उम्मीद का दिया
कुछ न कुछ हममे ही शायद कमी रही होगी
या कि किस्मत ही हमारी सही नहीं होगी
जो कि तुमने ये दिल तोड़ने का काम किया
छोड़ कर हमको ,हाथ गैर का है थाम लिया
तुम्हारे मन में यदि शिकवा कोई रहा होता
शिकायत हमसे की होती,हमें कहा होता
करते कोशिश,गिला दूर कर,मनाने की
इस तरह ,क्या थी जरूरत ,तुम्हे यूं जाने की
हमने ,हरदम तुम्हारी ख्वाइशों का ख्याल रखा
तुम्हारी,जरूरतों,फरमाइशों का ख्याल रखा
कभी गलती से अगर हमसे हुई कोई खता
तुम्हारा हक था,हमें प्यार से तुम देती बता
मगर तुम मौन रही ,ओढ़ करके ख़ामोशी
तुम्हारा जीत न विश्वास सके, हम दोषी
मगर तुमने जो है ये रास्ता अख्तियार किया
छोड़ कर हमको ,किसी गैर से है प्यार किया
खैर,अब जो भी गया है गुजर,गुजरना था
यूं ही ,तिल तिल ,तुम्हारे बिन हमें तड़फना था
मिलोगी एक दिन ,आशा लगाए बैठे है
हम तो उम्मीद का दिया जलाये बैठे है
फिर से आएगी खुशनसीबियाँ ,देगी दस्तक
करेंगे इन्तजार आपका ,क़यामत तक
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Friday, January 18, 2013
हम खाने में अव्वल नंबर
हम खाने में अव्वल नंबर
कभी समोसा,इडली डोसा,
कभी उतप्पम और साम्बर है
हम हिन्दुस्तानी दुनिया में ,
खाने में अव्वल नंबर है
फल सब्जी को दुनिया में सब,
फल सब्जी जैसे खाते है
पर हम गाजर,लौकी,आलू,
सबका हलवा बनवाते है
भला सोच सकता था कोई ,
कि भूरे कद्दू को लेकर
बने आगरे वाला पेठा ,
अंगूरी ,केसर का मनहर
परवल की सब्जी से भी तो,
हम स्वादिष्ट मिठाई बनाते
आलू,प्याज और पालक की ,
गरमागरम पकोड़ी खाते
आलू की टिक्की खाते है ,
आलू बड़ा ,पाँव और भाजी
सब्जी से ज्यादा सब्जी के ,
व्यंजन खाकर होते राजी
खाने की हर एक चीज में ,
हम बस देते,लज्जत भर है
हम हिन्दुस्तानी दुनिया में ,
खाने में अव्वल नंबर है
बना दूध से रबड़ी ,खुरचन,
कलाकंद और पेड़े प्यारे
दूध फाड़ ,छेने से बनते,
चमचम,रसगुल्ले ,रसवाले
जमा दूध को दही जमाते,
लस्सी और श्रीखंड खाते
आइसक्रीम और कुल्फी से ,
हम गर्मी से राहत पाते
तिल से बने रेवड़ी ,लड्डू ,
खस्ता गज़क ,सर्द मौसम में
मेथी,गोंद ,सौंठ ,मेवे के,
लड्डू खूब बनाए हमने
काजू,पिस्ता ,ड्राय फ्रूट से,
हमने कई मिठाई बनायी
ले गुलाब,गुलकंद बनाया ,
केसर की खुशबू रंग लायी
कभी खान्खरे ,कभी फाफड़े ,
कभी थेपले और पापड है
हम हिन्दुस्तानी दुनिया में ,
खाने में अव्वल नंबर है
मैदा सड़ा ,खमीर उठा कर,
अंग्रेजों ने ब्रेड बनायी
लेकिन हमने उस खमीर से ,
गरमा गरम जलेबी खायी
मोतीचूर बने बेसन से ,
लड्डू,बूंदी,सेव,पकोड़ी
उड़द दाल से बने इमरती ,
हमने कोई चीज न छोड़ी
आटा ,सूजी ,बेसन ,मैदा ,
दाल मूंग की ,या बादामे
