Wednesday, October 8, 2014

सुहागरात

           सुहागरात

आपने था किया,हमसे वादा डियर ,
         दिल में अपने रखोगे,सजा उम्र भर
बड़े अरमान से,तुमको मिलने को हम ,
           बैठे थे सेज पर ,हम बड़े सज ,संवर
आप आये भरे जोश,मदहोश से,
            हो रहे थे दीवाने ,बड़े बेसबर
मेरे कपडे सभी ,कर दिए बेकदर ,
            एक फेंका इधर,एक फेंका उधर
मेरा सजना,संवरना बस यूं ही गया,
          तुमने देखा भी ना,ये भी क्या बात है
दो घड़ी बैठ कर,प्यार से बोलते ,
           करते बातें ,ये पहली मुलाक़ात है 
हंस वो बोले यही,तुम हो इतनी हंसीं ,
            आज काबू में मेंरे , न जज्बात है
तुमको दिल में सजाने ,उम्र है पडी ,
           जानेमन,आज अपनी सुहागरात है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

खेल जिंदगी का

         खेल जिंदगी का

ये दुनिया है मैदान एक खेल का ,
            खेलते खेल अपना ,खिलाड़ी कई
कोई फुटबाल,टेनिस ,क्रिकेट खेलता ,
             रेस में कोई पीछे,अगाडी   कई
कोई के मन लगन कि करे गोल वो,
             दौड़ता रहता पीछे है वो बाल के
जीतना चाहता है कोई गेम को,
              गेंद दूजे के पाले में बस डाल के
कोई बॉलिंग करे, कोई बेटिंग करे ,
              कोई चौका तो छक्का लगाए कोई
कोई हो 'हिट विकेट ''एल बी डब्ल्यू 'कोई ,
              तो कभी 'कैच आउट'हो जाए कोई
हाथ में ,पैर में ,गार्ड कितने ही हो,
               कोई बचता नहीं ,गेंद की मार से 
अंपायर खुदा की जब ऊँगली उठे ,
             आदमी होता आउट है संसार से    

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कभी कृष्ण चन्दर ,कभी तुम नरेन्दर

           कभी कृष्ण चन्दर ,कभी तुम नरेन्दर

कभी फूंकते शंख ,हो तुम समर में,
          कभी हांकते रथ हो तुम सारथी बन
कभी ज्ञान गीता का अर्जुन को देते ,
           चलाते सुदर्शन ,बड़े महारथी बन
जहाँ जाते रंग जाते ,वैसे ही रंग में ,
            बजाते हो ढोलक,कभी बांसुरी तुम
कभी काटते सर ,शिशुपाल का तुम,
           कभी शांत कपिला ,कभी केहरी तुम
कभी द्वारिका में ,कभी इंद्रप्रस्थ में ,
          जहाँ भी हो जाते ,तुम छा जाते सब पर
हरा कौरवों को,जिताते हो  पांडव ,
           बड़े राजनीति  के   पंडित  धुरन्दर   
कभी कंसहन्ता ,तो रणछोड़ भी तुम,
            तुम्हे आती है सारी ,सोलह   कलाएं
कभी कृष्ण चन्दर ,कभी तुम नरेंदर ,
             बड़ी आस तुमसे है सब ही लगाए

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, October 2, 2014

सचमुच तुम कितने पागल हो ?

       सचमुच तुम कितने पागल हो ?

बेटा हो या बेटी ,उनमे ,काहे को रखते  अंतर हो 
                       सचमुच तुम कितने  पागल  हो
यही सोच कर बेटा होगा ,वंश बढ़ाएगा तुम्हारा
और बुढ़ापे में तुम्हारे ,देगा तुमको ,बड़ा सहारा
अंधे मातपिता को कांवड़ में ले जाए तीर्थ कराने
ब्रह्माजी ने बंद कर दिए ,है अब ऐसे पुत्र  बनाने
पैदा राम नहीं होते अब ,जो कि निभाने वचन पिता के
राज त्याग,चौदह वर्षों तक,खाक   जंगलों की जो फांके
इस कलयुग में तो सबने ही ,भुला दिए संस्कार पुराने
उनसे मत उम्मीद करो कुछ,हुई 'प्रेक्टिकल 'है संताने
तुम जितना भी,जो कुछ उन हित ,करते ये कर्तव्य तुम्हारा
प्रतिकार में वृद्धाश्रम ही ,देगा शायद ,तुम्हे सहारा
संस्कृति और संस्कारों में ,बहुत बढ़ गया पॉल्यूशन है
केवल अपने ही बारे में ,सोचा करता अब हर जन है
बेटी भले परायी होती,पर उसमे होता अपनापन
ख्याल बुढ़ापे में रखती है ,प्यार लुटाती सारा जीवन
फिर भी तुम बेटी के बदले ,बेटा हो,  देते यह  बल हो
इस पॉल्यूशन के युग मे भी,शुद्ध ढूढ़ते  गंगाजल हो
                               सचमुच तुम कितने  पागल हो
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

