Wednesday, October 23, 2013

छोड़ राधा गाँव वाली -आठ पटरानी बनाली

   छोड़ राधा गाँव वाली -आठ पटरानी बनाली

प्रीत बचपन की भुलाके ,छोड़ राधा गाँव वाली
कृष्ण तुमने शहर जाकर ,आठ पटरानी बनाली
गाँव में थे गोप,गायें,गोपियाँ थी,सखा भी थे
माँ यशोदा ,नन्द बाबा ,प्यार सब करते तुम्ही से
दूध का भण्डार था और,दही था,माखन  बहुत था
भोले गोकुल वासियों में,प्यार, अपनापन बहुत था
कभी तुम गैया चराते ,कभी तुम माखन चुराते
मुग्ध होती गोपियाँ सब,बांसुरी जब थे बजाते
और तुम नटखट बहुत थे ,कई हांडी फोड़ डाली
प्रीत बचपन की भुलाके ,छोड़  राधा गाँव वाली 
शहर की रंगीनियों ने ,इस कदर तुमको लुभाया
भूल कर भी गाँव अपना ,पुराना वो याद आया
इस तरह से रम गए तुम,वहां के वातावरण में
नन्द बाबा ,यशोदा का ,ख्याल भी आया न मन में
छोड़ मथुरा ,द्वारका जा ,राज्य था अपना बसाया
सुदामा को याद रख्खा ,किन्तु राधा को भुलाया
मिली जब भी, जहां मौका ,नयी शादी रचा डाली
प्रीत बचपन की भुला के ,छोड़ राधा गाँव वाली
कृष्ण तुमने शहर जाकर ,आठ पटरानी ,बनाली

मदन मोहन बाहेती'घोटू;

दीवाली और बूढी अम्मा

         घोटू के छक्के
   दीवाली और बूढी  अम्मा

बूढी अम्मा दिवाली पर थी बहुत उदास
फीका सा त्योंहार है,बेटा ना है पास
बेटा ना है पास लगे सब सूना ,सूना
जब से शहर गया है,आता गाँव कभी ना
बूढ़े पति ने समझाया क्यों होती व्याकुल
कृष्ण गये थे मथुरा,क्या लौटे थे गोकुल

घोटू 

आज करवा चौथ सजनी ...

          आज करवा चौथ सजनी ...

आज करवा चौथ सजनी ,और तुमने व्रत रखा है
तुम भी भूखी,मै भी भूखा,प्रीत की ये रीत  क्या है
 सोलहों शृंगार करके ,सजाया है रूप अपना
 भूख से व्याकुल तुम्हारा ,कमल मुख कुम्हला गया है      
रसीले से होठ तुम्हारे बड़े सूखे पड़े है ,
सुबह से निर्जल रही हो ,नहीं पानी तक पिया   है
रूपसी ,व्रत पूर्ण अपना ,करोगी कर चन्द्र दर्शन ,
आज मै हूँ बाद में और मुझ से  पहले चंद्रमा है
चन्द्र दर्शन की प्रतीक्षा में बड़ी बेकल खड़ी हो,
देखलो निज चन्द्र आनन,सामने ही आइना है
मिले मुझको दीर्ध जीवन ,कामना मन में संजोये ,
क्षुधा से पीड़ित तुम्हारा ,तन शिथिल सा हो गया है
तुम भी भूखी,मै भी भूखा , प्रीत की ये रीत क्या है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कन्या के फेर में

     घोटू के छंद
   कन्या के फेर में

संतों का भेष धरे,छिप छिप व्यभिचार करे ,
                               अपनी तिजोरी भरे ,प्रवचन के खेल में
कान्हा का रूप सजा ,गोपिन संग रास रचा ,
                                बहुत उठाया मज़ा ,भक्तिन संग मेल में
खा कर के स्वर्ण भसम ,खूब खुल के खेले हम,
                                 मगर फंसे कुछ ऐसे ,कन्या के फेर में
आशा निराशा भयी ,ऐसी हताशा भयी ,
                                  बेटा है भाग रहा  ,और हम हैं जेल  में