ऐसी कोई चीज न जिसका ,
हलवा नहीं बनाया हमने
बारीक रेशे वाली फीनी ,
जाली वाले , घेवर प्यारे
मालपुवे ,मीठे मलाई के,
और गुलाब जामुन मतवाले
चाट ,दही भल्ले ,ललचाते ,
मुंह में आता पानी भर है
हम हिन्दुस्तानी दुनिया में,
खाने में अव्वल नंबर है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
कभी समोसा,इडली डोसा,
कभी उतप्पम और साम्बर है
हम हिन्दुस्तानी दुनिया में ,
खाने में अव्वल नंबर है
फल सब्जी को दुनिया में सब,
फल सब्जी जैसे खाते है
पर हम गाजर,लौकी,आलू,
सबका हलवा बनवाते है
भला सोच सकता था कोई ,
कि भूरे कद्दू को लेकर
बने आगरे वाला पेठा ,
अंगूरी ,केसर का मनहर
परवल की सब्जी से भी तो,
हम स्वादिष्ट मिठाई बनाते
आलू,प्याज और पालक की ,
गरमागरम पकोड़ी खाते
आलू की टिक्की खाते है ,
आलू बड़ा ,पाँव और भाजी
सब्जी से ज्यादा सब्जी के ,
व्यंजन खाकर होते राजी
खाने की हर एक चीज में ,
हम बस देते,लज्जत भर है
हम हिन्दुस्तानी दुनिया में ,
खाने में अव्वल नंबर है
बना दूध से रबड़ी ,खुरचन,
कलाकंद और पेड़े प्यारे
दूध फाड़ ,छेने से बनते,
चमचम,रसगुल्ले ,रसवाले
जमा दूध को दही जमाते,
लस्सी और श्रीखंड खाते
आइसक्रीम और कुल्फी से ,
हम गर्मी से राहत पाते
तिल से बने रेवड़ी ,लड्डू ,
खस्ता गज़क ,सर्द मौसम में
मेथी,गोंद ,सौंठ ,मेवे के,
लड्डू खूब बनाए हमने
काजू,पिस्ता ,ड्राय फ्रूट से,
हमने कई मिठाई बनायी
ले गुलाब,गुलकंद बनाया ,
केसर की खुशबू रंग लायी
कभी खान्खरे ,कभी फाफड़े ,
कभी थेपले और पापड है
हम हिन्दुस्तानी दुनिया में ,
खाने में अव्वल नंबर है
मैदा सड़ा ,खमीर उठा कर,
अंग्रेजों ने ब्रेड बनायी
लेकिन हमने उस खमीर से ,
गरमा गरम जलेबी खायी
मोतीचूर बने बेसन से ,
लड्डू,बूंदी,सेव,पकोड़ी
उड़द दाल से बने इमरती ,
हमने कोई चीज न छोड़ी
आटा ,सूजी ,बेसन ,मैदा ,
दाल मूंग की ,या बादामे
ऐसी कोई चीज न जिसका ,
हलवा नहीं बनाया हमने
बारीक रेशे वाली फीनी ,
जाली वाले , घेवर प्यारे
मालपुवे ,मीठे मलाई के,
और गुलाब जामुन मतवाले
चाट ,दही भल्ले ,ललचाते ,
मुंह में आता पानी भर है
हम हिन्दुस्तानी दुनिया में,
खाने में अव्वल नंबर है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Wednesday, January 16, 2013
बिन तुम्हारे
बिन तुम्हारे
क्या बतलाऊँ ,बिना तुम्हारे , कैसे कटती मेरी रातें
मिनिट मिनिट में नींद टूटती ,मिनिट मिनिट में सपने आते
बांह पसारूं,तो सूनापन,
तेरी बड़ी कमी लगती है
बिन ओढ़े सर्दी लगती है,
ओढूं तो गरमी लगती है
तेरी साँसों की सरगम बिन,
सन्नाटा छाया रहता है
करवट करवट ,बदल बदल कर,
ये तन अलसाया रहता है
