पेट पूजा
आओ हम तुम बैठ
हाथों में ले प्लेट,
पहले पेट पूजा करें
अपना पेट भरें
क्योंकि कोई भी काम ठीक से,
तभी होता है,जब पेट भरता है
इस पापी पेट के कारण ,
आदमी क्या क्या नहीं करता है
पेट,शरीर का वो अंग है,
जो सबसे ज्यादा आलसी और सुस्त है
हाथ ,पाँव,मुंह,आँख और दांत,
सभी काम करते है,चुस्त है
पर पेट आराम से बैठा ,
इन अंगों से काम करवाता है
और बैठा बैठा ,मजे से खाता है
पेट,पेटी जैसा है,
इसमें सब कुछ समा जाता है
पेट की अपनी कोई पसंद नहीं होती,
वो जिव्हा की पसंद पर निर्भर है
जिव्हा ,स्वाद ले ले कर खाती है,
और बेचारा पेट,जाता भर है
जो भी मुंह,पीता या खाता है
पेट में चला जाता है
और पेट,बैठा बैठा उसे पचाता है
पेट में सिर्फ खाना पीना ही नहीं ,
कई चीजें जाती है
जैसे कोई खबर हो या राज की बात ,
औरतों के पेट में जाती है ,
मगर पच ना पाती है
नेताओं का पेट बड़ा मोटा होता है,
जिसमे करोड़ों की रिश्वत समां जाती है
फिर भी उनकी भूख नहीं जाती है
गरीब का पेट ,पिचका हुआ होता है,
और मेहनत मजदूरी करके ,जब वो कुछ खाता है
तब पीठ और पेट का अंतर नज़र आता है
लालाओं के पेट,काफी बड़े रहते है
जिसे तोंद कहते है
ये ऐसे लोग होते है,जो खूब खाते है ,
तोंद बढ़ाते है,
फिर तोंद के कारण ही परेशान रहते है
घबराहट में ,आदमी के पेट में पानी पड जाता है
और ज्यादा हंसने पर पेट में बल पड़ने लगते है
और ज्यादा भूख लगने पर,
पेट में चूहे दौड़ने लगते है
बाबा रामदेव ने टी वी पर
अपना पेट हिला हिला कर ,
करोड़ों भक्त बना लिए है
और अरबों कमा लियें है
समझदार महिलायें ,जानती है ,
कि पति को किस तरह पटाया जाता है
वो पति के पेट का ,पूरा ख्याल रखती है,
क्योंकि ,दिल का रास्ता ,पेट से होकर जाता है
पेट के खातिर ,कितनी ही नर्तकियां
बेली डांस करती है,पेट को नचा नचा
कोई भी काम ,अच्छी तरह करने के पहले ,
पेट की पूजा की जाती है
और कोई भी काम की सिद्धि के लिए,
बड़े पेट वाले याने लम्बोदर गणेश जी ,
को पूजा चढ़ाई जाती है
आदमी की जिंदगी का उदयकाल,
नौ महीने तक माँ के पेट में ही रहता है
और जिंदगी भर,आदमी ,पेट के चक्कर में ही,
दिन रात काम में ही लगा रहता है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Saturday, February 16, 2013
Friday, February 15, 2013
तुम बसंती -मै बसंती
तुम बसंती -मै बसंती
तुम बसंती ,मै बसंती
लग रही है बात बनती
गेंहू बाली सी थिरकती,
उम्र है बाली तुम्हारी
पवन के संग झूमती हो,
बड़ी सुन्दर,बड़ी प्यारी
आ रही तुम पर जवानी,
बीज भी भरने लगे है
और मै तरु आम्र का हूँ,
बौर अब खिलने लगे है
तुम बहुत मुझको लुभाती,
सच बताऊँ बात मन की
तुम बसंती, मै बसंती
लग रही है बात बनती
खेत सरसों के सुनहरे ,
में खड़ी तुम,लहलहाती
स्वर्ण सी आभा तुम्हारी,
प्रीत है मन में जगाती
डाल पर ,पलाश की मै ,
केसरी सा पुष्प प्यारा
मिलन की आशा संजोये ,
तुम्हे करता हूँ निहारा
पीत तुम भी,पीत मै भी,
आयें कब घड़ियाँ मिलन की
तुम बसंती,मै बसंती
लग रही है बात बनती
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
तुम बसंती ,मै बसंती
लग रही है बात बनती
गेंहू बाली सी थिरकती,
उम्र है बाली तुम्हारी
पवन के संग झूमती हो,
