Saturday, May 31, 2014

हमारी दास्ताँ

            हमारी दास्ताँ

सभी ने जब सुनायी दास्ताने अपनी अपनी तो ,
      लगा ये  दास्ताँ सबकी ,मुझी  से मिलती जुलती है
यूं ही बैठा रहा मै कोसता तक़दीर को अपनी ,
          खुदा  को बददुआ देता रहा ,ये  मेरी गलती है 
मुकद्दर लिखने वाले ने ,खुशी गम लिख्खे है सारे ,
           किसी को थोडे कम है तो किसी को थोडे ज्यादा है 
किसी को बचपने में दुःख,कोई हँसता जवानी में,
            और मुश्किल से कोई काटता ,अपना बुढ़ापा  है
रहे हर हाल में जो खुश ,जूझ सकता हो मुसीबत से ,
            नाव तूफ़ान में भी उसकी हरदम पार लगती है
सभी ने जब सुनायी दास्ताने अपनी अपनी तो,
      लगा ये दास्ताँ सबकी ,मुझी से मिलती जुलती है            
 राह में जिंदगी की कितने ही पत्थर पड़े मिलते,
      करोगे साफ़ जब  रोड़े ,तभी बढ़ पाओगे   आगे
उठाओगे जो पत्थर ,कोई हीरा मिल भी सकता है,
      बिना कुछ भी किये क्या भाग्य कोई का कभी जागे  
जो पत्थर राह की अड़चन है उनमे है बड़ी ताक़त ,
      जब टकराते है आपस में ,तो चिंगारी  निकलती  है
सभी ने जब सुनायी दास्ताने अपनी अपनी तो,
       लगा ये दास्ताँ सबकी,मुझी से मिलती जुलती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, May 30, 2014

मॉडर्न बीबियाँ

          मॉडर्न बीबियाँ

सुनती हैं इस कान से ,उस कान से देती निकाल ,
बात अपने पतियों की,भला सुनता  कौन है
आजकल इस बात की भी उनको है फुर्सत नहीं,
कान में अब लगा रहता ,उनके ईयर फोन है
हाथों में ले हाथ ,हमसे बात करते थे कभी,
दास्ताँ बन रह गए है ,वो पुराने दिन सभी ,
क्योंकि उनके हाथ में है रहता मोबाईल सदा ,
हो गया दिल उनका अब 'डू नाट डिटर्ब 'झोन 'है

घोटू  

Wednesday, May 28, 2014

मज़ा -छतों का

   मज़ा  -छतों का

हमें है याद आती 'घोटू'रातें गर्मियों की वो,
छतों पर लोग सोते थे,छतें गुलजार रहती थी
चांदनी रात में हर छत पे जब चन्दा चमकता था,
थपकियाँ दे सुलाती थी,हवाएँ मस्त बहती थी
धूप में सर्दियों की ,छतों पर चौपाल जमती थी ,
कभी बड़ियाँ ,कभी पापड कभी आचार बनते थे
टूटते व्रत थे करके चन्द्र दर्शन ,छतों पर जाकर ,
जब करवा चौथ के और तीज के त्यौहार मनते थे
अकेले,चुपके चुपके ,छत पे जाकर ,मज़ा मिलने का,
याद अब  जब भी आता ,मुंह में मिश्री घोल देता है
पड़ोसी की छतों पर ताकने  का,झाँकने का  सुख,
राज़ कितने ही अनजाने ,अचानक खोल देता है
पड़ोसन अपनी गीली जुल्फों से ,मोती छिटकती थी,
सवेरे ही सवेरे ये बड़ा उपहार होती  था
हमें जब कनखियों से ,अपने छत से ,देखती थी वो,
हमारे तन और मन में   गुदगुदी हर बार होती थी
मगर अब फ्लेट है  कितने, इमारत कितने मंज़िल की,
अकेली रह गयी उन पर ,बिचारी छत ,तरक्की में
अब तो बस लोग अपने घरों में ही दुबके रहते है ,
लिया है छीन हमसे छतों का सुख,इस तरक्की ने

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ग़ज़ल

            ग़ज़ल

जो कमीने है,कमीने ही रहेंगे
दूसरों का चैन ,छीने ही रहेंगे
कुढ़ते ,औरों की ख़ुशी जो देख उनको,
जलन से आते पसीने ही रहेंगे
कोई पत्थर समझ कर के फेंक भी दे,
पर नगीने तो नगीने ही रहेंगे
 आस्था है मन में तो ,काशी है काशी ,
और मदीने तो मदीने ही रहेंगे
उनमे जब तक ,कुछ कशिश,कुछ बात है ,
हुस्नवाले लगते सीने ही रहेंगे
 अब तो भँवरे ,तितलियों में ठन गयी है,
कौन रस फूलों का पीने ही रहेंगे
जितना भी ले सकते हो ले लो मज़ा ,
आम मीठे,थोड़े महीने ही रहेंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, May 27, 2014

तूफ़ान के बाद

       तूफ़ान के बाद

जब कभी तूफ़ान आता है तो अक्सर ,
       होता मौसम दूसरे दिन खुशनुमा है
आग की जब भी तपिश में तपा करता ,
        रूप कुंदन का निखरता  दस गुना है
जिंदगी का फलसफा इतना है केवल
आज गम है तो खुशी फिर आएगी कल
आदमी फिर भी न जाने क्यों हमेशा
चिंताओं में डूब कर  , रहता  परेशां   
रात है तो कल सुबह भी आएगी ही
दुखी है जो जिंदगी ,मुस्काएगी ही
निराशा के, घिरे सब बादल छटेंगे
राह की बाधा ,सभी कांटे हटेंगे
लगन से जो चलोगे ,होगी न मुश्किल
मिलेगी निश्चित ,तुम्हारी तुम्हे मंजिल
हक़ीक़त बन सामने आ जाएगा  वो,
          कोई भी सपना अगर तुमने बुना है
जब कभी तूफ़ान आता है तो अक्सर ,
         होता मौसम ,दुसरे दिन खुशनुमा है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कुर्सी

           कुर्सी

कुर्सियों पर आदमी चढ़ता नहीं है ,
                 कुर्सियां चढ़ बोलती दिमाग पर
भाई बहन,ताऊ चाचा ,मित्र सारे,
                 रिश्ते नाते ,सभी रखता  ताक पर 
गर्व से करता तिरस्कृत वो सभी को ,
                  बैठने देता न मख्खी   नाक पर
भूत कुर्सी का चढ़ा है जब उतरता ,
                  आ जाता है अपनी वोऔकात पर    

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मोदी आया

              मोदी आया

आ गया मोदी नरेंदर, बात ये सुन ,
                   लगा गिरने नीचे है  डॉलर बिचारा
सब के सब शेयर उछलने लग गए है,
                    ख़ुशी से बदला हुआ  ,माहौल सारा
भाईचारे की हवा  ऐसी चली है ,
                      पड़ोसी भी आ गले  मिलने लगे है
कालिमा है छटी ,सूर्योदय हुआ है,
                       फूल सारे कमल के खिलने लगे है
देख कर  आगाज़ ये लगने लगा है ,
                       होने वाला अच्छा  है अंजाम भी अब
अच्छे दिन आयेंगे ,निश्चित ही सभी के,   
                        देश मेरा  करेगा  उत्थान भी अब

मदन मोहन बाहेती'घोटू'