स्थानं प्रधानम न बलं प्रधानम
एक बार भगवान विष्णु,
अपने वहां गरुड़ पर बैठ कर,
शिवजी से मिलने,
पहुंचे पर्वत कैलाश पर
शिवजी के गले में पड़ा सर्प,
गरुड़ को देख कर,गर्व से फुंकार मारता रहा
तो मन मसोस कर गरुड़ ने कहा
स्थानं प्रधानम न बलं प्रधानम
तेरा मेरा बैर हर कोई जानता है
पर इस समय तू शिवजी के गले में है,
इसलिए फुफकार मार रहा है,
ये तेरे बल की नहीं,स्थान की प्रधानता है
आदमी की पोजीशन,
उसके व्यवहार में,स्पष्ट दिखलाती है
सुहागरात को दुल्हन बनी गधी भी इतराती है
गरीब से गरीब आदमी भी,
जब घोड़ी चढ़ता है,दूल्हा राजा बन जाता है
कुर्सी पर बैठा,छोटा सा जज भी,
बड़े बड़े लोगों को जेल भिजवाता है
अदना सा ट्रेफिक हवालदार,सड़क के चोराहे पर
बड़े बड़े लोगों की,गाड़ियाँ ,
रोक दिया करता है,हाथ के इशारे पर
बाल जब सर पर उगते है ,
तो कुंतल बन लहराते,सवाँरे जाते है
वो ही बाल,जब गालों पर उगने का दुस्साहस करते है,
रोज रोज शेविंग कर,काट दिए जाते है
बड़े बड़े अफसर,जब होते कुर्सी पर,
तो उनके आगे ,दफ्तर भर डरता है
पर घर पर तो उसकी,बॉस उसकी बीबी है,
उसी के इशारों पर ,नाच किया करता है
रौब दिखलाने में,आदमी के रुतबे की,
बड़ी सहायता होती है
हमेशा देखा है,बल की प्रधानता नहीं,
आदमी की पोजीशन की प्रधानता होती है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Sunday, July 8, 2012
Saturday, July 7, 2012
कुछ परिभाषायें
कुछ परिभाषायें
1
राष्ट्रपिता
ये वो महान आत्मा है,जो राष्ट्र को बनाता है
भूखा रहता है,उपवास करता है
दुश्मनों से लड़ता है,आन्दोलन करता है
राष्ट्र को गुलामी के फंदे से छुड़ाता है
और गोलियां खाकर के,शहीद हो जाता है
दीवारों पर तस्वीर बन कर बन कर लटक जाता है
या फिर नोटों पर छाप दिया जाता है
साल में एक दिन छुट्टी दिलाता है और याद किया जाता है
वो महा पुरुष,राष्ट्रपिता कहलाता है
२
राष्ट्रपति
ये वो निरीह प्राणी है,
जो घर का मुखिया तो कहलाता है
पर सारे फैसले उसकी बीबी,
याने कि केबिनेट लेती है,
वो तो सिर्फ मोहर लगाता है
पति कि तरह सारे सुख पाता है
पर खुद कुछ नहीं कर पाता है
पति कि तरह रहता है,
इसलिए राष्ट्र पति कहलाता है
३
सांसद निधि
ये जनता से करों द्वारा वसूला गया वो धन है,
जो जनता के नुमाइंदो को,
विकास के लिये बांटा जाता है,
और जिससे वे,पहले अपना ,
फिर अपने परिवार का विकास करते है,
और बची हुई सारी राशि,
अगले चुनाव में,
जनता को लुटा दिया करते है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
1
राष्ट्रपिता
ये वो महान आत्मा है,जो राष्ट्र को बनाता है
भूखा रहता है,उपवास करता है
दुश्मनों से लड़ता है,आन्दोलन करता है
राष्ट्र को गुलामी के फंदे से छुड़ाता है
और गोलियां खाकर के,शहीद हो जाता है
दीवारों पर तस्वीर बन कर बन कर लटक जाता है
या फिर नोटों पर छाप दिया जाता है
साल में एक दिन छुट्टी दिलाता है और याद किया जाता है
वो महा पुरुष,राष्ट्रपिता कहलाता है
२
राष्ट्रपति
ये वो निरीह प्राणी है,
जो घर का मुखिया तो कहलाता है
पर सारे फैसले उसकी बीबी,
याने कि केबिनेट लेती है,
वो तो सिर्फ मोहर लगाता है
पति कि तरह सारे सुख पाता है
पर खुद कुछ नहीं कर पाता है
पति कि तरह रहता है,
इसलिए राष्ट्र पति कहलाता है
३
सांसद निधि
ये जनता से करों द्वारा वसूला गया वो धन है,
जो जनता के नुमाइंदो को,
विकास के लिये बांटा जाता है,
और जिससे वे,पहले अपना ,