बड़ी सुन्दर,बड़ी प्यारी
आ रही तुम पर जवानी,
बीज भी भरने लगे है
और मै तरु आम्र का हूँ,
बौर अब खिलने लगे है
तुम बहुत मुझको लुभाती,
सच बताऊँ बात मन की
तुम बसंती, मै बसंती
लग रही है बात बनती
खेत सरसों के सुनहरे ,
में खड़ी तुम,लहलहाती
स्वर्ण सी आभा तुम्हारी,
प्रीत है मन में जगाती
डाल पर ,पलाश की मै ,
केसरी सा पुष्प प्यारा
मिलन की आशा संजोये ,
तुम्हे करता हूँ निहारा
पीत तुम भी,पीत मै भी,
आयें कब घड़ियाँ मिलन की
तुम बसंती,मै बसंती
लग रही है बात बनती
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मन- बसंत
मन- बसंत
मन बसंत था कल तक जो अब संत हो गया
अभिलाषा ,इच्छाओं का बस अंत हो गया
जब से मेरी ,प्राण प्रिया ने करी ,ठिठौली ,
राम करूं क्या ,बूढा मेरा कंत हो गया
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मन बसंत था कल तक जो अब संत हो गया
अभिलाषा ,इच्छाओं का बस अंत हो गया
जब से मेरी ,प्राण प्रिया ने करी ,ठिठौली ,
राम करूं क्या ,बूढा मेरा कंत हो गया
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Wednesday, February 13, 2013
मै क्या करूं
मै क्या करूं
पत्नी की सुनता तो 'जोरू का गुलाम'हूँ,
माँ की सुनता,तुम कहती 'मम्मी के चमचे'
बच्चों को डाटूँ तो कहलाता हूँ 'जालिम',
करूं प्यार तो कहती मै 'बिगाड़ता बच्चे'
घर पर रहता तो कहते मै 'घर घुस्सू'हूँ,
बाहर रहूँ घूमता 'आवारा ' कहलाता
कम खाता तो कहती मै 'कमजोर हो रहा',
'मोटे होकर फूल रहे' यदि ज्यादा खाता
खर्चा करता तो कहती हो 'खर्चीला 'हूँ,
ना करता तो कहती हो 'कंजूस'बहुत मै
मेरी समझ नहीं आता ,क्या करूं ना करूं ,
कोई बताये क्या करना कन्फ्यूज बहुत मै
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
पत्नी की सुनता तो 'जोरू का गुलाम'हूँ,
माँ की सुनता,तुम कहती 'मम्मी के चमचे'
बच्चों को डाटूँ तो कहलाता हूँ 'जालिम',
करूं प्यार तो कहती मै 'बिगाड़ता बच्चे'
घर पर रहता तो कहते मै 'घर घुस्सू'हूँ,
बाहर रहूँ घूमता 'आवारा ' कहलाता
कम खाता तो कहती मै 'कमजोर हो रहा',
'मोटे होकर फूल रहे' यदि ज्यादा खाता
खर्चा करता तो कहती हो 'खर्चीला 'हूँ,
ना करता तो कहती हो 'कंजूस'बहुत मै
मेरी समझ नहीं आता ,क्या करूं ना करूं ,
कोई बताये क्या करना कन्फ्यूज बहुत मै
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
वेलेन्टाइन डे -बुढ़ापे में
वेलेनटाइन सप्ताह
(चतुर्थ प्रस्तुति)
वेलेन्टाइन डे -बुढ़ापे में
मनायें वेलेन्टाइन,प्यार का ये तो दिवस है
उम्र के इस दौर के भी,चोंचलों में,बड़ा रस है
बढ़ रही है उमर अपनी ,
आप ये क्यों भूलती है
दर्द घुटनों में तुम्हारे ,
सांस मेरी फूलती है
मै तुम्हे गुलाब क्या दूं,
दाम मंहगे इस कदर है
तुम भी टेडी ,मै भी टेडा ,
हम खुदी टेडी बियर है
चाकलेटें ,ला न सकता ,
क्योंकि ये मुश्किल खड़ी है
तुम्हे भी है डायबीटीज ,
मेरी भी शक्कर बड़ी है
और पिक्चर भी चलें तो,
देख पायेंगें न पिक्चर
ध्यान होगा,युवा लड़के ,
लड़कियों की,हरकतों पर
पार्क में जाकर के घूमें,
उम्र ये ना अब हमारी
माल में जाकर न करनी,
व्यर्थ की खरीद दारी
प्यार का ये पर्व फिर हम,
आज कुछ ऐसे मनाये
तुम पकोड़ी तलो,हम तुम,
