सर ऊपर उठाना है
अगर आवाज को अपनी ,बुलंदी से सुनाना है
अगर सोये हुओ को जो,तुम्हे फिर से जगाना है
बिना गर्दन किये ऊंची,न मुर्गा बांग दे सकता ,
तुम्हे भी आगे बढ कर ,अपना सर ऊपर उठाना है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Wednesday, March 6, 2013
होली के रंग-बुजुर्गों के संग
होली के रंग-बुजुर्गों के संग
हम बुजुर्ग है ,एकाकी है
पर अब भी उमंग बाकी है
हंसी खुशी से हम जियेंगे,
जब तक ये जीवन बाकी है
अपनों ने दिल तोडा तो क्या ,
हमउम्रों का संग बाकी है
बहुत लड़ लिए हम जीवन में,
अब ना कोई जंग बाकी है
मस्ती में बाकी का जीवन,
जी लेने के ढंग बाकी है
आओ मौज मनाये मिलकर ,
होली वाले रंग बाकी है
ऐसे होली रंग में भीजें,
सूखा कोई न अंग बाकी है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Monday, March 4, 2013
व्यथा कथा
घोटू के पद
व्यथा कथा
प्रीतम,तुम जागो मै सोऊँ
अपनी प्रीत गजब की ऐसी ,खुश होऊँ या रोऊँ
तुम खर खर खर्राटे भरती ,मै सपनो में खोऊँ
थकी रात को तुम जब आती,काम काज निपटा कर
इधर लिपटती ,निंदिया मुझसे ,मुझे अकेला पाकर
तुम भी सोता देख चैन से ,मुझको नहीं सताती
अपना पस्त शरीर लिए तुम,करवट ले सो जाती
और सुबह चालू हो जाता,रोज रोज का चक्कर
काम काज में तुम लग जाती,और मै जाता दफ्तर
कोई न कोई आये सन्डे को,मै कैसे खुश होऊँ
प्रीतम ,तुम जागो मै सोऊँ
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
व्यथा कथा
प्रीतम,तुम जागो मै सोऊँ
अपनी प्रीत गजब की ऐसी ,खुश होऊँ या रोऊँ
तुम खर खर खर्राटे भरती ,मै सपनो में खोऊँ
थकी रात को तुम जब आती,काम काज निपटा कर
इधर लिपटती ,निंदिया मुझसे ,मुझे अकेला पाकर
तुम भी सोता देख चैन से ,मुझको नहीं सताती
अपना पस्त शरीर लिए तुम,करवट ले सो जाती
और सुबह चालू हो जाता,रोज रोज का चक्कर
काम काज में तुम लग जाती,और मै जाता दफ्तर
कोई न कोई आये सन्डे को,मै कैसे खुश होऊँ
प्रीतम ,तुम जागो मै सोऊँ
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Saturday, March 2, 2013
मै और मेरी मुनिया
मै और मेरी मुनिया
तुम कहते हो बड़े गर्व से ,
मै अच्छा और मेरी मुनिया
कोई की परवाह नहीं है ,
कैसे,क्या कर लेगी दुनिया
पैसा नहीं सभी कुछ जग में ,
ना आटा ,या मिर्ची ,धनिया
सबका अपना अपना जीवन,
राजा ,रंक ,पुजारी,बनिया
कोई भीड़ में नहीं सुनेगा,
रहो बजाते,तुम टुनटुनिया
उतने दिन अंधियारा रहता ,
जितने दिन रहती चांदनियां
तन रुई फोहे सा बिखरे ,
धुनकी जब धुनकेगा धुनिया
ये मुनिया भी साथ न देगी,
जिस दिन तुम छोड़ोगे दुनिया
मदन मोहन बहेती'घोटू'
तुम कहते हो बड़े गर्व से ,
मै अच्छा और मेरी मुनिया
कोई की परवाह नहीं है ,
कैसे,क्या कर लेगी दुनिया
पैसा नहीं सभी कुछ जग में ,
ना आटा ,या मिर्ची ,धनिया
सबका अपना अपना जीवन,
राजा ,रंक ,पुजारी,बनिया
कोई भीड़ में नहीं सुनेगा,
रहो बजाते,तुम टुनटुनिया
उतने दिन अंधियारा रहता ,
जितने दिन रहती चांदनियां
तन रुई फोहे सा बिखरे ,
धुनकी जब धुनकेगा धुनिया
ये मुनिया भी साथ न देगी,
जिस दिन तुम छोड़ोगे दुनिया
मदन मोहन बहेती'घोटू'
छलनी छलनी बदन
छलनी छलनी बदन
थे नवद्वार,घाव अब इतने ,मेरे मन को भेद हो गये
रोम रोम हो गया छिद्रमय ,तन पर इतने छेद हो गये
कुछ अपनों कुछ बेगानों ने ,
बार बार और बात बात पर
मुझ पर बहुत चुभोये खंजर,
कभी घात और प्रतिघात कर
क्या बतलाएं,इन घावों ने ,
कितनी पीड़ा पहुंचाई है
अपनों के ही तीर झेलना ,
होता कितना दुखदायी है
भीष्म पितामह से ,शरशैया ,
पर लेटे है ,दर्द छिपाये
