Tuesday, June 25, 2013

सवेरे की सैर

        
             सवेरे की सैर 
सवेरे सवेरे ,
प्राची के एक कोने से,
झाँकता हुआ सूरज ,
देखता है ये सारे नज़ारे 
अपने हालातों से परेशान,
फिर भी अट्ठ्हास लगाते हुये ,
लाफिंग क्लब के,सदस्य सारे 
सासों के शिकवे ,बहुओं के गिले
सुनाई देते  है,कभी  न खतम होने वाले,
अंत हीन सिलसिले
लकड़ी के सहारे ,धीरे धीरे टहलते ,
बुजुर्गों की व्यथाएं 
बढ़ती हुई उमर की,पीड़ा की कथाएँ 
प्राम मे बैठा कर ,अपने नन्हें पोते,पोतियाँ 
घुमाती हुई,घुटनो के दर्द से ,
पीड़ित उनकी दादियाँ
अपने नाजुक कंधों पर,
ढेर सारी किताबों का बोझ लादे ,
भविष्य के सपने सँजोये , 
स्कूल बस पकड़ने भागते बच्चेऔर बच्चियाँ   
और हाथ मे सेंडविच लिए,
बच्चों को खिलाती हुई ,
उनके संग संग भागती ,उनकी मम्मियाँ 
अपने लाडले को झूला झुलाते हुये पिता 
और हर पेंग पर ,उसकी मम्मी ,
उसे केले का एक बाइट खिलाती जाये  
फोन पर प्रवचन या पुराने गाने सुनते,
सेहत के प्रति जागरूक ,
पुरुष  और महिलायें 
अपनी बुझती हुई आँखों मे ,
भरे हुये लाचारी 
हरी हरी घाँस पर ,
नंगे पैर घूमते नर नारी 
मै भी सुबह सुबह की सैर के बाद,
ठंडी ठंडी हवाओं के झोंकों से,
ठंडी सी सांस भर , एक बार 
थका थका ,अपने घर की तरफ लौटता हूँ,
जहां पर चाय का प्याला बना,
मेरी बीबी ,कर रही होगी मेरा इंतजार 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 
   

Sunday, June 23, 2013

नामाक्षर गण्यते

             नामाक्षर  गण्यते
           
 दुशयंत  ने,शकुंतला से गंधर्व शादी रचाई 
उसे  भोगा ,और,
अपने नाम लिखी एक अंगूठी पहनाई 
और राजधानी चला गया,यह कह कर
'नामाक्षर गण्यते' याने,
मेरे नाम के तुम गिनना अक्षर 
इस बीच मै आऊँगा  
और तुम्हें महलों मे ले जाऊंगा 
गलती से शकुंतला की अंगूठी खो गई 
और कई दिनो तक,जब दुष्यंत आया नहीं 
तो शकुंतला गई राज दरबार 
पर दुष्यंत ने पहचानने से कर दिया इंकार 
 जब भी चुनाव नजदीक आता है 
मुझे ये किस्सा याद आ जाता है  
क्योंकि ,आज की सत्ता ,दुशयंत सी है,
जो चुनाव के समय,
शकुंतला सी भोली जनता पर,
प्रेम का प्रदर्शन कर ,
सत्ता का सुख भोग लेती  है 
और फिर उसे कभी अंगूठा ,
या आश्वासन की अंगूठी पहना देती  है 
साड़ेचार अक्षरों का नाम लिखा होता है जिस पर 
सत्ता सुख की मछली ,
उस अंगूठी को निगल जाती है ,पर 
और गुहार करती ,जनता,जब राजदरबार जाती है 
पहचानी भी नहीं जाती है 
हाँ,नामाक्षर गण्यते का वादा निभाया जाता  है 
उसके नाम का एक एक अक्षर,
एक एक वर्ष सा हो जाता है 
और तब कहीं साड़े चार साल बाद 
उसे आती है जनता की याद 
क्योंकि पांचवें साल मे,
 आने वाला होता है चुनाव  
और सत्ताधारियों को याद आने लगता है,
जनता के प्रति अपना  लगाव 
जब भी चुनाव नजदीक आता है 
मुझे ये किस्सा याद आता है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

हे गंगाधर!