प्रेम से मिल,बैठ ,खायें
मै इकहत्तर ,तुम हो पेंसठ ,प्यार अपना जस का तस है
मनायें वेलेन्टाइन ,प्यार का ये तो दिवस है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
(चतुर्थ प्रस्तुति)
वेलेन्टाइन डे -बुढ़ापे में
मनायें वेलेन्टाइन,प्यार का ये तो दिवस है
उम्र के इस दौर के भी,चोंचलों में,बड़ा रस है
बढ़ रही है उमर अपनी ,
आप ये क्यों भूलती है
दर्द घुटनों में तुम्हारे ,
सांस मेरी फूलती है
मै तुम्हे गुलाब क्या दूं,
दाम मंहगे इस कदर है
तुम भी टेडी ,मै भी टेडा ,
हम खुदी टेडी बियर है
चाकलेटें ,ला न सकता ,
क्योंकि ये मुश्किल खड़ी है
तुम्हे भी है डायबीटीज ,
मेरी भी शक्कर बड़ी है
और पिक्चर भी चलें तो,
देख पायेंगें न पिक्चर
ध्यान होगा,युवा लड़के ,
लड़कियों की,हरकतों पर
पार्क में जाकर के घूमें,
उम्र ये ना अब हमारी
माल में जाकर न करनी,
व्यर्थ की खरीद दारी
प्यार का ये पर्व फिर हम,
आज कुछ ऐसे मनाये
तुम पकोड़ी तलो,हम तुम,
प्रेम से मिल,बैठ ,खायें
मै इकहत्तर ,तुम हो पेंसठ ,प्यार अपना जस का तस है
मनायें वेलेन्टाइन ,प्यार का ये तो दिवस है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Tuesday, February 12, 2013
इश्क पर जोर नहीं
वेलेन्टाइन सप्ताह
(तृतीय प्रस्तुति)
इश्क पर जोर नहीं
*कोई कहता प्रेम की सकडी गली है ,
एकसंग दो नहीं इसमें समा सकते
**कोई कहता प्रेम बिकता हाट में ना,
प्रेम के पौधे बगीचे में न लगते
***कोई कहता ढाई अक्षर प्रेम के जो,
ठीक से यदि पढ लिये ,पंडित बनोगे
#कोई कहती प्रेम की वो है दीवानी,
दर्द उसका समझ भी तुम ना सकोगे
$कोई कहती जानती यदि प्रीत का दुःख,
तो ढिढोरा पीटती ,जाकर नगर में
प्रीत कोई भी किसी से नहीं करना ,
प्रीत पीडायें बहुत देती जिगर में
प्रीत के निज अनुभवों पर,गीत,दोहे,
कई कवियों ने लिखे हैं,जब पढूं मै
जाता हूँ पड़ ,मै बहुत ही शंशोपज में,
प्रीत कोई से करूं या ना करूं मै
तब किसी ने कान में आ फुसफुसा कर,
फलसफा मुझको बताया आशिकी का
प्रीत की जाती नहीं,हो जाती है बस,
इश्क पर है जोर ना चलता किसी का
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
* प्रेम गली अति साकरी,जा में दो न समाय
**प्रेम न बड़ी उपजे ,नहीं बिकाये हाट
***ढाई आखर प्रेम का,पढ़े सो पंडित होय
#हे री मै तो प्रेम दीवानी ,मेरा दरद न जाने कोय
$सखी री जो मै जानती,प्रीत किये दुःख होय
नगर ढिढोरा पीटती,प्रीत न करियो कोय
(तृतीय प्रस्तुति)
इश्क पर जोर नहीं
*कोई कहता प्रेम की सकडी गली है ,
एकसंग दो नहीं इसमें समा सकते
**कोई कहता प्रेम बिकता हाट में ना,
प्रेम के पौधे बगीचे में न लगते
***कोई कहता ढाई अक्षर प्रेम के जो,
ठीक से यदि पढ लिये ,पंडित बनोगे
#कोई कहती प्रेम की वो है दीवानी,
दर्द उसका समझ भी तुम ना सकोगे
$कोई कहती जानती यदि प्रीत का दुःख,
तो ढिढोरा पीटती ,जाकर नगर में
प्रीत कोई भी किसी से नहीं करना ,
प्रीत पीडायें बहुत देती जिगर में
प्रीत के निज अनुभवों पर,गीत,दोहे,
कई कवियों ने लिखे हैं,जब पढूं मै
जाता हूँ पड़ ,मै बहुत ही शंशोपज में,
प्रीत कोई से करूं या ना करूं मै
तब किसी ने कान में आ फुसफुसा कर,
फलसफा मुझको बताया आशिकी का
प्रीत की जाती नहीं,हो जाती है बस,
