मेरा दिल कमजोर हो गया
तब भी था कमजोर हुआ जब देखा पहली बार तुम्हे
होकर पागल दीवाना सा ,ये कर बैठा प्यार तुम्हे
ऐसी डोर बंध गयी फिर तो,तुम्हारे संग नातों में
पड़ जाता कमजोर बिचारा ,तुम्हारी हर बातों में
इतना तुमने प्यार जताया ,मन आनंद विभोर हो गया
मेरा दिल कमजोर हो गया
फिर बच्चों की जिद या हठ का,इस पर इतना जोर पड़ा
कभी प्यार से या गुस्से से ,ये हरदम कमजोर पड़ा
दफ्तर में साहब की घुड़की ,इस दिल को धड़काती थी
सीमित साधन और बढती मंहगाई इसे सताती थी
अब तो देखो ये विद्रोही बनकर के मुंहजोर हो गया
मेरा दिल कमजोर हो गया
धीरे धीरे ,साथ उमर के ,आई ऐसी कमजोरी
सांस फूलने लग जाती है,करने पर मेहनत थोड़ी
डोक्टर ने चेकिंग की और बतलाया कारण मुश्किल का
रक्त प्रवाह हो गया है कम ,तुम्हारे नाजुक दिल का
बढती उमर ,परेशानी का,अब कुछ ऐसा दौर हो गया
मेरा दिल कमजोर हो गया
मदन मोहन बहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Friday, February 8, 2013
आइना
आइना
सज संवर कर जब हुई तैयार वो ,
देखने खुद को लगी ले आइना
हम प्रतीक्षा में खड़े बेचैन है ,
और देखो, अब तलक वो आई ना
खुद से है या आईने से इश्क है,
बात अपनी समझ में ये आई ना
वो वहां पर और मै हूँ यंहां पर,
बहुत चुभती ,और कटे तनहाई ना
नहीं मुझको याद ऐसा कोई पल,
जब तुम्हारी याद मुझको आई ना
तरसते है तुम्हारे दीदार को,
खुली आँखें और दिल का आइना
आते ही जल्दी करोगी जाने की,
बात अपनी इसलिए बन पाई ना
इस तरह आओ कि जाओ ही नहीं,
जिस तरह पहले कभी तुम आई ना
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
ऋतू जब रंग बदलती है
ऋतू जब रंग बदलती है
सूरज मंद,छुपे कोहरे में, आये सर्दी का मौसम
बढ़ जाती है इतनी ठिठुरन,सिहर सिहर जाता है तन
साँसे,सर्द,शिथिल हो जाती,सहम सहम कर चलती है
ऋतू जब रंग बदलती है
कितने हरे भरे वृक्षों के , पत्ते पीले पड़ जाते
कर जाते सूना डालों को,साथ छोड़ कर उड़ जाते
झड़ते पात पुराने तब ही ,नयी कोंपलें खिलती है
ऋतू जब रंग बदलती है
तन जलता है,मन जलता है,सूरज इतना जलता है
अपना उग्र रूप दिखला कर,जैसे आग उगलता है
उसकी प्रखर तेज किरणों से,सारी जगती जलती है
ऋतू जब रंग बदलती है
आसमान में ,काले काले से ,बादल छा जाते है
तप्त धरा को शीतल करने,प्रेम नीर बरसाते है
माटी जब पानी में घुल कर,उसका रंग बदलती है
ऋतू जब रंग बदलती है
मदनमोहन बाहेती'घोटू'
Wednesday, February 6, 2013
जीवन बोध
जीवन बोध
आगम बोध,प्रसूति गृह में,निगमबोध श्मसान में
जीवनबोध बड़ी मुश्किल से ,आता है इंसान में
आता जब मानव दुनिया में ,होता उसको बोध कहाँ
भोलाभाला निश्छल बचपन,काम नहीं और क्रोध कहाँ
और जब जाता है तो उसको,बोध कहाँ रह पाता है
खाली हाथ लिए आता है,खाली हाथों जाता है
जिन के खातिर ,सारा जीवन,रहता है खटपट करता
नाते जाते छूट सभी से, सांस आखरी जब भरता
