हर दिन होली
खाना पीना ,मौज मनाना,मस्ती और ठिठौली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
रोज सुबह जब आँखें खुलती,तो लगता है जनम हुआ
रात बंद जब होती आँखें,तो लगता है मरण हुआ
यादों के जब पत्ते खिरते,लगता है सावन आया
अपनों से मिलना होने पर ,ज्यों बसंत हो मुस्काया
ऐसा लगता फूल खिल रहे ,जैसे कोयल बोली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
दुःख के शीत भरे झोंकों से,ठिठुर ठिठुर जाता तन है
और जब सुख की उष्मा मिलती ,पुलकित हो जाता मन है
जब आनंद फुहार बरसती,लगता है सावन आया
दीप प्रेम के जला किसी ने,होली का रंग बरसाया
लगता जीवन के आँगन में,जैसे सजी रंगोली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Friday, March 1, 2013
सबसे बड़ा सत्संग -पति के संग
सबसे बड़ा सत्संग -पति के संग
मै तो चाहूं ,संग तुम्हारा ,और तुम डूबी हो सत्संग में
तुम्हारे इस धरम करम से ,बहुत हो गया हूँ अब तंग मै
जब देखो तुम ,भाग भाग कर ,
कथा भागवत सुनने जाती
सात दिनों का लंबा चक्कर ,
पर फिर भी तुम नहीं अघाती
सोचा करती,स्वर्ग मिलेगा,
मै तो चाहूं ,संग तुम्हारा ,और तुम डूबी हो सत्संग में
तुम्हारे इस धरम करम से ,बहुत हो गया हूँ अब तंग मै
जब देखो तुम ,भाग भाग कर ,
कथा भागवत सुनने जाती
सात दिनों का लंबा चक्कर ,
पर फिर भी तुम नहीं अघाती
सोचा करती,स्वर्ग मिलेगा,
व्यासपीठ पर दान चढ़ा कर
और रहती हो,भूखी दिन भर,
एक वक़्त बस खाना खाकर
पत्नी के कर्तव्य भुला कर,
घर गृहस्थ की जिम्मेदारी
पुण्य कमाने के चक्कर में ,
भटक रही हो ,मारी मारी
एक बार सुनना काफी है ,
वही भागवत ,वही कथा है
बार बार तुम सुनने जाती ,
मे्रे मन में यही व्यथा है
चन्द भजनियों ने खोली है,
कथा भागवत की दूकाने
दे जनता को पुण्य प्रलोभन ,
लगे हुए है भीड़ जुटाने
सुनो भागवत,मोक्ष मिलेगा ,
टिकिट स्वर्ग का बाँट रहे है
भोली जनता को फुसला कर ,
अपनी चाँदी काट रहे है
कुछ बूढी,अधेड़ सी सासें ,
बचने घर की रोज कलह से
कथा भागवत के चक्कर में ,
घर से जाती,निकल सुबह से
कुछ बूढ़े ,बेकार निठल्ले,
आ जाते है ,समय काटने
अपने ही हमउम्र साथियों ,
से अपना दुःख दर्द बांटने
कुछ परसादी भगत और कुछ,
श्रोता ,देखा देखी वाले
यही सोच कर ,आ जुटते है ,
हम भी थोड़ा ,पुण्य कमालें
और कथा वाचक पंडितजी ,
पहले हैं ,खुद को पुजवाते
कुछ पढ़ते,कुछ गढ़ते और कुछ,
प्रहसन और प्रसंग सुनाते
लगता श्रोता ,लगे ऊंघने ,
भजन कीर्तन ,चालू करते
दान दक्षिणा ,हर प्रसंग पर ,
चढवा अपनी झोली भरते
ये आयोजन ,लाखों के है ,
अब ये सब ,दुकानदारी है
ये सब चक्कर ,छोड़ो मेडम ,
इसमें बड़ी समझदारी है
ध्यान लगाओ ,परमेश्वर में ,
और पति परमेश्वर होता है
पत्नी के कर्तव्य निभाना ,