अब तो बस ये इन्तजार है,
ऋतू बदले,उत्तरायण आये
अपना वचन निभाने खातिर ,हम तो मटियामेट हो गये
रोम रोम होगया छिद्रमय ,तन पर इतने छेद हो गये
शायद परेशान वो होगा ,
जब उसने तकदीर लिखी थी
सुख लिखना ही भूल गया वो ,
बात बात पर पीर लिखी थी
लेकिन हम भी धीरे धीरे ,
पीड़ा के अभ्यस्त हो गये
जैसा जीवन दिया विधि ने,
वो जीने में व्यस्त हो गये
लेकिन लोग बाज ना आये ,
बदन कर दिया ,छलनी छलनी
पता न कैसे पार करेंगे ,
हम ये जीवन की बेतरणी
डर है नैया डूब न जाये ,इसमें इतने छेद हो गये
रोम रोम हो गया छिद्रमय,तन पर इतने छेद हो गये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
थे नवद्वार,घाव अब इतने ,मेरे मन को भेद हो गये
रोम रोम हो गया छिद्रमय ,तन पर इतने छेद हो गये
कुछ अपनों कुछ बेगानों ने ,
बार बार और बात बात पर
मुझ पर बहुत चुभोये खंजर,
कभी घात और प्रतिघात कर
क्या बतलाएं,इन घावों ने ,
कितनी पीड़ा पहुंचाई है
अपनों के ही तीर झेलना ,
होता कितना दुखदायी है
भीष्म पितामह से ,शरशैया ,
पर लेटे है ,दर्द छिपाये
अब तो बस ये इन्तजार है,
ऋतू बदले,उत्तरायण आये
अपना वचन निभाने खातिर ,हम तो मटियामेट हो गये
रोम रोम होगया छिद्रमय ,तन पर इतने छेद हो गये
शायद परेशान वो होगा ,
जब उसने तकदीर लिखी थी
सुख लिखना ही भूल गया वो ,
बात बात पर पीर लिखी थी
लेकिन हम भी धीरे धीरे ,
पीड़ा के अभ्यस्त हो गये
जैसा जीवन दिया विधि ने,
वो जीने में व्यस्त हो गये
लेकिन लोग बाज ना आये ,
बदन कर दिया ,छलनी छलनी
पता न कैसे पार करेंगे ,
हम ये जीवन की बेतरणी
डर है नैया डूब न जाये ,इसमें इतने छेद हो गये
रोम रोम हो गया छिद्रमय,तन पर इतने छेद हो गये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Friday, March 1, 2013
हर दिन होली
हर दिन होली
खाना पीना ,मौज मनाना,मस्ती और ठिठौली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
रोज सुबह जब आँखें खुलती,तो लगता है जनम हुआ
रात बंद जब होती आँखें,तो लगता है मरण हुआ
यादों के जब पत्ते खिरते,लगता है सावन आया
अपनों से मिलना होने पर ,ज्यों बसंत हो मुस्काया
ऐसा लगता फूल खिल रहे ,जैसे कोयल बोली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
दुःख के शीत भरे झोंकों से,ठिठुर ठिठुर जाता तन है
और जब सुख की उष्मा मिलती ,पुलकित हो जाता मन है
जब आनंद फुहार बरसती,लगता है सावन आया
दीप प्रेम के जला किसी ने,होली का रंग बरसाया
लगता जीवन के आँगन में,जैसे सजी रंगोली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
खाना पीना ,मौज मनाना,मस्ती और ठिठौली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
रोज सुबह जब आँखें खुलती,तो लगता है जनम हुआ
रात बंद जब होती आँखें,तो लगता है मरण हुआ
यादों के जब पत्ते खिरते,लगता है सावन आया
अपनों से मिलना होने पर ,ज्यों बसंत हो मुस्काया
ऐसा लगता फूल खिल रहे ,जैसे कोयल बोली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
दुःख के शीत भरे झोंकों से,ठिठुर ठिठुर जाता तन है
और जब सुख की उष्मा मिलती ,पुलकित हो जाता मन है
जब आनंद फुहार बरसती,लगता है सावन आया
दीप प्रेम के जला किसी ने,होली का रंग बरसाया
लगता जीवन के आँगन में,जैसे सजी रंगोली है
अपनी तो हर रात दिवाली,और हर एक दिन होली है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
सबसे बड़ा सत्संग -पति के संग
सबसे बड़ा सत्संग -पति के संग
मै तो चाहूं ,संग तुम्हारा ,और तुम डूबी हो सत्संग में
तुम्हारे इस धरम करम से ,बहुत हो गया हूँ अब तंग मै
