगाड़े,गाल पर बह पसीना
कम से कम कपडे बदन पर,जिस्म खुल दिखने लगे
उनको भी ये सुहाता है,हमको भी अच्छा लगे
गरमियों के दरमियाँ बस फलों का आराम है
लीचियां है,जामुने है,चूंसने को आम है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
गर्मियों में इस कदर ,मुश्किल है जीना हो गया
हवायें लू बन गयी, पानी पसीना हो गया
और डर ने पसीने के,हाल है एसा किया
पास भी अब पटखने में,बिदकती है बीबियाँ
बड़ी मनमौजी हुई है, आती जाती रात दिन
अंखमिचौली खेलती ,बिजली सताती रात दिन
आजकल उतनी हंसीं ,लगती नहीं है हसीना
चेहरे का मेकअप बिगाड़े,गाल पर बह पसीना
कम से कम कपडे बदन पर,जिस्म खुल दिखने लगे
उनको भी ये सुहाता है,हमको भी अच्छा लगे
गरमियों के दरमियाँ बस फलों का आराम है
लीचियां है,जामुने है,चूंसने को आम है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
संगत का असर
संगत का असर
सुबह की शीतल हवा,
सूरज का साथ पा,
लू बन, सताती है
संगत के असर से,
आदमी की फितरत भी,
कितनी बदल जाती है
अलग अलग बादल की,
अलग अलग बूँदें भी,
मिल कर धरती पर से
साथ साथ रहती है,
नदिया बन बहती है,
मिलने समंदर से
खेल है किस्मत का,
मगर असर संगत का,
बड़े रंग दिखता है
शादी हो जाने पर,
आदमी के जीवन का,
रुख ही बदल जाता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
सुबह की शीतल हवा,
सूरज का साथ पा,
लू बन, सताती है
संगत के असर से,
आदमी की फितरत भी,
कितनी बदल जाती है
अलग अलग बादल की,
अलग अलग बूँदें भी,
मिल कर धरती पर से
साथ साथ रहती है,
नदिया बन बहती है,
मिलने समंदर से
खेल है किस्मत का,
मगर असर संगत का,
बड़े रंग दिखता है
शादी हो जाने पर,
आदमी के जीवन का,
रुख ही बदल जाता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Subscribe to:
Posts (Atom)