Thursday, June 5, 2014

चुनाव -२०१४ के बाद

              चुनाव -२०१४ के बाद
                    तीन चित्र
                         १
                 स्थान परिवर्तन 
   कोई कहता था इस करवट,कोई कहता था उस करवट
    सभी के मन  में शंका  थी,  ऊँट  बैठेगा  किस  करवट
   मगर  करवट बदल कर ऊँट है कुछ इस तरह बैठा
   खत्म ही हो गया  डर  खिचड़ी ,सरकार बनने  का 
   नहीं पी एम 'मौनी' और ना सरकार कठपुतली
   बने पी एम 'मोदी ',इस तरह सरकार है बदली
   नयी संसद की  अबके इस तरह बदली कहानी है
  जहाँ पर बैठती थी सोनिया जी, अब अडवाणी है
                              २
                      स्वप्न भंग 
 मुलायम सोचते थे बनेगी सरकार जो खिचड़ी
मिलेगी खाने को उनको,मलाई,मावा और रबड़ी
अगर जो उचट करके लग गयी और साथ दी  किस्मत
हमारे सांसदों से ही  मिलेगा,  किसी को  बहुमत
हाथ लग जाय मुर्गी ,रोज  दे जो , सोने का अंडा
किले पे दिल्ली के फहराएं अबकी बार हम झंडा
मगर टूटी कमर ऐसे गिरे हम ,औंधे मुंह के बल
सिमट कर रह गए परिवार के ही चार हम केवल
                             ३
                        गवर्नर  
पुराना राजवंशी हूँ,बहुत मुझमे था दम और ख़म
बड़ा कर्मठ खिलाड़ी हूँ ,रहा सत्ता में ,मैं  हरदम
टिकिट मुझ को मिला ना जब ,मुझे गुस्सा बड़ा आया
लड़ा चुनाव खुद के बल ,भले ही फिर मैं पछताया
ये है विनती ,पुरानी दोस्ती का,कुछ सिला देना 
किसी भी राज्य का मुझको ,गवर्नर तुम बना देना
 
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, June 3, 2014

प्राणायाम--एक शंका

प्राणायाम--एक शंका

ऐसा कहा जाता है
आदमी गिनती की सांस लेकर आता है
और जब वो गिनती पूरी हो जाती है
मौत आती है
जीवन जीने में हर रोज
देतें है महत्वपूर्ण सहयोग
भोग और योग
भोग की प्रक्रिया में ,साँसे गतिमान होती है
और आदमी जितना ज्यादा भोग में लिप्त होता है ,
उतनी साँसों की गिनती कम होती जाती है
और उम्र घट जाती   है 
इसीलिए ,ऐसा  कहा जाता है
 ब्रह्मचर्य , उम्र को बढाता  है
और योग की एक विधा ,
जिसे  हम प्राणायाम कहते है
जिसमे अलग अलग विधि से ,
जल्दी जल्दी सांस लेते है
ये भी कहा जाता है  कि ,
प्राणायाम करने  से , उम्र बढ़ जाती है
यह बात हमारी समझ में कम आती है
जब जिंदगी की साँसे ,गिनी चुनी होती है ,
तो क्यों हम प्राणायाम कर,
जल्दी जल्दी सांस लेकर ,
व्यर्थ ही अपनी साँसों की गिनती ,
 यूं ही कम कर दिया  करते है
और अपनी उम्र घटा दिया करते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

पीड़ा-टूटे आईने की

              पीड़ा-टूटे आईने की

मुझे अब याद आते है ,वो दिन कितने सुहाने थे,
           मेरे ही सामने आकर ,संवरती थी, हसीनाएं
बड़ी नटखट निराली शोखियों से,कई कोणों से,
           गठीले जिस्म को अपने,निरख़ती  थी हसीनाएं
दिखाती थी कई नखरे,अदा से मुस्कराती थी ,
          कभी खुद पे फ़िदा ,खुद को चूमा करती थी,हसीनाएं        
कभी नयनों के खंजर पे,धार करती थी कजरे से,
           नज़र  तिरछी से  दिल पर  वार ,करती थी हसीनाएं
 लगा के लाली होठों पर ,सुलगती  आग भरती थी,
           जलाती सब के दिल को ,खुद भी जलती थी ,हसीनाएं
बसा करता था उनका अक्स ,मेरे जिस्म के अंदर ,
                  नहीं  मुझसे कभी भी  शर्म ,करती थी ,हसीनाएं     
मगर देखा उन्हें बेशर्मी से ,अठखेलियां करते ,
                  गैर के संग ,तो दिल टुकड़े टुकड़े  हो गया मेरा
 आज भी मेरे हर टुकड़े में जो वो झाँक कर देखें ,
                  बसा है अक्स उनका ही और वो,सुन्दर,हसीं चेहरा