जीवन भर चिंता में जलता,चिता जलाती मरने पर
एक राख की ढेरी बन कर ,रह जाता अस्थिपंजर
कंचन काया ,जिस पर रहता ,था अभिमान जवानी में
अस्थि राख बन ,तर जाते है ,गंगाजी के पानी में
उसे बोध है,मृत्यु अटल है,फिर भी है अनजाना सा
मोह माया के चक्कर में फस,रहता है दीवाना सा
पास फ़ैल होता रहता है,जीवन के इम्तिहान में
जीवनबोध बड़ी मुश्किल से ,आता है इंसान में
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
आगम बोध,प्रसूति गृह में,निगमबोध श्मसान में
जीवनबोध बड़ी मुश्किल से ,आता है इंसान में
आता जब मानव दुनिया में ,होता उसको बोध कहाँ
भोलाभाला निश्छल बचपन,काम नहीं और क्रोध कहाँ
और जब जाता है तो उसको,बोध कहाँ रह पाता है
खाली हाथ लिए आता है,खाली हाथों जाता है
जिन के खातिर ,सारा जीवन,रहता है खटपट करता
नाते जाते छूट सभी से, सांस आखरी जब भरता
जीवन भर चिंता में जलता,चिता जलाती मरने पर
एक राख की ढेरी बन कर ,रह जाता अस्थिपंजर
कंचन काया ,जिस पर रहता ,था अभिमान जवानी में
अस्थि राख बन ,तर जाते है ,गंगाजी के पानी में
उसे बोध है,मृत्यु अटल है,फिर भी है अनजाना सा
मोह माया के चक्कर में फस,रहता है दीवाना सा
पास फ़ैल होता रहता है,जीवन के इम्तिहान में
जीवनबोध बड़ी मुश्किल से ,आता है इंसान में
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
माँ और बीबी
माँ और बीबी
1
माँ बीबी दोनों खड़े,किसको दूं तनख्वाह
बलिहारी माँ आपकी,बीबी दीनी लाय
बीबी दीनी लाय ,आपके मै गुण गाऊं
निशदिन सेवा करूं ,आपके चरण दबाऊं
अब हिसाब के चक्कर में क्यों पड़ती हो माँ
बहुत कर लिया काम,आप आराम करो माँ
2
तनख्वाह में माया बसे,पुत्र कहे समझाय
माया है ठगिनी बहुत,वेद ,पुराण बताय
वेद पुराण बताय,त्याग चिंताएं सारी
प्रभु को सिमरो ,डाल बहू पर जिम्मेदारी
'घोटू 'तनख्वाह क्या ,लाखों का तेरा बेटा
तेरी सेवा करने को हाजिर है बैठा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
1
माँ बीबी दोनों खड़े,किसको दूं तनख्वाह
बलिहारी माँ आपकी,बीबी दीनी लाय
बीबी दीनी लाय ,आपके मै गुण गाऊं
निशदिन सेवा करूं ,आपके चरण दबाऊं
अब हिसाब के चक्कर में क्यों पड़ती हो माँ
बहुत कर लिया काम,आप आराम करो माँ
2
तनख्वाह में माया बसे,पुत्र कहे समझाय
माया है ठगिनी बहुत,वेद ,पुराण बताय
वेद पुराण बताय,त्याग चिंताएं सारी
प्रभु को सिमरो ,डाल बहू पर जिम्मेदारी
'घोटू 'तनख्वाह क्या ,लाखों का तेरा बेटा
तेरी सेवा करने को हाजिर है बैठा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Tuesday, February 5, 2013
उलाहना
उलाहना
तुम ने मुझसे प्यार जता कर ,मीठी मीठी बातों में
मुझको दीवाना कर डाला ,नींद चुरा कर ,रातों में
मेरी तब नादान उमर थी,मै तो थी भोलीभाली
तुम्हे बसाया था आँखों में,करने दिल की रखवाली