जब देखो तुम ,भाग भाग कर ,
कथा भागवत सुनने जाती
सात दिनों का लंबा चक्कर ,
पर फिर भी तुम नहीं अघाती
सोचा करती,स्वर्ग मिलेगा,
मै तो चाहूं ,संग तुम्हारा ,और तुम डूबी हो सत्संग में
तुम्हारे इस धरम करम से ,बहुत हो गया हूँ अब तंग मै
जब देखो तुम ,भाग भाग कर ,
कथा भागवत सुनने जाती
सात दिनों का लंबा चक्कर ,
पर फिर भी तुम नहीं अघाती
सोचा करती,स्वर्ग मिलेगा,
व्यासपीठ पर दान चढ़ा कर
और रहती हो,भूखी दिन भर,
एक वक़्त बस खाना खाकर
पत्नी के कर्तव्य भुला कर,
घर गृहस्थ की जिम्मेदारी
पुण्य कमाने के चक्कर में ,
भटक रही हो ,मारी मारी
एक बार सुनना काफी है ,
वही भागवत ,वही कथा है
बार बार तुम सुनने जाती ,
मे्रे मन में यही व्यथा है
चन्द भजनियों ने खोली है,
कथा भागवत की दूकाने
दे जनता को पुण्य प्रलोभन ,
लगे हुए है भीड़ जुटाने
सुनो भागवत,मोक्ष मिलेगा ,
टिकिट स्वर्ग का बाँट रहे है
भोली जनता को फुसला कर ,
अपनी चाँदी काट रहे है
कुछ बूढी,अधेड़ सी सासें ,
बचने घर की रोज कलह से
कथा भागवत के चक्कर में ,
घर से जाती,निकल सुबह से
कुछ बूढ़े ,बेकार निठल्ले,
आ जाते है ,समय काटने
अपने ही हमउम्र साथियों ,
से अपना दुःख दर्द बांटने
कुछ परसादी भगत और कुछ,
श्रोता ,देखा देखी वाले
यही सोच कर ,आ जुटते है ,
हम भी थोड़ा ,पुण्य कमालें
और कथा वाचक पंडितजी ,
पहले हैं ,खुद को पुजवाते
कुछ पढ़ते,कुछ गढ़ते और कुछ,
प्रहसन और प्रसंग सुनाते
लगता श्रोता ,लगे ऊंघने ,
भजन कीर्तन ,चालू करते
दान दक्षिणा ,हर प्रसंग पर ,
चढवा अपनी झोली भरते
ये आयोजन ,लाखों के है ,
अब ये सब ,दुकानदारी है
ये सब चक्कर ,छोड़ो मेडम ,
इसमें बड़ी समझदारी है
ध्यान लगाओ ,परमेश्वर में ,
और पति परमेश्वर होता है
पत्नी के कर्तव्य निभाना ,
सब से बड़ा धरम होता है
अपने ढंग से जीवन जी लें,तुम रंग जाओ ,मेरे रंग में
मै तो चाहूं ,संग तुम्हारा ,और तुम डूबी हो सत्संग में
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
और रहती हो,भूखी दिन भर,
एक वक़्त बस खाना खाकर
पत्नी के कर्तव्य भुला कर,
घर गृहस्थ की जिम्मेदारी
पुण्य कमाने के चक्कर में ,
भटक रही हो ,मारी मारी
एक बार सुनना काफी है ,
वही भागवत ,वही कथा है
बार बार तुम सुनने जाती ,
मे्रे मन में यही व्यथा है
चन्द भजनियों ने खोली है,
कथा भागवत की दूकाने
दे जनता को पुण्य प्रलोभन ,
लगे हुए है भीड़ जुटाने
सुनो भागवत,मोक्ष मिलेगा ,
टिकिट स्वर्ग का बाँट रहे है
भोली जनता को फुसला कर ,
अपनी चाँदी काट रहे है
कुछ बूढी,अधेड़ सी सासें ,
बचने घर की रोज कलह से
कथा भागवत के चक्कर में ,
घर से जाती,निकल सुबह से
कुछ बूढ़े ,बेकार निठल्ले,
आ जाते है ,समय काटने
अपने ही हमउम्र साथियों ,
से अपना दुःख दर्द बांटने
कुछ परसादी भगत और कुछ,
श्रोता ,देखा देखी वाले
यही सोच कर ,आ जुटते है ,
हम भी थोड़ा ,पुण्य कमालें
और कथा वाचक पंडितजी ,
पहले हैं ,खुद को पुजवाते
कुछ पढ़ते,कुछ गढ़ते और कुछ,
प्रहसन और प्रसंग सुनाते
लगता श्रोता ,लगे ऊंघने ,
भजन कीर्तन ,चालू करते
दान दक्षिणा ,हर प्रसंग पर ,
चढवा अपनी झोली भरते
ये आयोजन ,लाखों के है ,
अब ये सब ,दुकानदारी है
ये सब चक्कर ,छोड़ो मेडम ,
इसमें बड़ी समझदारी है
ध्यान लगाओ ,परमेश्वर में ,
और पति परमेश्वर होता है
पत्नी के कर्तव्य निभाना ,
सब से बड़ा धरम होता है
अपने ढंग से जीवन जी लें,तुम रंग जाओ ,मेरे रंग में
मै तो चाहूं ,संग तुम्हारा ,और तुम डूबी हो सत्संग में
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Subscribe to:
Posts (Atom)