Tuesday, March 18, 2014

भड़ास

             भड़ास

पत्नी के इशारों पर नाचनेवाले पति,
जब भी थोड़ी सी ,फुर्सत पाते है
हाथ में रिमोट लेकर ,
टी वी देखने लग जाते है
और अपनी उंगली के इशारों पर ,
चेनल बदल बदल कर ,
खुश होते रहते है
अपने मन की भड़ास निकालना ,
इसे कहते है

घोटू

Sunday, March 16, 2014

झपकियाँ

         झपकियाँ

ट्रेन में या बसों में या कार में
यहाँ तक के सिनेमा के हाल में
और हवाई उड़ानों के दरमियाँ
जायेंगे मिल ,लोग लेते झपकियाँ
           आप यदि कोई कथा में जायेंगे
            आधे श्रोता ,ऊंघते मिल जायेंगे
            कथावाचक इसलिए ही  बीच में ,
            जगाने को,कीर्तन करवाएंगे
नेताओं के लम्बे भाषण होरहे
पाओगे तुम,लोग कितने सो रहे
यहाँ तक कि मंच पर आसीन भी,
  कई नेता नींद में है खो   रहे        
               हाल में संसद के देखो बेखबर
                झपकियाँ लेते है नेता बैठ कर
                पहनते है काला चश्मा लोग कुछ,
                 झपकियाँ लेते, नहीं आये नज़र
नींद आने के लिए जब लपकती
कभी खुलती, कभी आँखें झपकती
कभी खर्राटों के स्वर भी गूंजते ,
और रह रह कर के गर्दन संभलती
               नींद आने का है सिग्नल  झपकियाँ
                रोकना होता है मुश्किल   झपकियाँ
                क्या  करेगा वो सुहागरात को ,
                 फेरों पे बैठा  जो लेता   झपकियाँ

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   
 

Saturday, March 15, 2014

जिंदगी की दास्तान

          जिंदगी की दास्तान

जाने किस किस दौर से ,गुजरी हमारी जिंदगी
ठोकरों से पाठ सीखा , और निखारी जिंदगी
मगर उनकी बेरुखी ने ,टुकड़े टुकड़े दिल किया ,
भर रही है सिसकियाँ,अब तक बिचारी जिंदगी
वो किसी दिन तो मिलेंगे,गले से लग जायेंगे,
 काट दी इस आस में ही ,हमने  सारी  जिंदगी
आँखों से तो ,आंसुओं की ,गंगा जमुनाये बही,
मगर फिर भी प्यास की ,अब तक है मारी जिंदगी
जिस्म पीला पड़ गया पर हाथ ना पीले हुए ,
कब तलक तनहा रहेगी ,ये कुंवारी  जिंदगी
स्वाद क्या है जिंदगी का समझ हम पाये नहीं ,
कभी मीठी ,चरपरी फिर ,कभी खारी जिंदगी
हमने तुझको सर नमाया ,पूजा की,की बंदगी,
पर खुदा तूने नहीं ,अब तक संवारी जिंदगी 
चैन से अपने लिए,दो पल भी जी पाते  नहीं ,
मारा मारी लगी ही रहती है सारी  जिंदगी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 

बदलता मौसम

        बदलता मौसम

बदलते मौसम ने कितनी है बदल दी जिंदगी ,
       या उमर का ये असर है ,समझ ना पाते है हम
सर्दी के मौसममे जब भी सर्दी लगती है हमें ,
       लिपट कर के ,तेरी बाहों में समा जाते है हम
गर्मियों के दिनों में यूं बदलते हालात है,
        लिपटते है तुमसे जब हम ,झट झिटक देती हो तुम,
क्योंकि तुमको गर्मी लगती है हमारे प्यार मे ,
        चिपचिपे पन से बचाने,लिफ्ट ना देती हो  तुम
हम भी चुम्बक तुम भी चुम्बक पर 'अपोजिट पोल 'है
       हम में आकर्षण बहुत आता ,जब आती सर्दियाँ
गर्मियों में ,एक जैसे 'पोल'बन जाते है हम ,
        एक दूजे से छिटकते , वक़्त की  बेदर्दियां
जवानी जो सर्दियाँ है ,तो बुढ़ापा ग्रीष्म है,
         उमर के संग ,मौसमो सा ,बदलता  है आदमी  
सख्त से भी  सख्त दिल इंसान, बनता मोम है,
          प्यार से पुचकार भी लो,तो पिघलता  ,आदमी
लुभाती थी जो गरम साँसे तुम्हारे प्यार की ,
           लगती खर्राटे हमें है, आजकल ये हाल है
पहले तकिया था सिरहाने,फिर सिरहाना तुम बनी ,
            आजकल तकिया हमारे बीच की दीवार  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