ऐसे चौकीदार बने तुम,खुद ही लुटेरे बन बैठे
मेरे दिल को चुरा ले गए ,साजन मेरे बन बैठे
ऐसा जादू डाला मुझ पर,प्यार भरी सौगातों ने
मुझको दीवाना कर डाला ,नींद चुरा कर रातों में
दिल के संग संग चैन चुराया,नींद चुरायी आँखों की
किस से अब फ़रियाद करू,ये दौलत तो थी लाखों की
मै पागल सी ,हुई बावरी,दीवानी सी,लुट कर भी
तुम्हारे ख्यालों में खोई,ख़ुशी ख़ुशी,सब खोकर भी
अपना सब कुछ सौंप दिया है,अब तुम्हारे हाथों में
मुझको दीवाना कर डाला ,नींद चुरा कर ,रातों में
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Sunday, February 3, 2013
दूध और मानव
दूध और मानव
दूध के स्वभाव और मानव के स्वभाव को ,
एक जैसा बतलाते है
क्योंकि गरम होने पर दोनों उफन जाते है
दूध का उफनना ,चम्मच के हिलाने से ,थम जाता है
और धीरज के चम्मच से हिलाने से,
उफनता आदमी भी ,शांत बन जाता है
दूध ,जब पकाया जाता है ,
तो वह बंध जाता है पर खोया कहलाता है
आदमी भी ,शादी के बाद ,
गृहस्थी के बंधन में बंध जाता है ,
और बस खोया खोया ही नज़र आता है
जैसे दूध में जावन डालने से ,
वो जम जाता है,उसका स्वरुप बदल जाता है
और वो दही कहलाता है
वैसे ही ,पत्नी प्रेम का ,जरासा जावन ,
आदमी के मूलभूत स्वभाव में ,परिवर्तन लाता है
दूध पर ध्यान नहीं दो,
यूं ही पड़ा रहने दो ,तो वो फट जाता है
आदमी पर भी ,जब ध्यान नहीं दिया जाता,
तो उसका ह्रदय ,विदीर्ण हो कर,फट जाता है
दूध से कभी रबड़ी ,कभी कलाकंद,
कभी छेने की स्वादिष्ट मिठाई बनती है
बस इसके लिए,थोड़ी मिठास की जरूरत पड़ती है
उसी तरह,यदि आदमी का ,असली स्वाद जो पाना है
तो आपको बस ,मीठी मीठी बातें बनाना है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
दूध के स्वभाव और मानव के स्वभाव को ,
एक जैसा बतलाते है
क्योंकि गरम होने पर दोनों उफन जाते है
दूध का उफनना ,चम्मच के हिलाने से ,थम जाता है
और धीरज के चम्मच से हिलाने से,
उफनता आदमी भी ,शांत बन जाता है
दूध ,जब पकाया जाता है ,
तो वह बंध जाता है पर खोया कहलाता है
आदमी भी ,शादी के बाद ,
गृहस्थी के बंधन में बंध जाता है ,
और बस खोया खोया ही नज़र आता है
जैसे दूध में जावन डालने से ,
वो जम जाता है,उसका स्वरुप बदल जाता है
और वो दही कहलाता है
वैसे ही ,पत्नी प्रेम का ,जरासा जावन ,
आदमी के मूलभूत स्वभाव में ,परिवर्तन लाता है
दूध पर ध्यान नहीं दो,
यूं ही पड़ा रहने दो ,तो वो फट जाता है
आदमी पर भी ,जब ध्यान नहीं दिया जाता,
तो उसका ह्रदय ,विदीर्ण हो कर,फट जाता है
दूध से कभी रबड़ी ,कभी कलाकंद,
कभी छेने की स्वादिष्ट मिठाई बनती है
बस इसके लिए,थोड़ी मिठास की जरूरत पड़ती है
उसी तरह,यदि आदमी का ,असली स्वाद जो पाना है
तो आपको बस ,मीठी मीठी बातें बनाना है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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