Tuesday, August 14, 2012

पानी-तीन कवितायें

 पानी-तीन कवितायें

              १
           पानी का संगीत
पानी का एक अपना संगीत होता है
आसमान से बरसता है,तो रिमझिम करता है
नदिया में बहता है  तो कलकल   करता है
झरनों से झरता है तो झर झर करता  है
सागर की लहरों में,सर सर उछलता  है
वैसे तो शांतिप्रिय है,पर जब उफान पर आता है
तो तांडव नृत्य करता हुआ,
बाढ़,तूफ़ान और सुनामी लाता है
                    २
    पानी का स्वभाव
पानी जब जमीन पर रहता है
कल कल कर बहता है,
मधुर मधुर संगीत देता है
और जब थोडा ऊपर उठता है
श्वेत रजत सा बर्फ बना,
पहाड़ों पर चमकता है
और जब और भी ज्यादा ,
ऊँचा उठ जाता है
उसमे गरूर आ जाता,
काले काले बादल सा बन जाता है
कभी बिजली सा कड़कता है
कभी जोरों से गरजता है
कभी तरसाता है,कभी बरसता है
उसका रंग,रूप और स्वभाव,
ऊंचाई के साथ साथ,बदलता रहता है
पानी का और मानव का स्वभाव,
कितना मिलता जुलता है
क्योंकि मानव के शरीर में,
70 % से भी अधिक,पानी रहता है
             ३
    पानी और संगत का असर
धरा के संपर्क में पानी,
कल कल  करता रहता है
 मानव के संपर्क में आ वो पानी,
मल मूत्र  बन बहता है
समुन्दर के संपर्क में आकर,
खारा हो  जाता है
सूरज के संपर्क में आकर,
बादल बन जाता है
साथ मिला गर्मी का,
वाष्प  है बन जाता
और मिली सर्दी तो,
बर्फ बन  जम  जाता 
पानी वही पर जैसी होती है,
उसकी संगत या साथ
बदल जाता है उसका रंग रूप,
रहन सहन और स्वाद

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 

भविष्य का बोझ

भविष्य का बोझ

मै रोज सुबह सुबह देखता हूँ,

बच्चे जब स्कूल जाते हैं,
उन्हें बस तह छोड़ने के लिए ,
उनके माता या पिता,
उनके संग जाते है
और बस तक,
उनके भारी स्कूल बेग का बोझा ,
खुद उठाते है
बाद मे दिन भर  ये भारी बोझा,
अच्छों को खुद ही उठाना होता है
जिंदगानी के साथ भी,
एसा ही कुछ होता है
क्योंकि माँ बाप,एक हद तक,
जैसे स्कूल की बस तक,
तो बच्चों का बोझा उठा सकते है
पर  जिंदगानी के सफ़र मे,
हर एक को,
अपने अपने बोझे,
खुद ही उठाने पड़ते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, August 13, 2012

कसक मन में रह गयी है

कसक मन में रह गयी है

भावनायें बह गयी,संभावनायें  ढह गयी है

मिलन फिर हो पायेगा, ये आस धूमिल रह गयी है
अब तो  कहने सुनने को बाकी बचा ही और क्या है,
ये तुम्हारी बेरुखी ही बात सारी कह गयी है
एक तो वातावरण में,हवाएं फैली,विषैली,
और उस पर फिर अचानक,हवा उलटी बह गयी है
कलकलाती थी नदी पर जब से पानी थम गया है,
हो गयी फिसलन यहाँ पर,काई  की  जम तह गयी है
आस में ,मौसम बसंती,आयेगा,पत्ते लगेंगे,
जिंदगानी एक सूखा वृक्ष बन कर रह गयी है
पता ना,किस दिन ढहेगी,पर टिकी,मजबूत है ,
ये पुरानी इमारत,भूचाल  इतने सह गयी है
क्यों हुआ,कैसे हुआ,क्यों कर हुआ,क्या बतायें,
मगर ये होना न था,ये कसक मन में रह गयी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, August 12, 2012

माँ बाप और बेटा

माँ बाप और बेटा

मेरा बेटा,

जब नर्सरी स्कूल में पढता था
तो जो उसकी मिस कहती थी ,
उसी को सच जानता था
माँ बाप कुछ भी कहे,
उनकी बात नहीं मानता था
और  अब जब उसकी शादी हो चुकी है,
उसमे कुछ ज्यादा बदलाव नहीं आया है
अब मिस नहीं,
उसकी मिसेस जो भी कहती है,
उसी को  सच जानता है
माँ बाप कुछ भी कहे,
उनकी बात नहीं मानता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

उनकी सारी गलतियाँ बिसरा चुके है

उनकी सारी गलतियाँ बिसरा चुके है

चोंट इतनी जमाने की खा चुके है

जितने भी आंसू थे आने,आ चुके है
विदारक घड़ियाँ दुखों की टल गयी है,
सैंकड़ों ही बार अब  मुस्का  चुके है
मुकद्दर में लिखा है वो ही मिलेगा,
अपने दिल को बारहा समझा चुके है
किये होंगे करम कुछ पिछले जनम में,
जिसका फल इस जनम में हम पा चुके है
मोहब्बत के नाम से लगने लगा डर,
मोहब्बत का सिला एसा  पा चुके है
हम तो है वो फूल देशी गुलाबों के,
महकते है ,गो  जरा कुम्हला चुके है
रहे वो खुश और सलामत ये दुआ है,
उनकी सारी गलतियाँ बिसरा चुके है

 मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, August 11, 2012

सूरज,चाँद और तारे

सूरज,चाँद और तारे

      सूरज
सूरज सूर है बड़ा,
जहाँ जहाँ जाता है
अँधेरे को हराता है
और जीती सीमा पर,
उजाला फैलाता है
उन्ही उन्ही जगहों पर,
दिन होता जाता है
   चाँद
चंद्रमा की तो बड़ी,
निराली कहानी है
दुनिया में एसा ना,
कोई भी दानी है
सूरज से रौशनी,
वो उधार लेता है
और प्रकाश दुनिया में,
वो बाँट देता है
जब उधार कम मिलता,
तो वो घट जाता है
जब उधार ज्यादा मिलता,
तो वो बढ़ जाता है
पूनम को खुशहाल है
अमावास को कंगाल है
    तारे
नन्हे नन्हे से तारे
दिन भर खेलने के बाद,थके हारे
बेचारे
आसमान में जाकर ,नींद के मारे
कभी पलक बंद करते,
कभी जाग जाते है
और हमको लगता है,
कि वो टिमटिमाते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

आजकल हम रोज जिम जाने लगे है

आजकल हम रोज जिम जाने लगे है

प्यार में हम जिनके पगलाने लगे  है

आजकल वो हमसे कतराने लगे  है
तहे दिल से उनसे करते है मोहब्बत,
और उनको हम तो दीवाने लगें है
थोड़ी सी अच्छी हुई सेहत हमारी,
कहते है कि हम अब मोटियाने लगे है  
दिल  मिलाने की कहो तो तिलमिलाते,
आजकल वो नखरे दिखलाने  लगे है
पेट या सरदर्द का करके बहाना,
किस तरह भी हम को टरकाने लगे है
दुबले होने डाइटिंग के नाम पर हम,
उबली सब्जी ,टमाटर ,खाने लगे है
'घोटू 'हम स्टीम ,सोना बाथ लेकर,
अपनी चर्बी , थोड़ी छटवाने लगे है
जब से उनने हमको मोटा कह दिया है,
आजकल हम रोज जिम जाने लगे है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'