वकील या श्री कृष्ण
झगडा जोरू ,जमीन और ज़र का
ये किस्सा तो है हर घर का
भाई भाई के परिवार
जब हो आपस में लड़ने को तैयार
और किसी के मन में ये ख्याल आ जाय
भाई और रिश्तेदारों से क्यों लड़ा जाय
ऐसे में जो लडाई करने को उकसाता है
वो या तो वकील होता है,
या श्री कृष्ण कहलाता है
घोटू
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Thursday, December 13, 2012
पक्षपात
पक्षपात
जब होता है समुद्र मंथन
तो दानव और देवता गण
करते है बराबर की मेहनत
पर जब निकलता है अमृत
तो विष्णु भगवान,मोहिनी रूप धर
सिर्फ देवताओं को अमृत बाँट कर
स्पष्ट ,करते पक्षपात है
बरसों से चली आ रही ये बात है
जो सत्ता में है,राज्य करते है
अपने अपनों का घर भरते है
अपनों को ही ठेका और प्रमोशन
टू जी ,या कोल ब्लोक का आबंटन
देकर परंपरा निभा रहे है
तो लोग क्यों हल्ला मचा रहे है ?
घोटू
जब होता है समुद्र मंथन
तो दानव और देवता गण
करते है बराबर की मेहनत
पर जब निकलता है अमृत
तो विष्णु भगवान,मोहिनी रूप धर
सिर्फ देवताओं को अमृत बाँट कर
स्पष्ट ,करते पक्षपात है
बरसों से चली आ रही ये बात है
जो सत्ता में है,राज्य करते है
अपने अपनों का घर भरते है
अपनों को ही ठेका और प्रमोशन
टू जी ,या कोल ब्लोक का आबंटन
देकर परंपरा निभा रहे है
तो लोग क्यों हल्ला मचा रहे है ?
घोटू
मधुर मिलन की पहली रात
मधुर मिलन की पहली रात
मेंहदी से तेरे हाथ रचे ,और प्यार रचा मेरे मन में
मुझको पागल सा कर डाला ,तेरी शर्मीली चितवन में
तेरे कंगन की खन खन सुन ,
है खनक उठी मेरी नस नस
तेरी मादक,मदभरी महक,
है खींच रही मुझको बरबस
नाज़ुक से हाथों को सहला ,
मन बहला नहीं,बदन दहला
हूँ विकल ,करू किस तरह पहल,
यह मिलन हमारा है पहला
मन हुआ ,बावला सा अधीर,है ऐसी अगन लगी तन में
मेंहदी से तेरे हाथ रचे, और प्यार रचा मेरे मन में
मन का मयूर है नाच रहा,
हो कर दीवाना मस्ती में
तुमने निहाल कर दिया मुझे,
बस कर इस दिल की बस्ती में
चन्दा सा मुखड़ा दिखला दो,
क्यों ढका हुआ घूंघट पट से
मतवाली ,रूप माधुरी का,
रसपान करूं ,अमृत घट से
सब लाज,शर्म को छोड़ छाड़ ,आओ बंध जाये बंधन में
मेंहदी से तेरे हाथ रचे ,और प्यार रचा मेरे मन में
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मेंहदी से तेरे हाथ रचे ,और प्यार रचा मेरे मन में
मुझको पागल सा कर डाला ,तेरी शर्मीली चितवन में
तेरे कंगन की खन खन सुन ,
है खनक उठी मेरी नस नस
तेरी मादक,मदभरी महक,
है खींच रही मुझको बरबस
नाज़ुक से हाथों को सहला ,
मन बहला नहीं,बदन दहला
हूँ विकल ,करू किस तरह पहल,
यह मिलन हमारा है पहला
मन हुआ ,बावला सा अधीर,है ऐसी अगन लगी तन में
मेंहदी से तेरे हाथ रचे, और प्यार रचा मेरे मन में
मन का मयूर है नाच रहा,
हो कर दीवाना मस्ती में
तुमने निहाल कर दिया मुझे,
बस कर इस दिल की बस्ती में
चन्दा सा मुखड़ा दिखला दो,
क्यों ढका हुआ घूंघट पट से
मतवाली ,रूप माधुरी का,
