Thursday, January 24, 2013

सपनो के सौदागर से

         सपनो के सौदागर से

बहुत जिन्दाबादी के नारे सुने,
                        अब असली मुद्दों पे आओ जरा
करेंगे ये हम और करेंगे वो हम,
                      हमें कुछ तो कर के दिखाओ जरा
ये जनता दुखी है,परेशान  है,
                       उसे थोड़ी राहत  दिलाओ जरा
ये सुरसा सी बढती चली जारही ,
                      इस मंहगाई को तुम घटाओ जरा
भाषण से तो पेट भरता नहीं,
                        खाना मयस्सर  कराओ जरा
खरचते थे सौ ,मिलते पंद्रह थे,
                       नन्यान्वे  अब दिलाओ  जरा 
गरीबों के घर खाली रोटी बहुत,
                        गरीबों को रोटी  खिलाओ जरा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Wednesday, January 23, 2013

              खट्टा -मीठा

पत्नी जी बोली मुस्का कर
तुम तो कवि  हो मेरे डीयर
अपने मन की परते खोलो
मुझसे कुछ ऐसा तुम बोलो
जिससे मन खुश भी हो जाये
पति बोला क्या बोलूँ प्रियतम
तुम ही तो हो मेरा जीवन
किन्तु मुझे लगता है अक्सर
लानत है ऐसे जीवन पर

घोटू

Monday, January 21, 2013

माँ

                  माँ

कलकल करती ,मंद मंद बहती है अविरल
भरा हुआ है जिसमे ,प्यार भरा शीतल जल
दो तट बीच ,सदा जीवन जिसका मर्यादित
जो भी मिलता ,उसे प्यार से करती  सिंचित
गतिवान मंथर गति से बहती सरिता  है
ये मत पूछो ,माँ क्या है,माँ तो बस माँ है
सीधी सादी ,सरल मगर वो प्यार भरी है
अलंकार से होकर आभूषित  निखरी है
जिसमे ममता ,प्यार,छलकता अपनापन है
कभी प्रेरणा देती,विव्हल करती मन है
प्यार,गीत,संगीत भरी कोमल कविता है
ये मत पूछो माँ क्या है,माँ तो बस माँ है
यह जीवन तो कर्मक्षेत्र है ,कार्य करो तुम
सहो नहीं अन्याय ,किसी से नहीं डरो  तुम
मोह माया को छोड़ ,उठो,संघर्ष करो तुम
अपने 'खुद' को पहचानो ,उत्कर्ष करो तुम
जीवन पथ का पाठ पढ़ाती ,वो गीता है
ये मत पूछो माँ क्या है,माँ तो बस माँ है
जिसने तुम्हारे जीवन में कर उजियाला
मधुर प्यार की उष्मा देकर तुमको पाला
जिसकी किरणों से आलोकित होता जीवन
तम को हटा,राह जो दिखलाती है हरदम
अक्षुण उर्जा स्त्रोत ,दमकती वो सविता है
ये  मत पूछो ,माँ क्या है,माँ तो बस माँ है                  

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 


Saturday, January 19, 2013

क्यों होता है ऐसा ?

    क्यों होता है ऐसा ?

            क्यों होता है ऐसा  ये मालूम नहीं है
            लेकिन ऐसा होता है ये बात सही है 
एक बार जब आकर लस जाता है आलस
उठने की कोशिश करो,झपकी आती बस
मन करता बस लेटे रहो ,रजाई    ओढ़े
सुस्ती साथ न छोड़े,बीबी    हाथ न  छोड़े
             सर्दी के मौसम में होता   सदा यही है    
              क्यों होता है ऐसा ,ये मालूम   नहीं है
देख किसी सुन्दर ललना को दिल  ललचाये
उससे करें दोस्ती और  मिलना  मन चाहे 
तुम्हे पता है ,तुम बूढ़े हो,वो जवान   है
लार मगर फिर भी टपकाती ये जुबान है
               ग़ालिब ने सच कहा ,इश्क पर जोर नहीं है
                क्यों होता है  ऐसा         ये मालूम नहीं है 
देख देख कर,दुनिया भर के ये आकर्षण
ये भी पा लूं,वो भी पा लूं,करता है मन
जब कि  पता है ,तुम्हारी जेबें है खाली
पेट भरेगी ,दाल और रोटी , घर वाली
                 मगर लालसा करने पर तो रोक नहीं है  
                   क्यों होता है ऐसा  ये मालूम नहीं है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, January 18, 2013

स्वाभिमान

               स्वाभिमान

किया प्रयास ,दिखूं  अच्छा ,पर दिख न सका मै
ना चाहा था बिकना मैंने, बिक न  सका  मै
मेरे आगे था मेरा स्वाभिमान  आ गया
मै जैसा भी हूँ,अच्छा हूँ, ज्ञान    आ गया
नहीं चाहता था,विनम्र बन,हाथ जोड़ कर
अपने चेहरे पर नकली  मुस्कान ओढ़ कर
करू प्रभावित उनको और मै उन्हें  रिझाऊ
उनसे रिश्ता जोडूं ,अपना  काम बनाऊ
पर मै जैसा हूँ,वैसा यदि उन्हें सुहाए
मेरे असली रूप रंग में ,यदि अपनाएँ
तो ही ठीक रहेगा ,धोका क्यों दूं उनको
करें शिकायत ,ऐसा मौका क्यों दूं उनको
पर्दा उठ ही जाता,शीध्र बनावट पन  का
मिलन हमेशा ,सच्चा होता,मन से मन का

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 

दिल्ली का मौसम -आज का

      दिल्ली का मौसम -आज का 

रात बारिश हुई थी और गिरे थे ओले,
               बिजलियाँ चमकी थी और खूब घिरे थे बादल
आज तो भोर से ही छा रहा घना कोहरा,
                हवायें ,तेज भी है,सर्द भी है और   चंचल
बड़ी ही ठण्ड है ,छाया है अँधेरा दिन में ,
                सुबह से आज तो सूरज भी हो गया गुम है
आओ हम बैठ कर बिस्तर में पकोड़े खायें ,
                 रजाई में दुबक के रहने का ये मौसम है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'    

अपनी अपनी किस्मत

       अपनी अपनी किस्मत

जब तक बदन में था छुपा ,पानी वो पाक था,
बाहर  जो निकला पेट से ,पेशाब बन गया
बंधा हुआ था जब तलक,सौदा  था लाख का,
मुट्ठी खुली तो लगता है वो खाक बन गया
कितनी ही बातें राज की,अच्छी दबी हुई,
बाहर जो निकली पेट से  ,फसाद बन गया
हासिल जिसे न कर सके ,जब तक रहे जगे,
सोये तो ,ख्याल ,नींद में आ  ख्वाब बन गया
जब तक दबा जमीं में था,पत्थर था एक सिरफ ,
हीरा निकल के खान से ,नायाब   बन गया
कल तक गली का गुंडा था ,बदमाश ,खतरनाक,
नेता बना तो गाँव की वो नाक बन गया
काँटों से भरी डाल पर  ,विकसा ,बढ़ा हुआ ,
वो देखो आज महकता  गुलाब बन गया
घर एक सूना हो गया ,बेटी  बिदा  हुई,
तो घर किसी का बहू पा ,आबाद हो गया
अच्छा है कोई छिप के और अच्छा  कोई खुला,
नुक्सान में था कोई,कोई लाभ बन गया
किस का नसीब क्या है,किसी को नहीं खबर,
अंगूर को ही देखलो ,शराब   बन  गया 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'