सब से बड़ा धरम होता है
अपने ढंग से जीवन जी लें,तुम रंग जाओ ,मेरे रंग में
मै तो चाहूं ,संग तुम्हारा ,और तुम डूबी हो सत्संग में
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
और रहती हो,भूखी दिन भर,
एक वक़्त बस खाना खाकर
पत्नी के कर्तव्य भुला कर,
घर गृहस्थ की जिम्मेदारी
पुण्य कमाने के चक्कर में ,
भटक रही हो ,मारी मारी
एक बार सुनना काफी है ,
वही भागवत ,वही कथा है
बार बार तुम सुनने जाती ,
मे्रे मन में यही व्यथा है
चन्द भजनियों ने खोली है,
कथा भागवत की दूकाने
दे जनता को पुण्य प्रलोभन ,
लगे हुए है भीड़ जुटाने
सुनो भागवत,मोक्ष मिलेगा ,
टिकिट स्वर्ग का बाँट रहे है
भोली जनता को फुसला कर ,
अपनी चाँदी काट रहे है
कुछ बूढी,अधेड़ सी सासें ,
बचने घर की रोज कलह से
कथा भागवत के चक्कर में ,
घर से जाती,निकल सुबह से
कुछ बूढ़े ,बेकार निठल्ले,
आ जाते है ,समय काटने
अपने ही हमउम्र साथियों ,
से अपना दुःख दर्द बांटने
कुछ परसादी भगत और कुछ,
श्रोता ,देखा देखी वाले
यही सोच कर ,आ जुटते है ,
हम भी थोड़ा ,पुण्य कमालें
और कथा वाचक पंडितजी ,
पहले हैं ,खुद को पुजवाते
कुछ पढ़ते,कुछ गढ़ते और कुछ,
प्रहसन और प्रसंग सुनाते
लगता श्रोता ,लगे ऊंघने ,
भजन कीर्तन ,चालू करते
दान दक्षिणा ,हर प्रसंग पर ,
चढवा अपनी झोली भरते
ये आयोजन ,लाखों के है ,
अब ये सब ,दुकानदारी है
ये सब चक्कर ,छोड़ो मेडम ,
इसमें बड़ी समझदारी है
ध्यान लगाओ ,परमेश्वर में ,
और पति परमेश्वर होता है
पत्नी के कर्तव्य निभाना ,
सब से बड़ा धरम होता है
अपने ढंग से जीवन जी लें,तुम रंग जाओ ,मेरे रंग में
मै तो चाहूं ,संग तुम्हारा ,और तुम डूबी हो सत्संग में
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Wednesday, February 27, 2013
नयनों की भाषा
नयनों की भाषा
मेरी थी उत्कट अभिलाषा ,समझूं मै नयनो की भाषा
दीदे फाड़ ,उमर भर सारी ,रहा देखता सिर्फ तमाशा
कभी मटकते,कभी खटकते कभी भटकते है ये नयना
कभी सुहाते,मन को भाते ,कहीं अटकते है ये नयना
सुरमा लगा,सूरमा बन कर,तीर चलाते है ये नयना
कोई मृग से,कोई कमल की तरह सुहाते है ये नयना
कैसे तिरछे नयन किसी के ,मन को घायल,कर कर जाते
कैसे कोई नयन चुरा कर ,बार बार हमको तड़फाते
कैसे तन कर गुस्सा करते,कैसे झुक कर हाँ कह जाते
हो जाते है ,बंद मिलन में,विरहां में आंसू ढलकाते
कैसे आँखें,चुन्धयाती है ,कैसे आँखे रंग बदलती
अच्छे अच्छों को बहकाती,जब ये चंचल होकर चलती
दिखी कोई सुन्दर सी कन्या ,कोई आँखें फाड़ देखता
कोई आँखें टेड़ी करता,तो कोई आँखें तरेरता
कैसे आँखों ही आँखों में ,हो जाते है कई इशारे
कोई आँख में धूल झोंकता,कोई दिखाता सपने प्यारे
होती आँखों की कमजोरी,कभी दूर की,कभी पास की
आँख बिछाये ,विरहन जोहती,राह पिया की,लगा टकटकी
