चोर तुम भी ,चोर हम भी ....
चोर तुम भी,चोर हम भी,सिर्फ इतना फर्क है,
कल तलक सत्ता में थे तुम,आज हम पावर में हैं
हम भी नंगे,तुम भी नंगे,रहते है हम्माम में,
दिखावे की दुश्मनी है,दोस्त हम सब घर में है
हम हो या तुम,नहीं कोई भी धुला है दूध का
पोल एक दूसरे की,हमको तुमको है पता
सेकतें हैं,अपनी अपनी ,राजनेतिक रोटियां
चलानी है ,तुमको भी और हमको भी अपनी दुकां
ये तुम्हारा ओपोजिशन ,बंद ये,हड़ताल ये,
कैसे सत्ता करें काबिज,बस इसी चक्कर में है
एक थैली के हैं चट्टे बट्टे,हम भी,आप भी,
नौ सौ चूहे मार कर के बिल्ली है हज को चली
कोयले की दलाली में, हाथ काले सभी के,
हमारी करतूत काली ,है ये जनता जानती
'जिधर दम है,उधर दम है,एसे भी कुछ लोग है,
जिनको दाना डाल कर के,आज हम पावर में है
चोर तुम भी ,चोर हम भी,सिर्फ इतना फर्क है,
कल तलक सत्ता में थे तुम,आज हम पावर में है
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Tuesday, September 25, 2012
सचमुच हम कितने मूरख है
सचमुच हम कितने मूरख है
कोई कुछ भी कह दे,उसकी बातों में आ जाते झट है
सचमुच हम कितने मूरख है
भ्रष्टाचार विहीन व्यवस्था,और सुराज के सपने देखें
इस कलयुग में,त्रेता युग के,रामराज के सपने देखें
पग पग पर रिश्वतखोरी है,दिन दिन बढती है मंहगाई
लूटखसोट,कमीशन बाजी,सांसद करते हाथापाई
राजनीती को ,खुर्राटों ने,पुश्तेनी व्यापार बनाया
अर्थव्यवस्था को निचोड़ कर,घोटालों का जाल बिछाया
उनके झूंठे बहकावे में,फिर भी आ जाते जब तब है
सचमुच हम कितने मूरख है
कथा भागवत सुनते,मन में ,ये आशा ले,स्वर्ग जायेंगे
करते है गोदान ,पकड़कर पूंछ बेतरनी ,तर जायेंगे
मोटे मोटे टिकिट कटा कर,तीर्थ ,धाम के , करते दर्शन
ढोंगी,धर्माचार्य ,गुरु के,खुश होतें है,सुन कर प्रवचन
गंगा में डुबकियाँ लगाते,सोच यही,सब पाप धुलेंगे
रातजगा,व्रत कीर्तन करते,इस भ्रम में कि पुण्य मिलेंगे
दान पुण्य और मंत्रजाप से,कट जाते सारे संकट है
सचमुच हम कितने मूरख है
आज बीज बोकर खुश होते,अपने मन में ,आस लगा कर
वृक्ष घना होकर बिकसेगा, खाने को देगा मीठे फल
नहीं अपेक्षा करो किसी से,पायेगा दुःख ,ह्रदय तुम्हारा
करो किसी के खातिर यदि कुछ,समझो था कर्तव्य तुम्हारा
नेकी कर दरिया में डालो, सबसे अच्छी बात यही है
सिर्फ भावनाओं में बह कर के, करना दिल को दुखी नहीं है
प्रतिकार की ,आशा मन में,रखना संजो,व्यर्थ,नाहक है
सचमुच हम कितने मूरख है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
कोई कुछ भी कह दे,उसकी बातों में आ जाते झट है
सचमुच हम कितने मूरख है
भ्रष्टाचार विहीन व्यवस्था,और सुराज के सपने देखें
इस कलयुग में,त्रेता युग के,रामराज के सपने देखें
पग पग पर रिश्वतखोरी है,दिन दिन बढती है मंहगाई
लूटखसोट,कमीशन बाजी,सांसद करते हाथापाई
राजनीती को ,खुर्राटों ने,पुश्तेनी व्यापार बनाया
अर्थव्यवस्था को निचोड़ कर,घोटालों का जाल बिछाया
उनके झूंठे बहकावे में,फिर भी आ जाते जब तब है
सचमुच हम कितने मूरख है
कथा भागवत सुनते,मन में ,ये आशा ले,स्वर्ग जायेंगे
करते है गोदान ,पकड़कर पूंछ बेतरनी ,तर जायेंगे
मोटे मोटे टिकिट कटा कर,तीर्थ ,धाम के , करते दर्शन