ना तो तेरी भीनी खुशबू ,और ना मीठी ,प्यारी बातें
क्या बतलाऊँ ,बिना तुम्हारे ,कैसे कटती ,मेरी रातें
कितनी बार,जगा करता हूँ,
घडी देखता,फिर सो जाता
तकिये को बाहों में भरता ,
दीवाना सा ,मै हो जाता
थोड़ी सी भी आहट होती ,
तो एसा लगता तुम आई
संग तुम्हारे जो बीते थे,
याद आते वो पल सुखदायी
सूना सूना लगता बिस्तर ,ख्वाब मिलन के है तडफाते
क्या बतलाऊँ,बिना तुम्हारे, कैसे कटती , मेरी रातें
तुम जब जब, करवट लेती थी,
होती थी पायल की रुन झुन
बढ़ जाती थी ,दिल की धड़कन ,
खनक चूड़ियों की ,प्यारी सुन
अपने आप ,अचानक कैसे,
बाहुपाश में हम बंध जाते
बहुत सताती ,जब याद आती ,
वो प्यारी ,मदमाती राते
फिर से वो घडियां आयेंगी ,दिल को ढाढस ,यही बंधाते
क्या बतलाऊँ,बिना तुम्हारे, कैसे कटती ,मेरी रातें
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
क्या बतलाऊँ ,बिना तुम्हारे , कैसे कटती मेरी रातें
मिनिट मिनिट में नींद टूटती ,मिनिट मिनिट में सपने आते
बांह पसारूं,तो सूनापन,
तेरी बड़ी कमी लगती है
बिन ओढ़े सर्दी लगती है,
ओढूं तो गरमी लगती है
तेरी साँसों की सरगम बिन,
सन्नाटा छाया रहता है
करवट करवट ,बदल बदल कर,
ये तन अलसाया रहता है
ना तो तेरी भीनी खुशबू ,और ना मीठी ,प्यारी बातें
क्या बतलाऊँ ,बिना तुम्हारे ,कैसे कटती ,मेरी रातें
कितनी बार,जगा करता हूँ,
घडी देखता,फिर सो जाता
तकिये को बाहों में भरता ,
दीवाना सा ,मै हो जाता
थोड़ी सी भी आहट होती ,
तो एसा लगता तुम आई
संग तुम्हारे जो बीते थे,
याद आते वो पल सुखदायी
सूना सूना लगता बिस्तर ,ख्वाब मिलन के है तडफाते
क्या बतलाऊँ,बिना तुम्हारे, कैसे कटती , मेरी रातें
तुम जब जब, करवट लेती थी,
होती थी पायल की रुन झुन
बढ़ जाती थी ,दिल की धड़कन ,
खनक चूड़ियों की ,प्यारी सुन
अपने आप ,अचानक कैसे,
बाहुपाश में हम बंध जाते
बहुत सताती ,जब याद आती ,
वो प्यारी ,मदमाती राते
फिर से वो घडियां आयेंगी ,दिल को ढाढस ,यही बंधाते
क्या बतलाऊँ,बिना तुम्हारे, कैसे कटती ,मेरी रातें
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
असर -मौसम का
असर -मौसम का
आजकल का मौसम ,
ही इतना जालिम है ,
अच्छे भले लोगों की ,कमर तक टूट गयी
तुलसी जी को देखो ,
दो महीने पहले ही,
था इनका ब्याह हुआ,और बिलकुल सूख गयी
घोटू
आजकल का मौसम ,
ही इतना जालिम है ,
अच्छे भले लोगों की ,कमर तक टूट गयी
तुलसी जी को देखो ,
दो महीने पहले ही,
था इनका ब्याह हुआ,और बिलकुल सूख गयी
घोटू
Sunday, January 13, 2013
वक़्त वक़्त की बात
वक़्त वक़्त की बात
एक जवां मच्छर ने,कहा एक बूढ़े से,
आपके जमाने में ,बड़ी सेफ लाइफ थी
ना 'हिट 'ना' डी .डी .टी .'न ही 'आल आउट 'था,