नयन द्वार से आकर कोई ,कैसे बस जाता है दिल में
चोरी चोरी नयन लड़ाना , डाल दिया करता मुश्किल में
कैसे कोई लाडला बच्चा,बनता है आँखों का तारा
कैसे आँखें बंद होने पर,मिट जाता अस्तित्व हमारा
कैसे चमक आँख में आती,जब मिल जाता प्यारा हमदम
कैसे कोई ,किरकिरी बन कर ,आँखों में चुभता है हरदम
कैसे आँख इशारा करती,आता कोई याद,फडकती
थक जाने पर ,लग जाती है,कैसे सोती,कैसे जगती
कैसे कोई ,आँख मार कर,लड़की पटा लिया करता है
कैसे कोई ,बना बेवफा ,नज़रें हटा लिया करता है
कुछ रिसर्च करने वालों की,एक स्टडी ये कहती है
पलकें झपकाने में आँखे,बारह बरस बंद रहती है
कभी अपलक ,उन्हें निहारे,बार बार या झपकें पलके
कैसे इन प्यारे नैनों में,बस जाते है,सपने कल के
कैसे एक लीक काजल की,इनकी धार तेज करती है
कैसे दुःख में,या फिर सुख में,ये आँखें,पानी भरती है
कैसे मोती,आंसूं बन कर,टपका करते है आँखों से
कैसे दो दीवाने प्रेमी,बातें करते है आँखों से
दिल से दिल तो मिले बाद में ,पहले आँख मिलाई जाती
लेने देने से बचना हो,तो फिर आँख चुराई जाती
कोई जब है मनको भाता ,आता ,आँखों में बस जाता
कैसे साहब की आँखों में,चढ़ कर कोई तरक्की पाता
आते नज़र ,गुलाबी डोरे,अभिसारिका की आँखों में
होती आँखे ,लाल क्रोध से ,कभी नशा छाता आँखों में
कभी बड़ी खुशियाँ मिलती है ,और मिलती है कभी निराशा
मन में थी उत्कट अभिलाषा ,समझूं मै नयनो की भाषा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मेरी थी उत्कट अभिलाषा ,समझूं मै नयनो की भाषा
दीदे फाड़ ,उमर भर सारी ,रहा देखता सिर्फ तमाशा
कभी मटकते,कभी खटकते कभी भटकते है ये नयना
कभी सुहाते,मन को भाते ,कहीं अटकते है ये नयना
सुरमा लगा,सूरमा बन कर,तीर चलाते है ये नयना
कोई मृग से,कोई कमल की तरह सुहाते है ये नयना
कैसे तिरछे नयन किसी के ,मन को घायल,कर कर जाते
कैसे कोई नयन चुरा कर ,बार बार हमको तड़फाते
कैसे तन कर गुस्सा करते,कैसे झुक कर हाँ कह जाते
हो जाते है ,बंद मिलन में,विरहां में आंसू ढलकाते
कैसे आँखें,चुन्धयाती है ,कैसे आँखे रंग बदलती
अच्छे अच्छों को बहकाती,जब ये चंचल होकर चलती
दिखी कोई सुन्दर सी कन्या ,कोई आँखें फाड़ देखता
कोई आँखें टेड़ी करता,तो कोई आँखें तरेरता
कैसे आँखों ही आँखों में ,हो जाते है कई इशारे
कोई आँख में धूल झोंकता,कोई दिखाता सपने प्यारे
होती आँखों की कमजोरी,कभी दूर की,कभी पास की
आँख बिछाये ,विरहन जोहती,राह पिया की,लगा टकटकी
नयन द्वार से आकर कोई ,कैसे बस जाता है दिल में
चोरी चोरी नयन लड़ाना , डाल दिया करता मुश्किल में
कैसे कोई लाडला बच्चा,बनता है आँखों का तारा
कैसे आँखें बंद होने पर,मिट जाता अस्तित्व हमारा
कैसे चमक आँख में आती,जब मिल जाता प्यारा हमदम