ढोंगी,धर्माचार्य ,गुरु के,खुश होतें है,सुन कर प्रवचन
गंगा में डुबकियाँ लगाते,सोच यही,सब पाप धुलेंगे
रातजगा,व्रत कीर्तन करते,इस भ्रम में कि पुण्य मिलेंगे
दान पुण्य और मंत्रजाप से,कट जाते सारे संकट है
सचमुच हम कितने मूरख है
आज बीज बोकर खुश होते,अपने मन में ,आस लगा कर
वृक्ष घना होकर बिकसेगा, खाने को देगा मीठे फल
नहीं अपेक्षा करो किसी से,पायेगा दुःख ,ह्रदय तुम्हारा
करो किसी के खातिर यदि कुछ,समझो था कर्तव्य तुम्हारा
नेकी कर दरिया में डालो, सबसे अच्छी बात यही है
सिर्फ भावनाओं में बह कर के, करना दिल को दुखी नहीं है
प्रतिकार की ,आशा मन में,रखना संजो,व्यर्थ,नाहक है
सचमुच हम कितने मूरख है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Saturday, September 22, 2012
लब-प्यार से लबालब
लब-प्यार से लबालब
चाँद जैसे सुहाने मुख पर सजे,
ये गुलाबी झिलमिलाते होंठ है
खिला करते हैं कमल के फूल से,
जब कभी ये खिलखिलाते होंठ है
ये मुलायम,मदभरे हैं,रस भरे,
लरजते हैं प्यार बरसाते कभी
दौड़ने लगती है साँसें तेजी से,
होंठ जब नजदीक आते है कभी
प्यार का पहला प्रदर्शन होंठ है,
रसीला मद भरा चुम्बन होंठ है
जब भी मिलते है किसी के होंठ से,
तोड़ देते सारे बंधन होंठ है
अधर पर धर कर अधर तो देखिये,
ये अधर तो प्यार का आधार है,
नहीं धीरज धर सकेंगे आप फिर,
बड़ी तीखी,मधुर इनकी धार है
मिलन की बेताबियाँ बढ़ जायेगी,
तन बदन में आग सी लग जायेगी
सांस की सरगम निकल कर जिगर से,
सब से पहले लबों से टकरायगी
उमरभर पियो मगर खाली न हो,
जाम हैं ये वो छलकते,मद भरे
लब नहीं ये युगल फल है प्यार से,
लबालब, और लहलहाते,रस भरे
मुस्कराते तो गिराते बिजलियाँ,
गोल हो सीटी बजाते होंठ है
और खुश हो दूर तक जब फैलते,
तो ठहाके भी लगाते होंठ है
सख्त से बत्तीस दांतों के लिए,
ये मुलायम दोनों ,पहरेदार हैं
हैं रसीले शहद जैसे ये कभी,
लब नहीं,ये प्यार का भण्डार है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
चाँद जैसे सुहाने मुख पर सजे,
ये गुलाबी झिलमिलाते होंठ है
खिला करते हैं कमल के फूल से,
जब कभी ये खिलखिलाते होंठ है
ये मुलायम,मदभरे हैं,रस भरे,
लरजते हैं प्यार बरसाते कभी
दौड़ने लगती है साँसें तेजी से,
होंठ जब नजदीक आते है कभी
प्यार का पहला प्रदर्शन होंठ है,
रसीला मद भरा चुम्बन होंठ है
जब भी मिलते है किसी के होंठ से,
तोड़ देते सारे बंधन होंठ है
अधर पर धर कर अधर तो देखिये,
ये अधर तो प्यार का आधार है,
नहीं धीरज धर सकेंगे आप फिर,
बड़ी तीखी,मधुर इनकी धार है
मिलन की बेताबियाँ बढ़ जायेगी,
तन बदन में आग सी लग जायेगी
सांस की सरगम निकल कर जिगर से,
सब से पहले लबों से टकरायगी
उमरभर पियो मगर खाली न हो,
जाम हैं ये वो छलकते,मद भरे
लब नहीं ये युगल फल है प्यार से,
लबालब, और लहलहाते,रस भरे
मुस्कराते तो गिराते बिजलियाँ,
गोल हो सीटी बजाते होंठ है
और खुश हो दूर तक जब फैलते,
तो ठहाके भी लगाते होंठ है
सख्त से बत्तीस दांतों के लिए,
ये मुलायम दोनों ,पहरेदार हैं
हैं रसीले शहद जैसे ये कभी,
लब नहीं,ये प्यार का भण्डार है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Friday, September 21, 2012
साथ छोड़ कर भागी ममता.....