और ना धुवां देती ,कछुवे की कोइल थी
एक आह ठंडी भर,बोला बूढा मच्छर,
वो तो सब ठीक मगर ,मौज तुम उड़ाते हो
आज के जमाने में ,है इतना खुल्लापन ,
जहाँ चाहो मस्ती से ,चुम्बन ले पाते हो
हमारे जमाने में,एक बड़ी मुश्किल थी,
औरतों का सारा तन,रहता था ,ढका ,ढका
तरस तरस जाते थे ,मुश्किल से कभी,कहीं,
चूमने का मौका हम,पाते थे यदा कदा
समुन्दर के तट पर या फिर स्विमिंग पूलों पर ,
खतरा भी कम है और रौनक भी ज्यादा है
तुम तो हो खुश किस्मत ,इस युग में जन्मे हो ,
तुम्हे मौज मस्ती के,मौके भी ज्यादा है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
एक जवां मच्छर ने,कहा एक बूढ़े से,
आपके जमाने में ,बड़ी सेफ लाइफ थी
ना 'हिट 'ना' डी .डी .टी .'न ही 'आल आउट 'था,
और ना धुवां देती ,कछुवे की कोइल थी
एक आह ठंडी भर,बोला बूढा मच्छर,
वो तो सब ठीक मगर ,मौज तुम उड़ाते हो
आज के जमाने में ,है इतना खुल्लापन ,
जहाँ चाहो मस्ती से ,चुम्बन ले पाते हो
हमारे जमाने में,एक बड़ी मुश्किल थी,
औरतों का सारा तन,रहता था ,ढका ,ढका
तरस तरस जाते थे ,मुश्किल से कभी,कहीं,
चूमने का मौका हम,पाते थे यदा कदा
समुन्दर के तट पर या फिर स्विमिंग पूलों पर ,
खतरा भी कम है और रौनक भी ज्यादा है
तुम तो हो खुश किस्मत ,इस युग में जन्मे हो ,
तुम्हे मौज मस्ती के,मौके भी ज्यादा है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
कल और आज
कल और आज
याद हमें आये है वो दिन ,
जब ना होते थे कंप्यूटर
चालीस तक के सभी पहाड़े,
बच्चे रटते रहते दिन भर
ना था इंटरनेट उन दिनों ,
और न होते थे मोबाईल
कभी ताश या फिर अन्ताक्षरी ,
बच्चे ,खेला करते सब मिल
ना था टी वी ,ना एम .पी ,थ्री ,
ना ही मल्टीप्लेक्स ,माल थे
ना ही को- एजुकेशन था ,
हम सब कितने मस्त हाल थे
हाथों में स्कूल बेग और ,
कोपी ,कलम, किताबें होती
रामायण के किस्से होते ,
देश प्रेम की बातें होती
रहता था परिवार इकठ्ठा,
पांच ,सात होते थे बच्चे
घर में चहल पहल रहती थी ,
सच वो दिन थे कितने अच्छे
अब तो छोटे छोटे से ,बच्चों,,
के हाथों में है मोबाईल
कंप्यूटर और लेपटोप के ,
बिना पढाई करना मुश्किल
नन्हे बच्चे जो कि अपना ,
फेस तलक ना खुद धो सकते
खोल फेस बुक,सारा दिन भर,
मित्रों से है बातें करते
अचरज,छोटे बच्चों में भी ,
पनप रहा ये नया ट्रेंड है
उमर दस बरस की भी ना है ,
दस से ज्यादा गर्ल फ्रेंड है
मेल भेजते फीमेलों को,
बात करें स्काईप पर मिल
ट्वीटर पर ट्विट करते रहते ,
हरदम ,हाथों में मोबाईल
हम खाते थे लड्डू,मठरी ,
ये खाते है पीज़ा ,बर्गर
ईयर फोन लगा कानों में,
गाने सुनते रहते दिन भर
क्योकि अब ,एक बेटा ,बेटी ,
एकाकी वाला बचपन है