फिर अपने परिवार का विकास करते है,
और बची हुई सारी राशि,
अगले चुनाव में,
जनता को लुटा दिया करते है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
खंडहर बोलते हैं
खंडहर बोलते हैं
जब भी मै कोई पुरानी इमारत के ,
खंडहर देखता हूँ,
मेरी कल्पनायें,पर लग कर उड़ने लगती है,
और पहुँच जाती है उस कालखंड में,
जब वो इमारत बुलंद हुआ करती थी
जब वहां जीवन का संगीत गूंजता था
क्योंकि खंडहर काफी कुछ बोलते है
बस आपको उनकी भाषा की समझ होनी चाहिए
और कल्पना शक्ति होनी चाहिये ये देखने की,
कि आज जहाँ घिसी और उखड़ी हुई फर्श है,
कभी वहां,गुदगुदे कालीन पर,
किसी के मेंहदी से रचे कोमल पांवों की,
पायल की छनछन सुनाई देती थी
और आज की इन बदरंग दीवारों ने,
जीवन के कितने रंग देखे होंगें
अगर आपकी कल्पनाशक्ति तेज़ है,
और नज़रें पारखी है,
तो आप इतना कुछ देख सकते हो,
जो किसी ने नहीं देखा होगा
आप जब भी किसी बूढी महिला को देखें ,
तो कल्पना करें,
कि जवानी के दिनों में,
उनका स्वरूप कैसा रहा होगा
झुर्री वाले गालों में कितनी लुनाई होगी
ढले हुए तन पर ,कितना कसाव होगा
आज जो वो इतनी गिरी हुई हालत में है,
जवानी में उनने कितनी बिजलियाँ गिराई होगी
और जब आप उनकी जवानी कि तस्वीरों को,
अपने ख्यालों में उभरता हुआ साकार देखेंगे,
सच आपको बड़ा मज़ा आएगा
ये शगल इतना मनभावन होगा,
कि आसानी से वक़्त गुजर जाएगा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
जब भी मै कोई पुरानी इमारत के ,
खंडहर देखता हूँ,
मेरी कल्पनायें,पर लग कर उड़ने लगती है,
और पहुँच जाती है उस कालखंड में,
जब वो इमारत बुलंद हुआ करती थी
जब वहां जीवन का संगीत गूंजता था
क्योंकि खंडहर काफी कुछ बोलते है
बस आपको उनकी भाषा की समझ होनी चाहिए
और कल्पना शक्ति होनी चाहिये ये देखने की,
कि आज जहाँ घिसी और उखड़ी हुई फर्श है,
कभी वहां,गुदगुदे कालीन पर,
किसी के मेंहदी से रचे कोमल पांवों की,
पायल की छनछन सुनाई देती थी
और आज की इन बदरंग दीवारों ने,
जीवन के कितने रंग देखे होंगें
अगर आपकी कल्पनाशक्ति तेज़ है,
और नज़रें पारखी है,
तो आप इतना कुछ देख सकते हो,
जो किसी ने नहीं देखा होगा
आप जब भी किसी बूढी महिला को देखें ,
तो कल्पना करें,
कि जवानी के दिनों में,
उनका स्वरूप कैसा रहा होगा
झुर्री वाले गालों में कितनी लुनाई होगी
ढले हुए तन पर ,कितना कसाव होगा
आज जो वो इतनी गिरी हुई हालत में है,
जवानी में उनने कितनी बिजलियाँ गिराई होगी
और जब आप उनकी जवानी कि तस्वीरों को,
अपने ख्यालों में उभरता हुआ साकार देखेंगे,
सच आपको बड़ा मज़ा आएगा
ये शगल इतना मनभावन होगा,
कि आसानी से वक़्त गुजर जाएगा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Thursday, July 5, 2012
रोबोट बन कर रह गये
रोबोट बन कर रह गये
चाहते थे मंगायें जापान से रोबोट हम,
शादी करली और खुद रोबोट बन कर रह गये
हम तो थे बाईस केरट, जब से पर हीरा जड़ा,
चौदह केरट हुए ,बाकी खोट बन कर रह गये
कभी किशमिश की तरह थे,मधुर ,मीठे, मुलायम,
एसा बदला वक़्त ने, अखरोट बन कर रह गये
बुदबुदा सकते हैं लेकिन बोल कुछ सकते नहीं,
किटकिटाते दांतों के संग, होंठ बन कर रह गये
गाँधी जी का चित्र है पर आचरण विपरीत है,
रिश्वतों में देने वाले ,नोट बन कर रह गये
आठ दस भ्रष्टों में से ही नेता चुनना है तुम्हे,
लोकतंत्री व्यवस्था के, वोट बन कर रह गये