घोटू

Monday, October 21, 2013

करवा चौथ पर -पत्नी जी के प्रति

        करवा चौथ पर -पत्नी जी के प्रति

मद भरा मृदु गीत हो तुम,सुहाना संगीत हो तुम
प्रियतमे तुम प्रीत मेरी और जीवन गीत हो तुम
बंधा जब बंधन सुहाना ,लिए मुझ संग सात फेरे
वचन था सुख ,दुःख सभी में  ,रहोगी तुम साथ मेरे
पर समझ में नहीं आता ,जमाने की रीत क्या है
मै सलामत रहूँ ,तुमने ,आज दिन भर व्रत रखा है
खूब मै ,खाऊँ पियूं और दिवस भर निर्जल रहो तुम
कुछ न  खाओ ,इसलिए कि  ,उम्र मेरी रहे अक्षुण
तुम्हारे इस कठिन व्रत से ,कौन सुख मुझको मिलेगा
कमल मुख कुम्हला गया तो ,मुझे क्या अच्छा लगेगा
पारिवारिक रीत ,रस्मे , मगर पड़ती  है  निभानी
रचा मेहंदी ,सज संवर के ,रूप की तुम बनी रानी
बड़ा मनभावन ,सुहाना ,रूप धर ,मुझको रिझाती
शिथिल तन,दीवार व्रत की ,मगर है मुझको सताती
प्रेम की लौ लगी मन में ,समर्पण , चाहत बहुत है
एक व्रत जो ले रखा है ,बस वही पतिव्रत  बहुत है
चन्द्र का कब उदय होगा ,चन्द्रमुखी तुम खड़ी उत्सुक
व्रत नहीं क्यों पूर्ण करती ,आईने में देख निज  मुख

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, October 20, 2013

ब्रह्मज्ञानी

               ब्रह्मज्ञानी

मै ब्रह्मज्ञानी हूँ
मै जानता हूँ कि विधाता ने ,
ये सारा ब्रह्माण्ड बनाया है
नर और मादा के मिलन से ही,
इस संसार में जीवन आया है
प्रभु की बनायी हुई इस धरती पर ,
करके थोडा बहुत अतिक्रमण
अगर मैंने बना लिए ,अपने आश्रम
तो ये सब ब्रह्मज्ञान फैलाने के लिए है
भक्तों को ,मिलन की महत्ता बतलाने के लिए है
यहाँ ,मेरी भक्तिने और भक्तगण
अपना सबकुछ कर देते है मुझे समर्पण
मै ,इस युग में,कृष्ण बन कर
 द्वापर  युग से प्रेम की प्यासी ,
गोपियों की प्यास बुझाता हूँ
उनके संग ,जल क्रीडा कर,चीरहरण करता हूँ,
और फिर रास रचाता हूँ
सच तो ये है ,कि सम्भोग ही सच्ची समाधि है
तो अपनी भक्तिनो संग ,एकान्त कुटी में,
ब्रह्मज्ञान में लीन होने पर ,
दुनिया  क्यों कहती मुझको अपराधी है
भागवत में लिखी है ये बात साफ़
स्वर्ण में रहता है कलयुग का वास
इसलिए मै स्वर्ण को भस्म कर देता हूँ,
और स्वर्ण भस्म को ,उदरस्त कर लेता हूँ
कितने ही लोगों को कलियुग के अभिशाप से बचाता हूँ
देर तक प्रेम में लीन होने का पाठ पढाता हूँ
एक ऋषि विश्वामित्र होते थे ,वो भी ब्रह्मज्ञानी थे
एक अप्सरा मेनका को देख ,हुए पानी पानी थे
भूल गए थे सब तप ,छाई थी ऐसी मस्ती
मेरे आश्रम में तो ,सैंकड़ों मेनकाएँ है ,
जब विश्वामित्र पिघल गए ,तो मेरी क्या हस्ती
मेरी एकांत कुटी में मेनकाओं के संग,
प्रेम और ब्रह्मज्ञान का दीपक रोज जलता है
दुनिया भले ही कुछ भी बोले ,
पर ब्रह्मज्ञानी को ,कोई भी पाप नहीं लगता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, October 18, 2013

इश्क की हकीकत

         इश्क की हकीकत

अकेले में प्यार का इजहार जब हमने किया ,
हाथ मेरा ,उनने पकड़ा ,और सहलाने लगे
देख ये रिस्पोंस उनका ,बढ़ा अपना हौसला ,
धीरे धीरे और भी नजदीक हम जाने लगे
उनने   झटका हाथ,झिड़का ,और पीछे हट गए ,
बोले अपनी रहो हद में,पास क्यों आने लगे
इससे ज्यादा तुम न हरकत करो और आगे बढ़ो,
इसलिए था हाथ पकड़ा ,हम को बतलाने लगे

घोटू