कैसे कोई ,किरकिरी बन कर ,आँखों में चुभता है हरदम
कैसे आँख इशारा करती,आता कोई याद,फडकती
थक जाने पर ,लग जाती है,कैसे सोती,कैसे जगती
कैसे कोई ,आँख मार कर,लड़की पटा लिया करता है
कैसे कोई ,बना बेवफा ,नज़रें हटा लिया करता है
कुछ रिसर्च करने वालों की,एक स्टडी ये कहती है
पलकें झपकाने में आँखे,बारह बरस बंद रहती है
कभी अपलक ,उन्हें निहारे,बार बार या झपकें पलके
कैसे इन प्यारे नैनों में,बस जाते है,सपने कल के
कैसे एक लीक काजल की,इनकी धार तेज करती है
कैसे दुःख में,या फिर सुख में,ये आँखें,पानी भरती है
कैसे मोती,आंसूं बन कर,टपका करते है आँखों से
कैसे दो दीवाने प्रेमी,बातें करते है आँखों से
दिल से दिल तो मिले बाद में ,पहले आँख मिलाई जाती
लेने देने से बचना हो,तो फिर आँख चुराई जाती
कोई जब है मनको भाता ,आता ,आँखों में बस जाता
कैसे साहब की आँखों में,चढ़ कर कोई तरक्की पाता
आते नज़र ,गुलाबी डोरे,अभिसारिका की आँखों में
होती आँखे ,लाल क्रोध से ,कभी नशा छाता आँखों में
कभी बड़ी खुशियाँ मिलती है ,और मिलती है कभी निराशा
मन में थी उत्कट अभिलाषा ,समझूं मै नयनो की भाषा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Monday, February 25, 2013
संतान और उम्मीद
संतान और उम्मीद
अपनी संतानों से ज्यादा ,मत रखो उम्मीद तुम,
परिंदे हैं,उड़ना सीखेंगे ,कहीं उड़ जायेंगे
घोंसले में बैठ कर ना रह सकेंगे उम्र भर,
पेट भरने के लिए ,दाना तो चुगने जायेंगे
बेटियां तो धन पराया है,उन्हें हम एक दिन,
किसी के संग ब्याह देंगे ,वो बिदा हो जायेंगी
ब्याह बेटे का रचाते ,बहू लाते चाव से,
आस ये मन में लगाए,घर में रौनक आएगी
और पत्नी संग अगर वो,मौज करले चार दिन,
लगने लगता है तुम्हे,बेटा पराया हो गया
बात पत्नी की सुने और उस पे ज्यादा ध्यान दे ,
जोरू का गुलाम वो माता का जाया हो गया
अगर बेटा कहीं जाता,नौकरी या काम से ,
सोचने लगते हो बीबी ने अलग तुमसे किया
दूर तुमसे हो गया है ,तुम्हारा लख्ते -जिगर,
फंसा अपने जाल में है,बहू ने उसको लिया
उसके भी कुछ शौक है और उसके कुछ अरमान है,
जिंदगी शादीशुदा के ,भोगना है सुख सभी
उसके बीबी बच्चे है और पालना परिवार है ,
बोझ जिम्मेदारियों का ,पड़ने दो,उस पर अभी
अरे उसको भी तो अपनी गृहस्थी है निभाना ,
उसको अपने ढंग से ,जीने दो अपनी जिंदगी
खान में रहता जो पत्थर ,कट के,सज के ,संवर के ,
हीरा बन सकता है वो ,नायाब भी और कीमती
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
अपनी संतानों से ज्यादा ,मत रखो उम्मीद तुम,
परिंदे हैं,उड़ना सीखेंगे ,कहीं उड़ जायेंगे
घोंसले में बैठ कर ना रह सकेंगे उम्र भर,
पेट भरने के लिए ,दाना तो चुगने जायेंगे
बेटियां तो धन पराया है,उन्हें हम एक दिन,