साथ छोड़ कर भागी ममता.....
साथ छोड़ कर भागी ममता,अब क्या होगा रे
नज़र आ रहा सूरज ढलता, अब क्या होगा रे
नहीं मुलायम,रहते कायम,अपने वादों पर
नज़र बड़ी आवश्यक रखना,गुप्त इरादों पर
उनका सपना,पी एम् पद का,अब क्या होगा रे
नज़र आरहा सूरज ढलता,अब क्या होगा रे
माया महा ठगिनी हम जानी,आनी जानी है
कब इसका रुख बदल जाए, ये घाघ पुरानी है
यदि उसने जो पाला पलता,तब क्या होगा रे
नज़र आ रहा सूरज ढलता,अब क्या होगा रे
अब तो करूणानिधि से ही करुणा की आशा है
सी बी आइ का दबाब भी अच्छा खासा है
साम दाम से काम न बनता,तब क्या होगा रे
नजर आरहा सूरज ढलता,अब क्या होगा रे
सब चीजों के दाम बढ़ गए,जनता है अकुलायी
सुरसा जैसी मुख फैलाती,रोज रोज मंहगाई
साथ छोड़ देगी यदि जनता,तब क्या होगा रे
नज़र आरहा सूरज ढलता,अब क्या होगा रे
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
साथ छोड़ कर भागी ममता,अब क्या होगा रे
नज़र आ रहा सूरज ढलता, अब क्या होगा रे
नहीं मुलायम,रहते कायम,अपने वादों पर
नज़र बड़ी आवश्यक रखना,गुप्त इरादों पर
उनका सपना,पी एम् पद का,अब क्या होगा रे
नज़र आरहा सूरज ढलता,अब क्या होगा रे
माया महा ठगिनी हम जानी,आनी जानी है
कब इसका रुख बदल जाए, ये घाघ पुरानी है
यदि उसने जो पाला पलता,तब क्या होगा रे
नज़र आ रहा सूरज ढलता,अब क्या होगा रे
अब तो करूणानिधि से ही करुणा की आशा है
सी बी आइ का दबाब भी अच्छा खासा है
साम दाम से काम न बनता,तब क्या होगा रे
नजर आरहा सूरज ढलता,अब क्या होगा रे
सब चीजों के दाम बढ़ गए,जनता है अकुलायी
सुरसा जैसी मुख फैलाती,रोज रोज मंहगाई
साथ छोड़ देगी यदि जनता,तब क्या होगा रे
नज़र आरहा सूरज ढलता,अब क्या होगा रे
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Wednesday, September 19, 2012
अंग्रेजी का भूत
अंग्रेजी का भूत
हमारी एक पड़ोसन,
एकदम देशी अंग्रेजन
वैसे तो फूहड़ लगती थी
पर अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करने में,
अपनी शान समझती थी
हिंदी से परहेज था,
उनके घर का हर सदस्य,
पूरा अंग्रेज था
एक दिन हम उनके घर गये,
करने मुलाक़ात
हो रही थी इधर उधर की बात
इतने में ही उनका बच्चा बोला,
मम्मी,बाथरूम आ रहा है
हमने इधर उधर देखा और बोले,
हमें तो कहीं भी बाथरूम,
आता नज़र नहीं आरहा है
क्या आजकल मोबाईल बाथरूम भी आता है
जो ड्राइंग रूम में भी चला आता है
मेडम बोली,भाई साहब,
बच्चे को बाथरूम जाना है
हम बोले इसी सर्दी में,
क्या रात को नहाना है
वोबोली,नहीं,नहीं,बच्चे को सु सु आ रही है
बच्चा बोला,मम्मी ,आ नहीं रही,आ गयी है
मेडम ,गुस्से में लाल पीली थी
हमने देखा,बच्चे की चड्ढी गीली थी
एक दिन वो अपने पति के साथ,
हमारे घर आई
हमारी पत्नीजी ने गरम गरम पकोड़ी बनायी
उनके पतीजी ने फटाफट पांच छह पकोड़ी खाली
तभी बोली उनकी घरवाली