होली के मूड में -दो कवितायें

    होली   के मूड  में -दो कवितायें
                        १
आयी होली ,आ लगा दूं,तेरे गालों पर गुलाल,
                       रंग गालों का गुलाबी और भी खिल जाएगा
मगर मुझ पर आहिस्ते से ही लगाना रंग तुम,
                       बढ़ी दाढ़ी ,हाथ नाज़ुक ,तुम्हारा छिल जाएगा
बात सुन ये, कहा उनने ,नज़र तिरछी डाल कर,
                       चुभाते ही रहते  दाढ़ी,तुम  हमारे   गाल  पर    
  खुरदरेपन की चुभन का ,मज़ा ही कुछ और है,
                       मर्द हो तुम ,मज़ा तुमको ये नहीं  मिल पायेगा 

                           २
अबकी होली में कुछ ऐसा ,प्यारा  हुआ प्रसंग ,सजन
यूं ही बावरे हम,ऊपर से ,हमने पी ली  भंग ,सजन
ऐसी ऐसी जगहों पर है,तुमने डाला   रंग ,  सजन
अपने रंगमे भिगो भिगो कर,खूब किया है तंग ,सजन
रंग गया ,रंग में तुम्हारे ,है मेरा हर  अंग  ,सजन
जी करता ,जीवन भर होली,खेलूँ तेरे  संग ,सजन 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Thursday, March 13, 2014

अगन और जीवन

       अगन और जीवन               

होली पर होली  जलती है
          लोढ़ी पर है लोढ़ी  जलती
दीवाली पर दीपक जलते ,
                   नवरात्रों में ज्योति जलती
दशहरे पर जलता रावण,
                दीपक जलते हर पूजन में
आतिशबाजियां जलती है,
                    हर उत्सव के आयोजन में
जलती है अग्नी हवनकुंड में 
                    होता है जब यज्ञ ,हवन
अग्नी के फेरे सात  लिए,
                  बंध  जाता है जीवन बंधन  
जब घर में चूल्हा जलता है,
                   तो पेट सभी का पलता  है
सब त्योहारों में जले अगन,
                   अग्नी से जीवन चलता है
है पंचतत्व में अग्नि तत्व ,
                    और अग्नी देव कहाती है
दो पत्थर के टकराने से
                  भी अग्नी प्रकट हो जाती है
है अग्निदेव पालक , पोषक ,
                       और अग्नी ही विध्वंशक है
अंधियारे में जलती बाती ,
                        तो होती राह प्रदर्शक है
कुछ एक दूसरे से जलते ,
                कुछ विरह अगन में जलते है
जीवन भर चिंता में जलते ,
                    मर,चिता अगन में जलते है
अग्नि से जीवन चलता हम ,
                     जीवन भर जलते रहते है
जो पानी आग  बुझाता है,
                      हम क्यों उसको जल कहते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  
                        

थ्रिल

              थ्रिल
सवेरे ,सवेरे ,
ताजे ताजे अखबार के ,
करारे करारे पन्ने को,
एक एक कर खोल कर ,
नयी नयी ख़बरें,
पढ़ने में जो मज़ा आता है
वो रात को टी वी पर ,
देख लो सब खबर,
तो गुम हो जाता है
जैसे शादी के पहले ,
डेटिंग ,सेटिंग करने से,
सुहागरात का थ्रिल चला जाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'