Sunday, June 16, 2013

बिजली

           
  कभी जाती हो चली और कभी आ जाती हो तुम 
 मुझसे आँख मिचौली करती ,बहुत तड़फाती हो तुम  
जब भी मै छूता तुझे ,तो झटका देती हो मुझे , 
दिलरुबा बोलूँ की या फिर ,कहूँ मै  बिजली तुझे 
'घोटू '

Wednesday, June 12, 2013

घडी

            
ये घडी,
एक स्थान पर पड़ी 
सबसे टिक टिक  कहती रहती 
और खुद रहती,
 एक जगह पर टिक कर ,
लेकिन हरदम  चलती रहती 
जब तक इसमे बेटरी या सेल है 
तभी तक इसका खेल है 
आदमी की जिंदगी से ,
देखो कितना मेल है 
इसकी टिक  टिक ,आदमी की सांस जैसी ,
बेटरी सी आदमी की जान है 
जब तक बेटरी मे पावर है 
साँसो का आना जाना उसी पर निर्भर है 
बेटरी खतम,
घडी भी बंद,साँसे भी बंद 
घडी मे होते है तीन कांटे ,
सेकंड का काँटा ,बड़ी तेजी से चलता रहता है 
बचपन की तरह ,उछलता रहता है 
मिनिट का काँटा,
जवानी की तरह ,थोड़ा तेज तो है,
पर संभल  संभल कर चलता है 
और घंटे का कांटा ,
जैसे हो बुढ़ापा 
बाकी दोनों कांटो के चलने पर निर्भर 
बड़े आराम से ,धीरे धीरे ,
बढ़ाता है अपने कदम 
क्या पता ,कब घड़ी ,जाय थम 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

उतार चढाव

           उतार चढाव
     
उठता  है जो कोई तो फिर गिरता  भी कोई है,
                             डालर चढ़ा तो रुपैया   धडाम हो गया
मोदीजी की  पतंग जो ऊपर को उड़ गयी ,
                               अडवानी जी का थोड़ा  नीचा नाम हो गया
गुस्से में बौखला के उनने स्तीफा दिया ,
                                सपना पी  एम बनने का ,तमाम हो गया
मोहन ने ऐसी भागवत   है कान में पढी,
                               फिर  से  पुराना वो ही ताम  और झाम हो गया 
    मदन मोहन बाहेती'घोटू '    

Monday, June 10, 2013

         जब पसीना गुलाब था 
          
वो दिन भी क्या थे ,जब कि पसीना गुलाब था 
हम भी जवान थे और तुममे भी शबाब था 
तुम्हारा प्यार   मदभरा  जामे-शराब था 
उस उम्र का हर एक लम्हा ,लाजबाब  था 
             बेसब्रे थे और बावले ,मगरूर बहुत थे
            और जवानी के नशे में हम चूर  बहुत थे 
            पर जोशे-जिन्दगी से हम भरपूर बहुत थे 
            लोगों की नज़र में हम नामाकूल  बहुत थे
  जब इन तिलों में तेल था ,वो दिन नहीं रहे 
  अरमान दिल के हमारे आंसू में  सब   बहे 
  अपने ही गये  छोड़ कर ,अब किससे क्या कहे 
  टूटा है दिल, उम्मीद के ,सारे  किले  ढहे 
            हमने था जिन्दगी  को बड़े चाव से जिया 
             आबे-हयात उनके लबों से था जब पिया 
               बढ़ती हुई उम्र ने है ऐसा सितम किया 
             वो दिन गए जब मारते थे ,फ़ाक़्ता मियां 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जिन्दगी बस ऐसे ही चलती है

 जिन्दगी  बस ऐसे ही चलती है 

शुरू शुरू में बड़ा चाव होता है 
मन में एक नया उत्साह होता है 
जीवन में छा जाते है नए रंग 
नए नए सपने,नई नई  उमंग 
और फिर धीरे धीरे ,रोज का चक्कर 
कभी कभी सुहाता,कभी बड़ा दुःख कर 
ढलती है जवानी और उमर है बढ़  जाती 
 इसी तरह जीने की ,आदत  पड़  जाती 
कभी कच्ची रहती,कभी दाल गलती 
जिन्दगी सारी ,बस ऐसे  ही चलती 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

पथ्य

      
          पथ्य 
लूखी रोटी,सब्जी पतली 
चांवल लाल,दाल भी पतली 
और सलाद,मूली का गट्टा 
और साथ में फीका  मट्ठा 
डाक्टर ने जो बतलाया था 
कल मैंने वो ही खाया  था 
या बस अपना पेट भरा था 
सच मुझको कितना अखरा था 
एक तरफ पकवान,मिठाई 
देख देख नज़रें ललचाई 
मगर बनायी इनसे दूरी 
बीमारी की थी मजबूरी 
कई बार ये आता  जी में 
इतना सब कुछ दिया विधी ने 
सब इन्जोय करो,कहता  मन 
तो फिर क्यों है इतना बंधन 
खाना  चाहें,खा न सके हम 
कब तक खुद को रोकेंगा मन 
हम सब है खाने को जीते 
या जीने को खाते,पीते 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

एक ही थैली के चट्टे बट्टे

           एक ही थैली के चट्टे  बट्टे 
        
खुद है गंदे ,और हमको   साफ़ करने आ गये 
देखो बगुले,भक्त बन कर,जाप करने आ गये 
कोर्ट में लंबित है जिनके ,गुनाहों का मामला ,
अब तो मुजरिम भी यहाँ,इन्साफ करने आ गये 
भले मंहगाई बढे और सारी जनता हो दुखी ,
भाड़ में सब जाये ,खुद का लाभ करने आ गये 
यूं ही सब बदहाल है ,टेक्सों के बढ़ते  बोझ से,
हमको फिर से नंगा ये चुपचाप करने  आ गये 
रोज बढ़ती कीमतों से,फट गया जो दूध  है,
उसके रसगुल्ले बना ये  साफ़ करने  आ गये 
एक ही थैली के चट्टे बट्टे,मतलब साधने ,
कौरवों से पांडव ,मिलाप करने  आ गये 
पाँव लटके कब्र में है,मगर सत्ता पर नज़र,
बरसों से  देखा ,वो पूरा ख्वाब करने आ गये 
बहुत हमको रुलाया,अब तो बकश दो तुम हमें,
सता करके फिर हमें ,क्यों पाप करने आ गये 
बहुत झेला हमने 'घोटू',वोट हमसे मांग कर ,
फिर से शर्मिन्दा हमें ,क्यों आप करने आ गये 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'