आँखें

           आँखें

आँखें ,सबसे बड़ा दिया उपहार प्रभु का,
       चमका करती ,सूरज चंदा सी ,चेहरे पर
भेद बताती ,सुन्दर और असुंदर का ये,
        ज्योतिपुंज सी राह दिखाती है जीवन भर
दो आँखे ,मानव तन की शोभा होती है ,
         हमको जो ये सारी दुनिया दिखलाती है
पर इनकी तासीर बड़ी उल्टी होती है,
        खोई खोई जग कहता , जब मिल जाती है
हो जाता है प्यार,लड़ा करती जब आँखें,
         जब ये झुकती ,मतलब हामी भर देती है
थोड़ी तिरछी हो जाती,बिजलियाँ गिराती ,
         और दुखी होती , आंसूं  ढलका देती है
काला मुख होने पर है बदनामी होती,
        इन पर कालिख लगती ,ये होती कजरारी
कोई मृगनयनी है कोई मीनाक्षी है,
       चंचल,चपल और सुन्दर ये लगती  प्यारी
होती जिसकी एक आँख समदर्शी होता ,
       लोगबाग उसको काणा भी कह देते है
अगर किसी के साथ छेड़खानी करनी है ,
      एक आँख बंद करते ,आँख मार देते है
कोई बारीक काम सुई में धागा पोना ,
       या कि लक्ष्य भेदन करने को तीर चलाना
इनमे एक आँख बंद करके ही देखा जाता ,
      हो पाता  संभव तब ही  ये सब  हो पाना
दो आँखें तो सब की ही मन भावन होती,
       खुले तीसरी आँख ,कोप बरसाती भारी
शिवशंकर त्रिनेत्र ,खोलते नयन तीसरा ,
       होते है जब कुपित,कहाते प्रलयंकारी
और ये ही आँखें जब होती चार किसी से ,
        इसको कहते प्यार हुआ,जब टकराती है
चार आँखें हो जाने का चक्कर है प्यारा ,
          पर इससे ,आँखों की निंदिया उड़ जाती है
ये होती है बंद मगर देखा करती है ,
             सोयी आँखों से सपने देखा करते हम      
तन का यह अंग ,सबसे ज्यादा मूल्यवान है,
              पलकें है तैनात,सुरक्षा करती   हरदम 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ना इधर के रहे -ना उधर के रहे

          ना इधर के रहे -ना उधर के रहे

ना तो उस दौर के और न इस दौर के ,
             बन गए दरमियानी कोई चीज हम
ना फलक पर चढ़े,ना जमीं पर रहे ,
            रह गए बस लटकते ही अधबीच हम
ना तो भूखे ही है,ना भरा पेट है ,
            बीच खाने के थाली  को क्यों छोड़ दें,
ना इधर के रहे ,ना उधर के रहे ,
           उम्र की ऐसी आ पहुंचे ,दहलीज हम 
जिस्म कहता है अब हम जवां ना रहे,
            कोई बूढा कहे ,दिल ये ना मानता ,
जब जवां लड़कियां हमको अंकल कहे ,
            दिल में होती चुभन,जाते है खीझ हम
ना तो काले ही है ,ना सफ़ेद ही हुए ,
            बाल सर पर हमारे बने खिचड़ी ,
उम्र का फर्क ये , हमको मिलने न दे ,
           रह गए एक दूजे पे ,बस रीझ हम
ना तो दिन ही ढला,ना हुई रात है ,
          शाम की है ये बेला ,बड़ी खुशनुमा ,
है बड़ा ही रूमानी ,सुहाना समां ,
          प्रेम के रस में जाते है अब भीज हम
ना तो नौसिखिया ही है ,ना रिटायर हुए,
          है तजुर्बा भरा ,तन  मे ताक़त भी है,
कोई कितना भी आजमा ,हमें देख ले,
          पायेगा ये बड़े काम की चीज  हम
दिल में जज्बा जवानी का कायम अभी,
           बात दीगर है अब जल्दी थक जाते हम ,
है बुलंदी पे अब भी मगर हौसला ,
            अब करें क्या ,बताओ ना तुम,'प्लीज 'हम

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

आँख मेरी लड़ गयी है

           आँख मेरी लड़ गयी है 

आँख में तुम इस तरह से बस गयी हो,
     सपनो को भी जगह कम पड़ने लगी है
इसलिए तो आजकल गाहे ब गाहे,
         नींद मेरी अचानक उड़ने  लगी  है 
इश्क़ में हालात ऐसे हो गए है ,
      जिधर भी मै देखता हूँ तुम्ही तुम हो,
खुदा जाने होगी तुम कितनी नशीली ,
        देख कर जब खुमारी  चढ़ने लगी है
जबसे तुमसे आँख मेरी लड़ गयी है,
       नज़र तिरछी इस तरह से गढ गयी है,
दिल में मेरे कुछ न कुछ होने लगा है,
         मिलन की संभावना बढ़ने लगी  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'