पशुवत जीवन
बचपन में,
हम खरगोश की तरह होते है
नन्हे,मासूम,कोमल,मुलायम,
मुस्कराते रहते है
किलकारियां भरते है
प्यार और दुलार की,
हरी हरी घास चरते है
किशोरावस्था में,
हिरन की तरह कुलांछे लगाते है
या बारहसिंघा की तरह,
अपने सींगों पर इतराते है
और जवानी में,
कभी दूध देती गाय की तरह रंभाते है
कभी कंगारू की तरह,
अपने बच्चों को सँभालते है
कभी शेर की तरह दहाड़ते है
कभी हाथी की तरह चिंघाड़ते है
और बुढ़ापे के रेगिस्थान में,
ऊँट की तरह,
प्यार के नखलिस्थान की तलाश करते है
लम्बी उम्र की तरह,
अपनी लम्बी गर्दन उचका उचका ,
कांटे भरी झाड़ियों में,
हरी हरी पत्तियां दूंढ ढूंढ,
अपना पेट भरते है
सदा गधों सा बोझा ढोतें है
हम उम्र भर,
पशुवत जीवन जी रहे होते है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Tuesday, September 18, 2012
Monday, September 17, 2012
kbc6
प्रिय अमित जी,
kbc 6 के लिए एक छंद भेज रहा हूँ
' पंच कोटि है ज्ञान का,उच्च कोटि का खेल
कोटि कोटि मन लुभाता,इसमें सबका मेल
इसमें सबका मेल,कहीं देखा है अबतक
हॉट सीट पर बैठ ,ह्रदय को मिलती ठंडक
पंच कोटि का नहीं ,खेल ये कई कोटि का
बिग बी से दो बातें करना,कई कोटि का
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
इंदिरापुरम,ग़ाज़ियाबाद
kbc 6 के लिए एक छंद भेज रहा हूँ
' पंच कोटि है ज्ञान का,उच्च कोटि का खेल
कोटि कोटि मन लुभाता,इसमें सबका मेल
इसमें सबका मेल,कहीं देखा है अबतक
हॉट सीट पर बैठ ,ह्रदय को मिलती ठंडक
पंच कोटि का नहीं ,खेल ये कई कोटि का
बिग बी से दो बातें करना,कई कोटि का
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
इंदिरापुरम,ग़ाज़ियाबाद
समर्पण
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
करूं मै सुदर्शन, बनूँ मै सुदर्शन
सभी काम ,क्रोधा,
सभी रोग चिंता
सभी लोभ मोहा,
सभी द्वेष ,निंदा
गुरु के चरण में,सभी कुछ समर्पण
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
अपने ह्रदय से मै,
'मै' को निकालूँ
करूं प्रेम सबको,
मै अपना बनालूँ
करूं प्यार अपना,सभी को मै अर्पण
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
ह्रदय में सभी के,
खिले पुष्प सुख के
ख़ुशी ही ख़ुशी बस,
नज़र आये मुख पे
करूं पुष्प सारे,गुरु को मै अर्पण
समर्पण,समर्पण ,समर्पण,समर्पण
साँसों की सरगम से,
मन को हिला दूं
खुदी को मिटा कर,
खुदा से मिला दूं
करूं आत्मदर्शन,बनू मै सुदर्शन
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
करूं मै सुदर्शन, बनूँ मै सुदर्शन
सभी काम ,क्रोधा,
सभी रोग चिंता
सभी लोभ मोहा,
सभी द्वेष ,निंदा
गुरु के चरण में,सभी कुछ समर्पण
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
अपने ह्रदय से मै,
'मै' को निकालूँ
करूं प्रेम सबको,
मै अपना बनालूँ
करूं प्यार अपना,सभी को मै अर्पण
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
ह्रदय में सभी के,
खिले पुष्प सुख के
ख़ुशी ही ख़ुशी बस,
नज़र आये मुख पे
करूं पुष्प सारे,गुरु को मै अर्पण
समर्पण,समर्पण ,समर्पण,समर्पण
साँसों की सरगम से,
मन को हिला दूं
खुदी को मिटा कर,
खुदा से मिला दूं
करूं आत्मदर्शन,बनू मै सुदर्शन
समर्पण,समर्पण,समर्पण,समर्पण
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
आओ हम तुम हँसे
आओ हम तुम हँसे
आओ हम तुम हंसें
मन में खुशियाँ बसे
जीवन की आपाधापी में,
रहे न यूं ही फंसे
खुश हो सबसे मिलें
दिल की कलियाँ खिले
नहीं किसी से बैर भाव,
मन में शिकवे गिले
बस यूं ही मुस्काके
लगते रहे ठहाके
धीरे धीरे बिसर जायेंगे,
सारे दुःख दुनिया के
खिल खिल ,कल कल बहें
लगा सदा कहकहे
तन मन दोनों की ही सेहत,
सदा सुहानी रहे
चेहरा हँसता लिये
सुखमय जीवन जियें
बहुत मिलेगी खुशियाँ,
यदि कुछ करो किसी के लिये
चार दिनों का जीवन
हो न किसी से अनबन
खुशियाँ बरसेगी,सरसेगी,
हँसते रहिये हरदम
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
आओ हम तुम हंसें
मन में खुशियाँ बसे
जीवन की आपाधापी में,
रहे न यूं ही फंसे
खुश हो सबसे मिलें
दिल की कलियाँ खिले
नहीं किसी से बैर भाव,