कभी टेढ़े,कभी सीधे,कभी चलते ढाई घर,
बिछी शतरंजी बिसातें, गोट बन कर रह गये
चाहते थे बनना हम क्या, और 'घोटू' क्या बने,
टीस देती हमेशा वो चोंट बन कर रह गये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
चाहते थे मंगायें जापान से रोबोट हम,
शादी करली और खुद रोबोट बन कर रह गये
हम तो थे बाईस केरट, जब से पर हीरा जड़ा,
चौदह केरट हुए ,बाकी खोट बन कर रह गये
कभी किशमिश की तरह थे,मधुर ,मीठे, मुलायम,
एसा बदला वक़्त ने, अखरोट बन कर रह गये
बुदबुदा सकते हैं लेकिन बोल कुछ सकते नहीं,
किटकिटाते दांतों के संग, होंठ बन कर रह गये
गाँधी जी का चित्र है पर आचरण विपरीत है,
रिश्वतों में देने वाले ,नोट बन कर रह गये
आठ दस भ्रष्टों में से ही नेता चुनना है तुम्हे,
लोकतंत्री व्यवस्था के, वोट बन कर रह गये
कभी टेढ़े,कभी सीधे,कभी चलते ढाई घर,
बिछी शतरंजी बिसातें, गोट बन कर रह गये
चाहते थे बनना हम क्या, और 'घोटू' क्या बने,
टीस देती हमेशा वो चोंट बन कर रह गये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
कौनसा वो तत्व है-जिसमे छुपा अमरत्व है?
कौनसा वो तत्व है-जिसमे छुपा अमरत्व है?
समंदर में भरा है जल
जल से फिर बनते है बादल
और वो बादल बरस के,
पानी की बूंदों में झर झर
कभी सींचें ,खेत बगिया
कभी जमता बर्फ बन कर
कभी नदिया बन के बहता,
और फिर बनता समंदर
ये ही है जीवन का चक्कर
जो कि चलता है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा अमरत्व है
बना है माटी का ये तन
बड़ा क्षण भंगुर है जीवन
पंच तत्वों से बनी है,
तुम्हारी काया अकिंचन
सांस के डोरी रुकेगी,
जाएगी जब जिंदगी थम
जाके माटी में मिलेगा,
फिर से माटी जाएगा बन
ये ही जीवन का चक्कर
जो कि चलता है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा अमरत्व है
हवायें जीवन भरी है,
सांस बन कर सदा चलती
और कार्बन डाई ओक्साइड
बनी बाहर निकलती
फिर उसे ये पेड़ ,पौधे,
पुनः ओक्सिजन बनाये
विश्व में हर एक जगह ,
पर सदा रहती हवायें
ये ही है जीवन का चक्कर
जो कि चलता है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा अमरत्व है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
समंदर में भरा है जल
जल से फिर बनते है बादल
और वो बादल बरस के,
पानी की बूंदों में झर झर
कभी सींचें ,खेत बगिया
कभी जमता बर्फ बन कर
कभी नदिया बन के बहता,
और फिर बनता समंदर
ये ही है जीवन का चक्कर
जो कि चलता है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा अमरत्व है
बना है माटी का ये तन
बड़ा क्षण भंगुर है जीवन
पंच तत्वों से बनी है,
तुम्हारी काया अकिंचन
सांस के डोरी रुकेगी,
जाएगी जब जिंदगी थम
जाके माटी में मिलेगा,
फिर से माटी जाएगा बन
ये ही जीवन का चक्कर
जो कि चलता है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा अमरत्व है
हवायें जीवन भरी है,
सांस बन कर सदा चलती
और कार्बन डाई ओक्साइड
बनी बाहर निकलती
फिर उसे ये पेड़ ,पौधे,
पुनः ओक्सिजन बनाये
विश्व में हर एक जगह ,
पर सदा रहती हवायें
ये ही है जीवन का चक्कर
जो कि चलता है निरंतर
ये ही तो वो तत्व है
जिसमे बसा अमरत्व है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Wednesday, July 4, 2012
खोज- भगवान् के कण की
खोज- भगवान् के कण की
बनायी किसने ये दुनिया, पहाड़,नदिया,समंदर
पेड़ और पौधे बनाये ,कीट, पक्षी , जानवर
चाँद तारों से सजाया , प्यारा सा सुन्दर जहाँ