हे शिव शंकर!
श्रद्धानत भक्तों की भारी भीड़ देख कर,
आप इतने द्रवीभूत हो गए,
कि आपका दिल बादल सा फट पड़ा 
आपने तो अपनी जटाओं मे ,
स्वर्ग से अवतरित होती गंगा के वेग को,
वहन कर लिया था ,
पर हम मे इतना सामर्थ्य कहाँ,
जो आपकी भावनाओं के वेग को झेल सकें,
आपने बरसने के पहले ये तो सोचा होता 
भस्मासुर कि तरह वरदान देकर ,
कितनों को भस्म कर दिया 
मंद मंद बहनेवाली मंदाकिनी को,
वेगवती बना दिया
अपनी ही मूर्ती को ,गंगा मे बहा दिया 
हे गंगाधर !
आपने ये क्या किया ?
मदन मोहन बाहेती'घोटू ' 

मै ना बदला,तुम ना बदली

       

सब कुछ बदल गया दुनिया मे ,
                    मै ना बदला ,तुम  ना बदली 
मै तुम पर पहले सा पगला,
                   और तुम भी  पगली की पगली 
साइकिल अब कार बन गई,काला फोन बना मोबाइल 
और रेडियो ने बन टी वी ,जीत लिया है ,सबका ही दिल 
मटके और सुराही फूटे ,अब घर घर मे रेफ्रीजरेटर 
ए सी ,पंखे,और अब कूलर,गर्मी मे करते ठंडा  घर 
लालटेन और दिये बुझ गए ,
                       अब घर रोशन करती बिजली  
सब  कुछ बदल गया दुनिया मे ,
                      मै ना बदला,तुम ना बदली 
प्रेमपत्र अब लिखे न जाते,इंटरनेट चेट होती  है   
आपस मे अब लुल्लू चुप्पू,मीलों दूर,बैठ होती है 
इस युग मे ,पति पत्नी ,लेकर,इक दूजे का नाम बुलाते 
पर तुम्हारे'ए जी 'ओ जी',अब भी मुझको बहुत सुहाते 
मेरे आँगन बरसा करती,
                   बन कर प्यार भरी तुम बदली 
सब कुछ बदल  गया दुनिया मे,
                   मै ना बदला,तुम ना बदली 
बेटा बेटी ,बदल गये सब,अपना घर परिवार बसा कर 
अपने अपने घर मे खुश है ,कभी कभी मिल जाते आकर
भाई बहन ,व्यस्त अपने मे,सबकी है अपनी मजबूरी 
बस अब हम तुम बचे नीड़ मे,और बनाई सब ने दूरी 
बंधा हुआ मै तुम्हारे संग ,
                      और तुम भी मेरे संग बंध ली 
सब कुछ बदल गया दुनिया मे,
                       मै ना बदला ,तुम ना बादली
       
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, June 20, 2013

भेदभाव

        
         भेदभाव 
किसी भी वृक्ष में ,
जब फल लगते है ,
सभी का लगभग एक सा आकार ,
और एक सा स्वाद होता है
कोई पौधा ,
जब पुष्पित होता है,
तो सभी पुष्पों का समान रूप ,
और एक  सी महक होती है
ये सभी वृक्ष और पौधे तूने ही बनाए है
और इंसान को भी तूने ही बनाया है 
तो फिर क्यों ,
तेरे ही बनाये मानव की संताने ,
अलग अलग लिंग,
अलग अलग रूप रंग ,
और अलग अलग स्वभाव लिए होती है ?
भाई भाई या बहन भाई के स्वभाव में ,
इतनी भिन्नता क्यों होती है ?
भगवान ने  इंसान के साथ ,
यह भेदभाव क्यों किया है?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

उत्तराखंड की त्रासदी पर

    
     उत्तराखंड  की त्रासदी पर

हे महादेव!
ये तो हम सब जानते हैं ,
कि आप संहार के देवता है
लेकिन हे केदार !
आप तो हैं बड़े उदार ,
आप तो भोलेनाथ भी कहाते है
अपने भक्तों को ,
दुःख और पीड़ा से बचाते है
तो फिर क्यों,
श्रद्धा से आपको सर नमाने ,
आये हुए भक्तों की भीड़ पर ,
मौत का तांडव दिखा दिया
आप इतने स्वार्थी कब से हो गये ,
कि कितनो का ही घर उजाड़ दिया ,
और अपना घर बचा लिया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सबके कैसे कैसे वाहन

    
         सबके कैसे कैसे  वाहन
श्री गणेश बैठे चूहे पर,कार्तिकेय मोर पर उड़ते 
शंकर जी बैठें नंदी पर,और विष्णु जी उड़े गरुड पे 
सूर्य देवता सात अश्व के,रथ पर चढ़ है घूमा करते 
और यमराज चढ़े भैसे पर,आता देख सभी है डरते 
गदहा शीतल माँ का वाहन ,शनि देव का वाहन हाथी 
इंद्र देवता एरावत पर,ख़ुद उड़ते है हनुमान जी
दुर्गा करती सिंह सवारी ,उल्लू है लक्ष्मी का वाहन 
सरस्वती जी  हंसवाहिनी ,सबके कैसे कैसे वाहन 
घोटू