मन में शिकवे गिले
बस यूं ही मुस्काके
लगते रहे ठहाके
धीरे धीरे बिसर जायेंगे,
सारे दुःख दुनिया के
खिल खिल ,कल कल बहें
लगा सदा कहकहे
तन मन दोनों की ही सेहत,
सदा सुहानी रहे
चेहरा हँसता लिये
सुखमय जीवन जियें
बहुत मिलेगी खुशियाँ,
यदि कुछ करो किसी के लिये
चार दिनों का जीवन
हो न किसी से अनबन
खुशियाँ बरसेगी,सरसेगी,
हँसते रहिये हरदम
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
चार दिन की जिंदगी
चार दिन की जिंदगी
जन्म ले रोते हैं पहले,बाद में मुस्काते हैं,
और फिर किलकारियों से,हम लुटाते प्यार हैं
फिर पढाई,लिखाई और खेलना मस्ती भरा,
ये किशोरावस्था भी,होती गज़ब की यार है
प्यार,जलवा,नाज़,अदाएं,मौज,मस्ती रात दिन,
ये जवानी,चार दिन का ,मद भरा त्योंहार है
और फिर लाचार करता है बुढ़ापा सभी को,
कुछ नहीं उपचार इसका,जिंदगी दिन चार है
मदन मोहन बहेती'घोटू'
जन्म ले रोते हैं पहले,बाद में मुस्काते हैं,
और फिर किलकारियों से,हम लुटाते प्यार हैं
फिर पढाई,लिखाई और खेलना मस्ती भरा,
ये किशोरावस्था भी,होती गज़ब की यार है
प्यार,जलवा,नाज़,अदाएं,मौज,मस्ती रात दिन,
ये जवानी,चार दिन का ,मद भरा त्योंहार है
और फिर लाचार करता है बुढ़ापा सभी को,
कुछ नहीं उपचार इसका,जिंदगी दिन चार है
मदन मोहन बहेती'घोटू'
मंहगाई ने कमर तोड़ दी
मंहगाई ने कमर तोड़ दी
हे मनमोहन!कुछ तो सोचो,
तुमने है दिल तोडा
मंहगाई ने कमर तोड़ दी,
नहीं कहीं का छोड़ा
रोज रोज बढ़ते दामों का,
सबको लगता कोड़ा
घोटालों से लूट देश को,
एसा हमें झिंझोड़ा
अब खुदरा व्यापार विदेशी,
हाथों में है छोड़ा
डीजल ने दिल जला दिया है,
सभी चीज का तोडा
और सातवाँ गेस सिलेंडर,
महंगा हुआ निगोड़ा
लंगड़ा लंगड़ा दौड़ रहा,
सूरज का सातवां घोड़ा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
हे मनमोहन!कुछ तो सोचो,
तुमने है दिल तोडा
मंहगाई ने कमर तोड़ दी,
नहीं कहीं का छोड़ा
रोज रोज बढ़ते दामों का,
सबको लगता कोड़ा
घोटालों से लूट देश को,
एसा हमें झिंझोड़ा
अब खुदरा व्यापार विदेशी,
हाथों में है छोड़ा
डीजल ने दिल जला दिया है,
सभी चीज का तोडा
और सातवाँ गेस सिलेंडर,
महंगा हुआ निगोड़ा
लंगड़ा लंगड़ा दौड़ रहा,
सूरज का सातवां घोड़ा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Sunday, September 16, 2012
जीवन झंझट
जीवन झंझट
थोडा सा आराम मिला है, मुझको जीवन की खट पट में
कुछ इकसठ में,कुछ बांसठ में,कुछ त्रेसठ में,कुछ चोंसठ में
चलता यह गाडी के नीचे,पाले गलत फहमियां सारी
मै था मूरख श्वान समझता ,मुझ से ही चलती है गाडी
जान हकीकत, मै पछताया,खटता रहा यूं ही फ़ोकट में
थोडा सा आराम मिला है,मुझको जीवन की खट पट में
मै था एक कूप मंडुप सा,कूए में सिमटी थी दुनिया
नहीं किसी से लेना देना ,,बस मै था और मेरी दुनिया
निकला बाहर तो ये जाना,सचमुच ही था ,कितना शठ मै
थोडा सा आराम मिला है,मुझको जीवन की खटपट में
उलझा रहा और की रट में,मं में प्यार भरी चाहत थी
आह मिली तो होकर आहत,राह ढूंढता था राहत की
यूं ही फंसा रखा था मैंने,खुदको बे मतलब,झंझट में
थोडा सा आराम मिला है,मुझको जीवन की खटपट में
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
थोडा सा आराम मिला है, मुझको जीवन की खट पट में
कुछ इकसठ में,कुछ बांसठ में,कुछ त्रेसठ में,कुछ चोंसठ में
चलता यह गाडी के नीचे,पाले गलत फहमियां सारी
मै था मूरख श्वान समझता ,मुझ से ही चलती है गाडी
जान हकीकत, मै पछताया,खटता रहा यूं ही फ़ोकट में
थोडा सा आराम मिला है,मुझको जीवन की खट पट में
मै था एक कूप मंडुप सा,कूए में सिमटी थी दुनिया
नहीं किसी से लेना देना ,,बस मै था और मेरी दुनिया
निकला बाहर तो ये जाना,सचमुच ही था ,कितना शठ मै
थोडा सा आराम मिला है,मुझको जीवन की खटपट में
उलझा रहा और की रट में,मं में प्यार भरी चाहत थी
आह मिली तो होकर आहत,राह ढूंढता था राहत की
यूं ही फंसा रखा था मैंने,खुदको बे मतलब,झंझट में
थोडा सा आराम मिला है,मुझको जीवन की खटपट में
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
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