किसी के संग ब्याह देंगे ,वो बिदा हो जायेंगी
ब्याह बेटे का रचाते ,बहू लाते चाव से,
आस ये मन में लगाए,घर में रौनक आएगी
और पत्नी संग अगर वो,मौज करले चार दिन,
लगने लगता है तुम्हे,बेटा पराया हो गया
बात पत्नी की सुने और उस पे ज्यादा ध्यान दे ,
जोरू का गुलाम वो माता का जाया हो गया
अगर बेटा कहीं जाता,नौकरी या काम से ,
सोचने लगते हो बीबी ने अलग तुमसे किया
दूर तुमसे हो गया है ,तुम्हारा लख्ते -जिगर,
फंसा अपने जाल में है,बहू ने उसको लिया
उसके भी कुछ शौक है और उसके कुछ अरमान है,
जिंदगी शादीशुदा के ,भोगना है सुख सभी
उसके बीबी बच्चे है और पालना परिवार है ,
बोझ जिम्मेदारियों का ,पड़ने दो,उस पर अभी
अरे उसको भी तो अपनी गृहस्थी है निभाना ,
उसको अपने ढंग से ,जीने दो अपनी जिंदगी
खान में रहता जो पत्थर ,कट के,सज के ,संवर के ,
हीरा बन सकता है वो ,नायाब भी और कीमती
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Sunday, February 24, 2013
पंचतत्व के गुण अपनाये
पंचतत्व के गुण अपनाये
पहला है जल तत्व ,सदा नत मस्तक रहता
प्यास बुझाता ,कल कल कर नीचे को बहता
सिंचित करता धरा,बीज पनपा,उपजाता
देता है हरियाली,वृक्ष,पुष्प महकाता
बन कर बादल,आसमान में ऊंचा उड़ता
फिर बारिश की बूंदें बन ,धरती से जुड़ता
जल चरित्र को क्यों ना जीवन में अपनाये
नम्र रहें ,नतमस्तक ,काम सभी के आये
जो हरदम ऊपर उठता ,वो अग्नि तत्व है
इसका मानव के जीवन में अति महत्त्व है
यही तत्व है जो देता उर्जा जीवन को
और इसी से उर्जा मिलती मानव तन को
लपट आग की हरदम है ऊपर को जाती
प्रगतिशील बन ,ऊपर उठो,पाठ सिखलाती
अग्नि तत्व से ले ये शिक्षा ,हम आगे बढ़
प्रगतिवान बन करें तरक्की ,हम ऊपर चढ़
तत्व तीसरा ,जिससे बनती है ये काया
धरती की माटी है ,जिसने हमें बनाया
हल चलवा ,निज तन पर,सबको अन्न देती है
मातृस्वरूपा ,जीने के साधन देती है
खोदो भी यदि ,तो भी है ये रत्न उगलती
सहनशीलता की मिसाल है ये माँ धरती
हम जीवन भर आभारी है,इस धरती के
परोपकार और सहनशीलता ,इससे सीखें
पंचतत्व के तन में चौथा तत्व पवन है
लेते सांस हवा से हम पाते जीवन है
जीवनदाता है पर नज़र नहीं आती है
बिना दिखे उपकार करो ,ये सिखलाती है
गुप्त रूप से सेवा कर ,मत करो प्रदर्शन
तत्व पांचवां 'गगन',हमें जो देता जीवन
नभ की तरह विशाल बने ,यह गुण भी पायें
पंचतत्व का तन है ,इनके गुण अपनाये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
पहला है जल तत्व ,सदा नत मस्तक रहता
प्यास बुझाता ,कल कल कर नीचे को बहता
सिंचित करता धरा,बीज पनपा,उपजाता
देता है हरियाली,वृक्ष,पुष्प महकाता
बन कर बादल,आसमान में ऊंचा उड़ता
फिर बारिश की बूंदें बन ,धरती से जुड़ता
जल चरित्र को क्यों ना जीवन में अपनाये
नम्र रहें ,नतमस्तक ,काम सभी के आये