बनाये आदम और हव्वा, उनको फिर लाया यहाँ
और फिर इन दोनों ने आ,गुल खिलाये नित नये
मिले दोनों इस तरह ,मिल कर करोड़ों बन गये
इतना सब कुछ रचा जिसने,शक्ति वो भगवान है
आज उस भगवान के कण ,खोजता इंसान है
समाया कण कण में जो,जिसके अनेकों वेश है
वो अगोचर है अनश्वर, आत्म भू,अखिलेश है
खोज में जिसकी लगे है,ज्ञानी,ध्यानी,देवता
कोई ढूंढें काबा में , काशी में कोई ढूंढता
करो तुम विस्फोट कितनी कोशिशें ही रात दिन
उस अनादि ईश्वर का पार पाना है कठिन
उसको पाना बड़ा मुश्किल,ढूंढते रह जाओगे
सच्चे मन से,खुद में झांको,वहीं उसको पाओगे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
बनायी किसने ये दुनिया, पहाड़,नदिया,समंदर
पेड़ और पौधे बनाये ,कीट, पक्षी , जानवर
चाँद तारों से सजाया , प्यारा सा सुन्दर जहाँ
बनाये आदम और हव्वा, उनको फिर लाया यहाँ
और फिर इन दोनों ने आ,गुल खिलाये नित नये
मिले दोनों इस तरह ,मिल कर करोड़ों बन गये
इतना सब कुछ रचा जिसने,शक्ति वो भगवान है
आज उस भगवान के कण ,खोजता इंसान है
समाया कण कण में जो,जिसके अनेकों वेश है
वो अगोचर है अनश्वर, आत्म भू,अखिलेश है
खोज में जिसकी लगे है,ज्ञानी,ध्यानी,देवता
कोई ढूंढें काबा में , काशी में कोई ढूंढता
करो तुम विस्फोट कितनी कोशिशें ही रात दिन
उस अनादि ईश्वर का पार पाना है कठिन
उसको पाना बड़ा मुश्किल,ढूंढते रह जाओगे
सच्चे मन से,खुद में झांको,वहीं उसको पाओगे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
मार दी
मार दी
हुस्नवाले हो गए है ,देखो कितने बेरहम,
गिराई बिजलियाँ हम पर, नज़र तिरछी मार दी
वो भी थे कुछ में और हम भी थे कुछ सोच में,
जरा सी गफलत हुई, आपस में टक्कर मार दी
देख उनको आँख फडकी,बंद सी कुछ हो गयी,
हम पे है आरोप हमने , आँख उनको मार दी
व्यस्त थे हम देखने में ,जलवा उनके हुस्न का,
दिलजले ने मौका पा,पाकिट हमारी मार दी
दिखाये थे हमको उनने,सपन सुन्दर,सुहाने,
वक़्त कुछ देने का आया ,उनने डंडी मार दी
वोट के बदले में हमको नेताजी ने क्या दिया,
दाम चीजों के बढ़ा, मंहगाई की बस मार दी
बड़ा लम्बा लेक्चर था,और वो भी बेवजह,
हमने देखा,हमसे कितनो ने थी झपकी मार दी
आ रहा था बड़ा आलस,मूड था आराम का,
बिमारी के बहाने हमने भी छुट्टी मार दी
लोग इतने प्रेक्टिकल हो गये है आजकल,
जिसको भी मौका मिला तो दूसरों की मार दी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
हुस्नवाले हो गए है ,देखो कितने बेरहम,
गिराई बिजलियाँ हम पर, नज़र तिरछी मार दी
वो भी थे कुछ में और हम भी थे कुछ सोच में,
जरा सी गफलत हुई, आपस में टक्कर मार दी
देख उनको आँख फडकी,बंद सी कुछ हो गयी,
हम पे है आरोप हमने , आँख उनको मार दी
व्यस्त थे हम देखने में ,जलवा उनके हुस्न का,
दिलजले ने मौका पा,पाकिट हमारी मार दी
दिखाये थे हमको उनने,सपन सुन्दर,सुहाने,
वक़्त कुछ देने का आया ,उनने डंडी मार दी
वोट के बदले में हमको नेताजी ने क्या दिया,
दाम चीजों के बढ़ा, मंहगाई की बस मार दी
बड़ा लम्बा लेक्चर था,और वो भी बेवजह,
हमने देखा,हमसे कितनो ने थी झपकी मार दी
आ रहा था बड़ा आलस,मूड था आराम का,
बिमारी के बहाने हमने भी छुट्टी मार दी
लोग इतने प्रेक्टिकल हो गये है आजकल,
जिसको भी मौका मिला तो दूसरों की मार दी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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