रसपान करूं ,अमृत घट से
सब लाज,शर्म को छोड़ छाड़ ,आओ बंध जाये बंधन में
मेंहदी से तेरे हाथ रचे ,और प्यार रचा मेरे मन में
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Friday, December 7, 2012
हवायें
हवायें
हमारी हर सांस में बसती हवायें
सांस ही तो सभी का जीवन चलाये
देह सबकी ,पंचतत्वों से बनी है
तत्व उन में ,एक होती, हवा भी है
कभी शीतल मंद बहती है सुहाती
कभी लू बन ,गर्मियों में तन जलाती
है बड़ी बलवान ,जब होती खफा है
विनाशक तूफ़ान लाती हर दफा है
पेट ना भरता हवा से ,सभी जाने
घूमने ,सब मगर जाते,हवा खाने
चार पैसे ,जब किसी के पास ,जुड़ते
बात करते है हवा में, लोग उड़ते
मगर जब तकदीर अपना रंग दिखाती
हवा ,अच्छे अच्छों की है खिसक जाती
चली फेशन की हवा तो घटे कपडे
लगी पश्चिम की हवा तो लोग बिगड़े
नहीं दिखती ,हर जगह ,मौजूद है पर
चल रहा जीवन सभी का ,हवा के बल
घोटू
हमारी हर सांस में बसती हवायें
सांस ही तो सभी का जीवन चलाये
देह सबकी ,पंचतत्वों से बनी है
तत्व उन में ,एक होती, हवा भी है
कभी शीतल मंद बहती है सुहाती
कभी लू बन ,गर्मियों में तन जलाती
है बड़ी बलवान ,जब होती खफा है
विनाशक तूफ़ान लाती हर दफा है
पेट ना भरता हवा से ,सभी जाने
घूमने ,सब मगर जाते,हवा खाने
चार पैसे ,जब किसी के पास ,जुड़ते
बात करते है हवा में, लोग उड़ते
मगर जब तकदीर अपना रंग दिखाती
हवा ,अच्छे अच्छों की है खिसक जाती
चली फेशन की हवा तो घटे कपडे
लगी पश्चिम की हवा तो लोग बिगड़े
नहीं दिखती ,हर जगह ,मौजूद है पर
चल रहा जीवन सभी का ,हवा के बल
घोटू
Thursday, December 6, 2012
सब कुछ गुम हो गया
पते की बात
सब कुछ गुम हो गया
रात की नीरवता ,ट्रक और बसों की ,
चिन्धाड़ों में गुम हो गयी
दादी नानी की कहानियां,टी वी के,
सीरियलों में गुम हो गयी
बच्चों के चंचलता ,स्कूल के ,
होमवर्क के बोझ से गुम हो गयी
परिवार की हंसीखुशी ,बढती हुई ,
मंहगाई के बोझ से गुम हो गयी
आदमी की भावनाएं और प्यार ,
भौतिकता के भार तले गुम हो गया
घर के देशी खाने का स्वाद ,
पीज़ा और बर्गर के क्रेज़ में गुम हो गया
अब तो बस,मशीनवत ,जीवन सब जीते है
भरे हुए दिखते है ,अन्दर से रीते है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
सब कुछ गुम हो गया
रात की नीरवता ,ट्रक और बसों की ,
चिन्धाड़ों में गुम हो गयी
दादी नानी की कहानियां,टी वी के,
सीरियलों में गुम हो गयी
बच्चों के चंचलता ,स्कूल के ,
होमवर्क के बोझ से गुम हो गयी
परिवार की हंसीखुशी ,बढती हुई ,
मंहगाई के बोझ से गुम हो गयी
आदमी की भावनाएं और प्यार ,
भौतिकता के भार तले गुम हो गया
घर के देशी खाने का स्वाद ,
पीज़ा और बर्गर के क्रेज़ में गुम हो गया
अब तो बस,मशीनवत ,जीवन सब जीते है
भरे हुए दिखते है ,अन्दर से रीते है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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