जो हरदम ऊपर उठता ,वो अग्नि तत्व है
इसका मानव के जीवन में अति महत्त्व है
यही तत्व है जो देता उर्जा जीवन को
और इसी से उर्जा मिलती मानव तन को
लपट आग की हरदम है ऊपर को जाती
प्रगतिशील बन ,ऊपर उठो,पाठ सिखलाती
अग्नि तत्व से ले ये शिक्षा ,हम आगे बढ़
प्रगतिवान बन करें तरक्की ,हम ऊपर चढ़
तत्व तीसरा ,जिससे बनती है ये काया
धरती की माटी है ,जिसने हमें बनाया
हल चलवा ,निज तन पर,सबको अन्न देती है
मातृस्वरूपा ,जीने के साधन देती है
खोदो भी यदि ,तो भी है ये रत्न उगलती
सहनशीलता की मिसाल है ये माँ धरती
हम जीवन भर आभारी है,इस धरती के
परोपकार और सहनशीलता ,इससे सीखें
पंचतत्व के तन में चौथा तत्व पवन है
लेते सांस हवा से हम पाते जीवन है
जीवनदाता है पर नज़र नहीं आती है
बिना दिखे उपकार करो ,ये सिखलाती है
गुप्त रूप से सेवा कर ,मत करो प्रदर्शन
तत्व पांचवां 'गगन',हमें जो देता जीवन
नभ की तरह विशाल बने ,यह गुण भी पायें
पंचतत्व का तन है ,इनके गुण अपनाये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
दिल की सुन-लोगों की मत सुन
दिल की सुन-लोगों की मत सुन
मुझे ज़माना ,अपने अपने ढंग, से समझाता रहता है
लेकिन मै वो ही करता हूँ,जैसा मेरा मन कहता है
मम्मी कहती ऐसा करले,पापा कहते वैसा करले
कहते दोस्त ,संभल कर कुछ कर ,मत तू ऐसा वैसा करले
पडूं बीमार,कोई कहता है,जाओ,डाक्टर को दिखलाओ
कोई कहता ,डाक्टर छोडो,तुम देशी इलाज करवाओ
देता है कोई सलाह कि होम्योपेथी आप दवा लो
कोई कहता किसी सयाने से तुम झाड फूंक करवा लो
कोई कहता ,जा हकीम के पास दवा लो तुम यूनानी
तुम आयुर्वेदिक इलाज लो,तभी बिमारी जड़ से जानी
लोगबाग़ कुछ समझाते है ,छोडो यार दवा का चक्कर
बाबा रामदेव के आसन ,तुमको स्वस्थ रखे जीवन भर
बीमारी में हालचाल जो ,मेरा कोई पूछने आता
तरह तरह की राय बता कर ,सलाहकार मेरा बन जाता
जितने मुंह है,उतनी बातें,कन्फ्यूजन हरदम रहता है
लेकिन मै वो ही करता हूँ,जैसा मेरा दिल कहता है
बच्चे ने स्कूल करलिया ,आगे इसको क्या पढवाना
कितने ही मेरे शुभचिंतक ,देते मुझे सलाहें नाना
यूं कर कोटा भेज इसे तू,आई आई टी की कोचिंग करवा
कोई कहे पी एम टी करवा,इसे डाक्टर अच्छा बनवा
अच्छा जॉब कराना है तो ,तू करवा इसको एम बी ए
जो अच्छी कमाई करवाना ,तो तू बनवा ,इसको सी ए
कोई कहे फोरेन भेज दे,वहां पढाई करना अच्छा
कोई कहे ये मत कर वर्ना ,निकल हाथ से जाए बच्चा
कोई ना कहता है पूछो,कि बच्चे के मन में क्या है
या उसका इंटरेस्ट किधर है,आगे उसको बनना क्या है
हम खुद,कुछ हों या ना हो पर,सलाहकार सबसे अच्छे है
कोई पूछे या ना पूछे,मुफ्त मशविरा दे देते है
दिल की सुन,लोगों की मत सुन,बस इसमें ही सुख रहता है