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

मैया,बहुत बुरे दिन आये

      घोटू के पद

मैया,बहुत बुरे दिन आये
ऐसे काटे पर जनता ने ,अब हम उड़ ना पायें
चौंवालीस पर सिमट गए हम,इतने नीचे आये
अपनी ही करनी का फल है ,क्या होगा पछताये 
कभी बोलती थी तूती  अब 'फुस'भी नहीं सुनाये
जो चमचे मुंह खोल न पाते ,अब खुल कर चिल्लाये
अपनी ही पार्टी वाले अब ,'जोकर'मुझे  बताये
बेटे फेर समय का है ये तू क्यों दिल पर लाये 
'जोकर'मतलब 'जो कर सकता'मम्मी जी'समझायें
फिर से अच्छे दिन आएंगे,जब तू ब्याह रचाये 

घोटू
 

Saturday, May 31, 2014

रस के तीन लोभी

   रस के तीन लोभी
            भ्रमर
गुंजन करता ,प्रेमगीत मैं  गाया करता 
खिलते पुष्पों ,आसपास ,मंडराया करता
गोपी है हर पुष्प,कृष्ण हूँ श्याम वर्ण मैं
सबके संग ,हिलमिल कर रास रचाया करता
मैं हूँ रस का लोभी,महक मुझे है प्यारी ,
मधुर मधु पीता  हूँ,मधुप कहाया  करता
               
                   तितली 
फूलों जैसी नाजुक,सुन्दर ,रंग भरी हूँ
बगिया में मंडराया करती,मैं पगली हूँ
रंगबिरंगी ,प्यारी,खुशबू मुझे सुहाती
ऐसा लगता ,मैं भी फूलों की  पंखुड़ी  हूँ
वो भी कोमल ,मैं भी कोमल ,एक वर्ण हम,
मैं पुष्पों की मित्र ,सखी हूँ,मैं तितली हूँ
              
             मधुमख्खी
भँवरे ,तितली सुना रहे थे ,अपनी अपनी
प्रीत पुष्प और कलियों से किसको है कितनी
पर मधुमख्खी ,बैठ पुष्प पर,मधु रस पीती ,
 मधुकोषों में भरती ,भर सकती वो जितनी
मुरझाएंगे पुष्प ,उड़ेंगे तितली ,भँवरे ,
संचित पुष्पों की यादें है मधु में कितनी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

देखो ये कैसा जीवन है

     देखो ये कैसा जीवन है

गरम तवे पर छींटा जल का
जैसे  उछला उछला  करता
फिर अस्तित्वहीन हो जाता,
बस  मेहमान चंद  ही पल का 
जाने कहाँ किधर खो जाता ,
सबका ही वैसा जीवन है
देखो ये कैसा जीवन है
मोटी सिल्ली ठोस बरफ की
लोहे के रन्दे  से घिसती
चूर चूर हो जाती लेकिन,
फिर बंध सकती है गोले सी
खट्टा  मीठा शरबत डालो,
चुस्की ले, खुश होता मन है
देखो ये कैसा जीवन  है
होती भोर निकलता सूरज
पंछी संग मिल करते कलरव
होती व्याप्त शांति डालों  पर,
नीड छोड़ पंछी उड़ते  जब
नीड देह का ,पिंजरा जैसा,
और कलरव ,दिल की धड़कन है
देखो ये कैसा जीवन है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू' 

हमारी दास्ताँ

            हमारी दास्ताँ

सभी ने जब सुनायी दास्ताने अपनी अपनी तो ,
      लगा ये  दास्ताँ सबकी ,मुझी  से मिलती जुलती है
यूं ही बैठा रहा मै कोसता तक़दीर को अपनी ,
          खुदा  को बददुआ देता रहा ,ये  मेरी गलती है 
मुकद्दर लिखने वाले ने ,खुशी गम लिख्खे है सारे ,
           किसी को थोडे कम है तो किसी को थोडे ज्यादा है 
किसी को बचपने में दुःख,कोई हँसता जवानी में,
            और मुश्किल से कोई काटता ,अपना बुढ़ापा  है
रहे हर हाल में जो खुश ,जूझ सकता हो मुसीबत से ,
            नाव तूफ़ान में भी उसकी हरदम पार लगती है
सभी ने जब सुनायी दास्ताने अपनी अपनी तो,
      लगा ये दास्ताँ सबकी ,मुझी से मिलती जुलती है            
 राह में जिंदगी की कितने ही पत्थर पड़े मिलते,
      करोगे साफ़ जब  रोड़े ,तभी बढ़ पाओगे   आगे
उठाओगे जो पत्थर ,कोई हीरा मिल भी सकता है,
      बिना कुछ भी किये क्या भाग्य कोई का कभी जागे  
जो पत्थर राह की अड़चन है उनमे है बड़ी ताक़त ,
      जब टकराते है आपस में ,तो चिंगारी  निकलती  है
सभी ने जब सुनायी दास्ताने अपनी अपनी तो,
       लगा ये दास्ताँ सबकी,मुझी से मिलती जुलती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'