Tuesday, September 9, 2014

कश्मीर की त्रासदी

           कश्मीर की त्रासदी

इस धरती के स्वर्ग के ,यूं बदले हालात
गए देव ,अब कर रहे ,हैं राक्षस   उत्पात
है राक्षस उत्पात, हुआ सब   पानी पानी
फैला रहे  गिलानी  जैसे   लोग  ग्लानि
हुर्रियत होगयी  फुर्र ,देख कर आई मुसीबत
बेबस  जब देवेन्द्र ,    नरेन्दर  बांटे  राहत

घोटू

Sunday, September 7, 2014

इंजीनियरिंग का घरेलू उपयोग

          इंजीनियरिंग का घरेलू उपयोग

मैंने जो इन्जीनीरिंग की ,की पढाई चार साल,
सोच ये कि अच्छी बीबी, नौकरी मिल जाएगी
क्या पता था गृहस्थी की,समस्याएं मिटाने,
काम में हर रोज मेरी इंजीनियरिग  आएगी
होती जब नाराज़ बीबी ,उड़ता उनका फ्यूज है ,
मैं मनाता,प्यार करता ,हाथ भी हूँ जोड़ता
दौड़ने करंट फिर से लगे दिलके तार में ,
इलेक्ट्रिक इंजीनियर  मैं ,फ्यूज उनका जोड़ता
मंहगी मंहगी गिफ्ट देता ,कितना ही चूना लगे ,
बांधता पुल तारीफों के ,बन सिविल इंजीनियर
महल सपनो के बनाता ,ले के करनी प्यार की,
बनाता हूँ सड़क ,पंहुचूं उनके दिल तक उम्र भर
गृहस्थी का इन्टीरियर ,सजता है और संवरता ,
क्योंकि मुझको आर्किटेक्चर का भी थोड़ा ज्ञान है
बीबी,बच्चे ,सास ,ननदें ,सबका सरकिट जोड़ता ,
इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग का ज्ञान आता  काम है
केमिकल इंजीनियरिग की बदौलत ही आजतक ,
मेरी और बीबीजी की ,अब तक केमेस्ट्री ठीक है
साल्ट हम दोनों के मिलते ,रिएक्शन होता नहीं ,
ये मेरी इंजीनियरिग ने ही दिलाई  सीख   है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Saturday, September 6, 2014

          बरसात में
बरसती बरसात में ,गर देख तुमको तर हुआ ,
हुस्न बिखरा सामने हो ,और रीझें  हम नहीं
देख कर भीगे वसन से झांकता सुन्दर बदन ,
संग तुम्हारे ,प्यार रंग में,अगर भीजे हम नहीं
हुस्न की ,इस कदर बेकदरी ,और वो भी हम करें,
बहता दरिया सामने हो,ना लगाएं डुबकियां,
'घोटू'लानत है हमारे ,आशिकी मिज़ाज़ पर ,
समझ लेना ,चचा ग़ालिब के भतीजे हम नहीं
घोटू
              उम्र के त्योंहार में

क्यों परेशां हो रहे हो  ,तुम यूं  ही  बेकार में
आएगा जब समापन इस उम्र के त्योंहार में
यज्ञ की आहुतियों से ,स्वाह तुम हो जाओगे,
राख यमुना में बहेगी,हड्डियां  हरद्वार  में
तुम उठे,दो चार दिन में 'उठाला 'हो जाएगा ,
तुम्हारी तस्वीर भी,छप सकती है अखबार में
सांस राहत की मिलेगी ,तुम्हारी संतान को ,
तुम्हारी दौलत बंटेगी ,जब सभी परिवार में
अब तो निपटा देते बरसी ,लोग बस एक माह में,
श्राद्ध में  याद आ सकोगे,साल में, एक बार  में
जब तलक संतान है ,बन कर के उनकी वल्दियत,
उनकी तुम पहचान बन कर,रहोगे   संसार   में
सोच कर यह , घर का इंटीरियर ना  जाए  बिगड़ ,
तुम्हारी  तस्वीर भी ना टंगेगी ,दीवार  में
जब तलक है दम में दम और बसे तन में प्राण है,
तब तलक ही तुम्हारा ,अस्तित्व है संसार में

 मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Thursday, September 4, 2014

           हम और तुम

तुम हो अंतर्मुखी,मैं हूँ बाहृय मुखी
तुम हो मुझसे दुखी,मैं हूँ तुमसे दुखी
पहले शादी के पत्री मिलाई गयी ,
      गुण है छत्तीस मिले ,पंडित ने पढ़ा
गुण हमारे तुम्हारे न मिलते है कुछ,
      हममे तुममें है छत्तीस का आंकड़ा
मैं हूँ सौ वाट का बल्ब जलता हुआ,
      तुम स्लिम ट्यूब लाइट ,वो भी फूंकी
        तुम हो अंतर्मुखी ,मैं हूँ बाहृय मुखी 
तुम चुपचाप अपने में सिमटी रहो,
         मैं परिंदे सा नीले गगन में  उडूं
है जुदा सोच अपना ,जुदा  ख्याल है ,
        तुम तो पीछे चलो और मैं आगे  बढू
मैं सबसे मिलूं,हंसी ठठ्टा करूं ,
        और नज़रें तुम्हारी ,झुकी की झुकी
        तुम हो अंतर्मुखी ,मैं हूँ बाहृय  मुखी
मुझ को लगती है मौज और मस्ती भली,
       और तुम सीरियस ,खुद में खोई रहो
है रस्ते हमारे अलग ही अलग ,
          मैं तो पश्चिम बहूं और तुम पूरब बहो
मैं तो चाहता हूँ चलना बुलेट ट्रेन सा ,
         तुम हो अड़ियल सी  भैंसा गाडी ,रुकी
          तुम हो अंतर्मुखी ,मैं हूँ बाहृय मुखी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू' 
         जोश- बुढ़ापे में

उठो,जागो,पड़े रहने से न कुछ हो पायेगा ,
                     अगर कुछ  करना है तुमको ,खड़ा होना  चाहिए
यूं ही ढीले पड़े रह कर ,काम हो सकता नहीं,
                      जोश हो और हौसला भी,बड़ा होना  होना  चाहिए
इस बुढ़ापे  में भला ये सब कहाँ हो पायेगा ,
                       ये ग़लतफ़हमी तुम्हारी ,सोचना ये छोड़ दो,
पुरानी माचिस तीली भी लगा देती आग है ,
                        मसाला माचिस पर लेकिन ,चढ़ा होना चाहिए

घोटू

Tuesday, September 2, 2014

       बारिश में भीजेंगे

आ चल बारिश में भीजेंगे
बिना बाल्टी और रस्सी के ,सूरज पानी खींचा करता
और बादलों की टंकी में ,अपनी जब वह नभ में भरता
जब जब धरती प्यासी होती,फव्वारों सा बरसाता है
उस रिमझिम में जब नहाते है,हमको बड़ा मज़ा आता है
ना तो कोई सीमित धारा ,और ना  कोई चार दिवारी
खुल्ला विस्तृत बाथ रूम तब,बन जाती है दुनिया सारी
आसमान से आती बूँदें तन को चुभ चुभ सी जाती है
पूरे तन की मालिश करती हुई  हमें वो सहलाती  है
नीचे भू पर बहता पानी और ऊपर से आती   वर्षा 
उछल कूद कर,नाच भीगना  ,सचमुच मन देता है हर्षा
पानी की बूँदें शीतल  पर,तन मन में है आग लगाती
तनऔरवसन एक दिखते जब तन में सिहरन सी छाजाती
मन में प्रीत उमड़ आएगी ,एक दूसरे  पर रीझेंगे
आ चल बारिश में भीजेंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'