इश्क पर है जोर ना चलता किसी का
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
* प्रेम गली अति साकरी,जा में दो न समाय
**प्रेम न बड़ी उपजे ,नहीं बिकाये हाट
***ढाई आखर प्रेम का,पढ़े सो पंडित होय
#हे री मै तो प्रेम दीवानी ,मेरा दरद न जाने कोय
$सखी री जो मै जानती,प्रीत किये दुःख होय
नगर ढिढोरा पीटती,प्रीत न करियो कोय
Monday, February 11, 2013
कुम्भ स्नान और हादसा
कुम्भ स्नान और हादसा
हरेक बारह वर्षों के बाद में
हरद्वार,उज्जैन,नासिक और प्रयाग में
आता है कुम्भ का पर्व महान
और खुल जाती है धर्म की दुकान
साधू,सन्यासी,संत और महंत
साधारण आदमी और श्रीमंत
सभी का रेला लगता है
बहुत बड़ा मेला लगता है
सर पर पोटली,मन में आस्था
बस से,रेल से,या चल पैदल रास्ता
भीड़ ल गा करती,पुण्य कमाने वालों की
एक डुबकी लगा कर के,मोक्ष पानेवालों की
धर्म के ठेकेदार बतलाते है
यहाँ एक खास दिन नहाने से ,पाप धुल जाते है
और मोक्ष के द्वार खुल जाते है
आज के जमाने में ,मोक्ष इतनी सस्ती मिल जाती है
पुण्य की लोभी ,जनता खिंची चली आती है
ग्रहों का एसा मिलन,बर्षों बाद होता है
ऐसे में स्नान और दान से ,पुण्य लाभ होता है
करोडो की भीड़
न ठिकाना न नीड़
डुबकी लगा कर,
पुण्य कमा कर ,
जब वापस जाती है
स्टेशनों पर भगदड़ मच जाती है
सेंकडो लोग इस भगदड़ में दब जाते है
कितनो के ही प्राण पंखेरू उड़ जाते है
कोई सरकार को दोषी ठहराता है
कोई इंतजाम की कमी बतलाता है
कोई कहता जिनने सच्ची श्रद्धा से डुबकी लगाई
उसे पुण्य लाभ मिल गया और मोक्ष पायी
हादसे होते ही रहते है ,पर लोग जाते है
सस्ते में पाप धोते है,डुबकी लगाते है
धर्म के नाम पर,गजब है इनका हौंसला
राम जाने,कब मिटेगा ये ढकोसला
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
हरेक बारह वर्षों के बाद में
हरद्वार,उज्जैन,नासिक और प्रयाग में
आता है कुम्भ का पर्व महान
और खुल जाती है धर्म की दुकान
साधू,सन्यासी,संत और महंत
साधारण आदमी और श्रीमंत
सभी का रेला लगता है
बहुत बड़ा मेला लगता है
सर पर पोटली,मन में आस्था
बस से,रेल से,या चल पैदल रास्ता
भीड़ ल गा करती,पुण्य कमाने वालों की
एक डुबकी लगा कर के,मोक्ष पानेवालों की
धर्म के ठेकेदार बतलाते है
यहाँ एक खास दिन नहाने से ,पाप धुल जाते है
और मोक्ष के द्वार खुल जाते है
आज के जमाने में ,मोक्ष इतनी सस्ती मिल जाती है
पुण्य की लोभी ,जनता खिंची चली आती है
ग्रहों का एसा मिलन,बर्षों बाद होता है
ऐसे में स्नान और दान से ,पुण्य लाभ होता है
करोडो की भीड़
न ठिकाना न नीड़
डुबकी लगा कर,
पुण्य कमा कर ,
जब वापस जाती है
स्टेशनों पर भगदड़ मच जाती है
सेंकडो लोग इस भगदड़ में दब जाते है
कितनो के ही प्राण पंखेरू उड़ जाते है
कोई सरकार को दोषी ठहराता है
कोई इंतजाम की कमी बतलाता है
कोई कहता जिनने सच्ची श्रद्धा से डुबकी लगाई
उसे पुण्य लाभ मिल गया और मोक्ष पायी
हादसे होते ही रहते है ,पर लोग जाते है
सस्ते में पाप धोते है,डुबकी लगाते है
धर्म के नाम पर,गजब है इनका हौंसला
राम जाने,कब मिटेगा ये ढकोसला
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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