मम्मी,पापा ,दोनों वर्किंग ,
भाग दौड़ वाला जीवन है
'हाय'हल्लो 'की फोर्मलिटी में,
अपनापन हो गया गौण है
इतना 'आई' हो गया हावी ,
'आई पेड 'है ,'आई फोन 'है
ये ही अगर तरक्की है तो ,
इससे हम पिछड़े अच्छे थे
मिलनसार थे,भोलापन था ,
प्यार मोहब्बत थी,सच्चे थे
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
याद हमें आये है वो दिन ,
जब ना होते थे कंप्यूटर
चालीस तक के सभी पहाड़े,
बच्चे रटते रहते दिन भर
ना था इंटरनेट उन दिनों ,
और न होते थे मोबाईल
कभी ताश या फिर अन्ताक्षरी ,
बच्चे ,खेला करते सब मिल
ना था टी वी ,ना एम .पी ,थ्री ,
ना ही मल्टीप्लेक्स ,माल थे
ना ही को- एजुकेशन था ,
हम सब कितने मस्त हाल थे
हाथों में स्कूल बेग और ,
कोपी ,कलम, किताबें होती
रामायण के किस्से होते ,
देश प्रेम की बातें होती
रहता था परिवार इकठ्ठा,
पांच ,सात होते थे बच्चे
घर में चहल पहल रहती थी ,
सच वो दिन थे कितने अच्छे
अब तो छोटे छोटे से ,बच्चों,,
के हाथों में है मोबाईल
कंप्यूटर और लेपटोप के ,
बिना पढाई करना मुश्किल
नन्हे बच्चे जो कि अपना ,
फेस तलक ना खुद धो सकते
खोल फेस बुक,सारा दिन भर,
मित्रों से है बातें करते
अचरज,छोटे बच्चों में भी ,
पनप रहा ये नया ट्रेंड है
उमर दस बरस की भी ना है ,
दस से ज्यादा गर्ल फ्रेंड है
मेल भेजते फीमेलों को,
बात करें स्काईप पर मिल
ट्वीटर पर ट्विट करते रहते ,
हरदम ,हाथों में मोबाईल
हम खाते थे लड्डू,मठरी ,
ये खाते है पीज़ा ,बर्गर
ईयर फोन लगा कानों में,
गाने सुनते रहते दिन भर
क्योकि अब ,एक बेटा ,बेटी ,
एकाकी वाला बचपन है
मम्मी,पापा ,दोनों वर्किंग ,
भाग दौड़ वाला जीवन है
'हाय'हल्लो 'की फोर्मलिटी में,
अपनापन हो गया गौण है
इतना 'आई' हो गया हावी ,
'आई पेड 'है ,'आई फोन 'है
ये ही अगर तरक्की है तो ,
इससे हम पिछड़े अच्छे थे
मिलनसार थे,भोलापन था ,
प्यार मोहब्बत थी,सच्चे थे
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
संक्रांति पर
संक्रांति पर
आया सूर्य मकर में ,आये नहीं तुम मगर
पर्व उत्तरायण का आया ,पर दिया न उत्तर
तिल तिल कर दिल जला,खिचड़ी बाल हो गये
और गज़क जैसे हम खस्ता हाल हो गये
अगन लोहड़ी की है तपा रही ,इस तन को
अब आ जाओ ,तड़फ रहा मन,मधुर मिलन को
मकर संक्रांति की शुभ कामनाये
घोटू
आया सूर्य मकर में ,आये नहीं तुम मगर
पर्व उत्तरायण का आया ,पर दिया न उत्तर
तिल तिल कर दिल जला,खिचड़ी बाल हो गये
और गज़क जैसे हम खस्ता हाल हो गये
अगन लोहड़ी की है तपा रही ,इस तन को
अब आ जाओ ,तड़फ रहा मन,मधुर मिलन को
मकर संक्रांति की शुभ कामनाये
घोटू
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