अरे आज तो आपका मंगल का फास्ट था
तो पति बोले,ओह' शिट 'मैंने तो खा ली
हमने बजायी ताली
और बोले भी साहेब,आपने 'शिट 'नहीं,
पकोड़ी है खाई
हमारी बात सुन वो सकपकाई
बोली भाई साहेब,'ओह शिट' इनका तकिया कलाम है
अंग्रेजी उपन्यासों में ये बड़ा आम है
एक दिन उनके पतीजी थे घर पर
हमारी पत्नी ने पूंछ लिया ,
क्या भाई साहेब की तबियत ठीक नहीं है,
जो वो नहीं गये है दफ्तर
पड़ोसन बोली वैसे तो तबियत ठीक है,
हो रहे हैं पर 'मोशन'
हमारी पत्नी ने कहा 'कानग्रेचुलेशन'
कब दे रही हो प्रमोशन की पार्टी
वो झल्लाई काहे की पार्टी
उन्हें सुबह से 'लूज मोशन 'हो रहे है,
वो पस्त है
पत्नी बोली सीधे सीधे बोलो ना,
लग गये दस्त है
इन कई वारदातों के बाद,
आजकल हमसे वो,
संभल कर जुबान खोलती है
जब भी बोलती है,हिंदी में बोलती है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
हमारी एक पड़ोसन,
एकदम देशी अंग्रेजन
वैसे तो फूहड़ लगती थी
पर अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करने में,
अपनी शान समझती थी
हिंदी से परहेज था,
उनके घर का हर सदस्य,
पूरा अंग्रेज था
एक दिन हम उनके घर गये,
करने मुलाक़ात
हो रही थी इधर उधर की बात
इतने में ही उनका बच्चा बोला,
मम्मी,बाथरूम आ रहा है
हमने इधर उधर देखा और बोले,
हमें तो कहीं भी बाथरूम,
आता नज़र नहीं आरहा है
क्या आजकल मोबाईल बाथरूम भी आता है
जो ड्राइंग रूम में भी चला आता है
मेडम बोली,भाई साहब,
बच्चे को बाथरूम जाना है
हम बोले इसी सर्दी में,
क्या रात को नहाना है
वोबोली,नहीं,नहीं,बच्चे को सु सु आ रही है
बच्चा बोला,मम्मी ,आ नहीं रही,आ गयी है
मेडम ,गुस्से में लाल पीली थी
हमने देखा,बच्चे की चड्ढी गीली थी
एक दिन वो अपने पति के साथ,
हमारे घर आई
हमारी पत्नीजी ने गरम गरम पकोड़ी बनायी
उनके पतीजी ने फटाफट पांच छह पकोड़ी खाली
तभी बोली उनकी घरवाली
अरे आज तो आपका मंगल का फास्ट था
तो पति बोले,ओह' शिट 'मैंने तो खा ली
हमने बजायी ताली
और बोले भी साहेब,आपने 'शिट 'नहीं,
पकोड़ी है खाई
हमारी बात सुन वो सकपकाई
बोली भाई साहेब,'ओह शिट' इनका तकिया कलाम है
अंग्रेजी उपन्यासों में ये बड़ा आम है
एक दिन उनके पतीजी थे घर पर
हमारी पत्नी ने पूंछ लिया ,
क्या भाई साहेब की तबियत ठीक नहीं है,
जो वो नहीं गये है दफ्तर
पड़ोसन बोली वैसे तो तबियत ठीक है,
हो रहे हैं पर 'मोशन'
हमारी पत्नी ने कहा 'कानग्रेचुलेशन'
कब दे रही हो प्रमोशन की पार्टी
वो झल्लाई काहे की पार्टी
उन्हें सुबह से 'लूज मोशन 'हो रहे है,
वो पस्त है
पत्नी बोली सीधे सीधे बोलो ना,
लग गये दस्त है
इन कई वारदातों के बाद,
आजकल हमसे वो,
संभल कर जुबान खोलती है
जब भी बोलती है,हिंदी में बोलती है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
तुम भी भूखी,मै भी भूखा,आज तुमने व्रत रखा.....
तुम भी भूखी,मै भी भूखा,आज तुमने व्रत रखा.....