इसीलिए मै वो करता हूँ,जो भी मेरा दिल कहता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मुझे ज़माना ,अपने अपने ढंग, से समझाता रहता है
लेकिन मै वो ही करता हूँ,जैसा मेरा मन कहता है
मम्मी कहती ऐसा करले,पापा कहते वैसा करले
कहते दोस्त ,संभल कर कुछ कर ,मत तू ऐसा वैसा करले
पडूं बीमार,कोई कहता है,जाओ,डाक्टर को दिखलाओ
कोई कहता ,डाक्टर छोडो,तुम देशी इलाज करवाओ
देता है कोई सलाह कि होम्योपेथी आप दवा लो
कोई कहता किसी सयाने से तुम झाड फूंक करवा लो
कोई कहता ,जा हकीम के पास दवा लो तुम यूनानी
तुम आयुर्वेदिक इलाज लो,तभी बिमारी जड़ से जानी
लोगबाग़ कुछ समझाते है ,छोडो यार दवा का चक्कर
बाबा रामदेव के आसन ,तुमको स्वस्थ रखे जीवन भर
बीमारी में हालचाल जो ,मेरा कोई पूछने आता
तरह तरह की राय बता कर ,सलाहकार मेरा बन जाता
जितने मुंह है,उतनी बातें,कन्फ्यूजन हरदम रहता है
लेकिन मै वो ही करता हूँ,जैसा मेरा दिल कहता है
बच्चे ने स्कूल करलिया ,आगे इसको क्या पढवाना
कितने ही मेरे शुभचिंतक ,देते मुझे सलाहें नाना
यूं कर कोटा भेज इसे तू,आई आई टी की कोचिंग करवा
कोई कहे पी एम टी करवा,इसे डाक्टर अच्छा बनवा
अच्छा जॉब कराना है तो ,तू करवा इसको एम बी ए
जो अच्छी कमाई करवाना ,तो तू बनवा ,इसको सी ए
कोई कहे फोरेन भेज दे,वहां पढाई करना अच्छा
कोई कहे ये मत कर वर्ना ,निकल हाथ से जाए बच्चा
कोई ना कहता है पूछो,कि बच्चे के मन में क्या है
या उसका इंटरेस्ट किधर है,आगे उसको बनना क्या है
हम खुद,कुछ हों या ना हो पर,सलाहकार सबसे अच्छे है
कोई पूछे या ना पूछे,मुफ्त मशविरा दे देते है
दिल की सुन,लोगों की मत सुन,बस इसमें ही सुख रहता है
इसीलिए मै वो करता हूँ,जो भी मेरा दिल कहता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Friday, February 22, 2013
इकहत्तर की उमर हो गयी
इकहत्तर की उमर हो गयी
पल पल करके ,गुजर गए दिन,दिन दिन करके ,बरसों बीते
इकहत्तर की उमर हो गयी,लगता है कल परसों बीते
जीवन की आपाधापी में ,पंख लगा कर वक्त उड़ गया
छूटा साथ कई अपनों का ,कितनो का ही संग जुड़ गया
सबने मुझ पर ,प्यार लुटाया,मैंने प्यार सभी को बांटा
चलते फिरते ,हँसते गाते ,दूर किया मन का सन्नाटा
भोला बचपन ,मस्त जवानी ,पलक झपकते ,बस यों बीते
इकहत्तर की उमर हो गयी ,लगता है कल परसों बीते
सुख की गंगा ,दुःख की यमुना,गुप्त सरस्वती सी चिंतायें
इसी त्रिवेणी के संगम में ,हम जीवन भर ,खूब नहाये
क्या क्या खोया,क्या क्या पाया,रखा नहीं कुछ लेखा जोखा
किसने उंगली पकड़ उठाया,जीवन पथ पर किसने रोका
जीवन में संघर्ष बहुत था ,पता नहीं हारे या जीते
इकहत्तर की उमर हो गयी,लगता है कल परसों बीते
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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