प्रश्न मेरे जहन में ,उठता ये कितनी बार है
आग क्यों दिल में लगाता,तुम्हारा दीदार है
जिसके कारण नाचता मै,इशारों पर तुम्हारे,
ये तुम्हारा हुस्न है या फिर तुम्हारा प्यार है
रसभरे गुलाबजामुन सी मधुर 'हाँ 'है तेरी,
और करारे पकोड़ों सा,चटपटा इनकार है
प्यार से नज़रें उठा कर,मुस्करा देती हो तुम,
महकने लगता ख़ुशी से,ये मेरा गुलजार है
तुम भी भूखे,हम भी भूखे,आज तुमने व्रत रखा,
प्यार जतलाने का ये भी अनोखा व्यवहार है
बेकरारी बढाती है ,ये तुम्हारी शोखियाँ,
और दिल को सुकूं देता, तुम्हारा इकरार है
नयी साड़ी मंगाई थी,सज संवरने के लिए,
और अब उस साड़ी में भी ,तुम्हे लगता भार है
आज हमने तय किया है,यूं नहीं पिघलेंगे हम,
देखते हैं आपके,जलवों में कितनी धार है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
प्रश्न मेरे जहन में ,उठता ये कितनी बार है
आग क्यों दिल में लगाता,तुम्हारा दीदार है
जिसके कारण नाचता मै,इशारों पर तुम्हारे,
ये तुम्हारा हुस्न है या फिर तुम्हारा प्यार है
रसभरे गुलाबजामुन सी मधुर 'हाँ 'है तेरी,
और करारे पकोड़ों सा,चटपटा इनकार है
प्यार से नज़रें उठा कर,मुस्करा देती हो तुम,
महकने लगता ख़ुशी से,ये मेरा गुलजार है
तुम भी भूखे,हम भी भूखे,आज तुमने व्रत रखा,
प्यार जतलाने का ये भी अनोखा व्यवहार है
बेकरारी बढाती है ,ये तुम्हारी शोखियाँ,
और दिल को सुकूं देता, तुम्हारा इकरार है
नयी साड़ी मंगाई थी,सज संवरने के लिए,
और अब उस साड़ी में भी ,तुम्हे लगता भार है
आज हमने तय किया है,यूं नहीं पिघलेंगे हम,
देखते हैं आपके,जलवों में कितनी धार है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Tuesday, September 18, 2012
पशुवत जीवन
पशुवत जीवन
बचपन में,
हम खरगोश की तरह होते है
नन्हे,मासूम,कोमल,मुलायम,
मुस्कराते रहते है
किलकारियां भरते है
प्यार और दुलार की,
हरी हरी घास चरते है
किशोरावस्था में,
हिरन की तरह कुलांछे लगाते है
या बारहसिंघा की तरह,
अपने सींगों पर इतराते है
और जवानी में,
कभी दूध देती गाय की तरह रंभाते है
कभी कंगारू की तरह,
अपने बच्चों को सँभालते है
कभी शेर की तरह दहाड़ते है
कभी हाथी की तरह चिंघाड़ते है
और बुढ़ापे के रेगिस्थान में,
ऊँट की तरह,
प्यार के नखलिस्थान की तलाश करते है
लम्बी उम्र की तरह,
अपनी लम्बी गर्दन उचका उचका ,
कांटे भरी झाड़ियों में,
हरी हरी पत्तियां दूंढ ढूंढ,
अपना पेट भरते है
सदा गधों सा बोझा ढोतें है
हम उम्र भर,
पशुवत जीवन जी रहे होते है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
बचपन में,
हम खरगोश की तरह होते है
नन्हे,मासूम,कोमल,मुलायम,
मुस्कराते रहते है
किलकारियां भरते है
प्यार और दुलार की,
हरी हरी घास चरते है
किशोरावस्था में,
हिरन की तरह कुलांछे लगाते है
या बारहसिंघा की तरह,
अपने सींगों पर इतराते है
और जवानी में,
कभी दूध देती गाय की तरह रंभाते है
कभी कंगारू की तरह,
अपने बच्चों को सँभालते है
कभी शेर की तरह दहाड़ते है
कभी हाथी की तरह चिंघाड़ते है
और बुढ़ापे के रेगिस्थान में,
ऊँट की तरह,
प्यार के नखलिस्थान की तलाश करते है
लम्बी उम्र की तरह,
अपनी लम्बी गर्दन उचका उचका ,
कांटे भरी झाड़ियों में,
हरी हरी पत्तियां दूंढ ढूंढ,
अपना पेट भरते है
सदा गधों सा बोझा ढोतें है
हम उम्र भर,
पशुवत जीवन जी रहे होते है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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