Wednesday, October 15, 2014

अपने जब होते बेगाने

               अपने जब होते बेगाने

पहले तुम जितने अपने थे ,अबतुम उतने ही बेगाने हो
और जान कर भी ये सब कुछ,बनते बिलकुल अनजाने हो
बन कर नन्हे फूल खिले थे,महके थे तुम जब आँगन में
तुमको लेकर,जाने क्या क्या ,सपने देखे थे इस मन ने
पाल,पोसा और संवारा ,हरदम रख कर ख्याल तुम्हारा
 सोचा था जब जरुरत होगी ,तब तुम दोगे  ,हमें सहारा
पर बचपन में ही तो केवल,बात हमारी तुम माने हो
पहले तुम जितने अपने  थे,अब उतने ही बेगाने हो
साथ समय के,बड़े चाव से,घर तुम्हारा,गया बसाया
करी तुम्हारी शादी उस संग,मीत  तुम्हारे मन जो भाया
लेकिन दिन दिन ,दूर हुए तुम,होनी ने वो  चक्र चलाया
एक रिश्ते में ,ऐसे उलझे ,बाकी रिश्तों को बिसराया
प्यार सदा हम बरसाते है,तुम रहते ,भृकुटी  ताने हो
पहले तुम जितने अपने थे,अब उतने ही बेगाने हो
कभी नहीं सोचा था हमने,कि तुम इतने बदल जाओगे
अगर सफलता पा जाओगे ,तो तुम  इतना इतराओगे
मत भूलो,जो तुम हो  उसमे,बहुत हमारा योगदान है
मात  पिता की आशीषों से ,ही बच्चे  बनते महान है
नहीं समझ में हमको आता ,जाने क्या मन में ठाने हो
पहले तुम जितने अपने थे,अब उतने ही बेगाने हो
तुम्हारी मति  हुई भ्रष्ट है,हम खुश रहते,तुम्हे कष्ट है
या तुम हुए गर्व से अंधे ,या विवेक हो गया नष्ट है
लेकिन तुम दिल के टुकड़े हो ,बदल गए  ,दुर्भाग्य हमारा
सदा सुखी,खुश रहो,फलो और फूलो,आशीर्वाद हमारा
समय तुम्हे सद् बुद्धि  देगा ,नियति को कब पहचाने हो
पहले तुम जितने अपने थे,अब उतने ही बेगाने हो

मदन मोहन  बाहेती 'घोटू'

चाँद- सूरज

             चाँद- सूरज

आसमां में चमकते है ,सूर्य भी और चाँद भी ,
     रोशनी दोनों में है,फिर भी जुदा कुछ बात है
एक में ऊष्मा भरी है ,एक है शीतल बहुत ,
     एक जग को जगाता ,एक जगाता जज्बात है
जगत का यह चक्र इनकी ही बदौलत चल रहा ,
जल बरसता ,अन्न पकते और पलती जिंदगी ,
एक तन को तपाता है ,एक शीत का भण्डार है
     एक लाता सुहाने दिन,एक मिलन की रात है
सूर्य में भण्डार ऊर्जा का विपुल है इसलिए,
चाँद उससे मांग लेता ,उधारी में रोशनी,
चाँद भी है अजब दानी,उधारी का माल सब ,
बाँट ,करता रोशनी की रात भर बरसात है
दोनों की आशिक़ मिज़ाजी ,हर तरफ मशहूर है
खिड़कियों से हमेशा ये सबके घर में झांकते ,
एक रहता किरण के संग ,एक के संग चांदनी ,
एक आता निशा के संग ,एक उषा साथ  है
 
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

कैसे कह दूँ ?

        कैसे कह दूँ ?

माना दोस्त नहीं तुम मेरे ,पर दुश्मन भी कैसे कह दूँ
दो मीठी बातें करने को,मै अपनापन  कैसे  कह दूँ
तुम हमको अच्छे लगते हो,हम भी तुमको अच्छे लगते
जब भी नज़रें टकराती है,मन मे है झांझर से बजते 
लेकिन ये बस आकर्षण है ,ये तो कोई प्रेम नहीं है ,
सबके ही मन को भाते है ,जब बगिया में फूल महकते
हर एक गली और चौबारे को निज आँगन कैसे कह दूँ
माना दोस्त नहीं तुम मेरे ,पर दुश्मन भी कैसे कह दूँ
मेरे पीछे पड़े हुए तुम,क्यों हो  पागल दीवाने से
यूं सम्बन्ध नहीं बनते है ,केवल मिलने ,मुस्काने से
लेख लिख रखा है नियती ने ,कौन ,कहाँ,कब ,किसका होगा,
हो पाता  है पूर्ण समर्पण ,उस बंधन में  बंध  जाने   से
एक किसी भी अनजाने को,अपना प्रियतम कैसे कह दूँ
माना दोस्त नहीं तुम मेरे,पर दुश्मन भी कैसे कह दूँ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

शाम आ रही है

            शाम आ रही है

दिन ढल रहा है और शाम आ रही है,
तभी साये अब लम्बे होने लगे  है
बदलती ही करवट ,जहाँ यादें रहती ,
सलवट भरे वो बिछौने   लगे है
बुझने को होता दिया जब है कोई,
सभी कहते है वो भभकता बहुत है,
हमें लगता है शायद ये ही वजह है ,
कि हम और रोमांटिक होने लगे है
चेहरे पे झुर्री है,आँखों में  जाले ,
नहीं दम बचा,हसरतें पर बड़ी है
इसी आस में कुछ निकल आये मख्खन,
मथी  छाछ,फिर से बिलोने लगे है 
बड़े चाव से वृक्ष रोपा था हमने ,
बुढ़ापे में खाने को फल देगा मीठे ,
फल लग रहे हैं,मगर खा न पाते ,
उमर के सितम ऐसे होने लगे है
बहुत व्यस्त अपनी गृहस्थी में बच्चे,
सुखी है सभी अपनी मस्ती में बच्चे ,
समझते हमें फालतू बोझ लेकिन,
जमाने के डर से ,वो ढोने लगे है
सूरज किरण संग कभी खेलते थे ,
अभी संध्या संग है और रजनी बुलाती ,
कहते है नींद ,मौत की  है सहेली ,
बड़ी देर उसके संग ,सोने लगे है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, October 12, 2014

प्यार की परिक्षा -मेंहदी

            प्यार की परिक्षा -मेंहदी
अबकी बार
करवाचौथ पर पत्नी ने लगाईं गुहार
सुनोजी!कम होता जा रहा है आपका प्यार
हमने कहा, क्या बात करती हो मेडम
हमारा प्यार बढ़ रहा है ,नहीं होरहा है कम
हर साल टरका  देते थे ,साडी दिला कर
 अबके से हीरे की अंगूठी दी है लाकर
पत्नी बोली ये तो ठीक है ,पर ऐसा है कहा जाता
पति जितना प्यार करता है ,
उतना गहरा  मेंहदी का रंग है आता
पर अबकी बार ,मेंहदी का रंग  कम  आया है
कहीं आपने कोई दूसरा चक्कर तो नहीं चलाया है
हम ने सर पीट लिया और सोचा ,
औरतें होती है कितनी होशियार
साल में तीन चार बार ,जब आते है त्योंहार
हाथों में लगवाती मेंहदी है
और इस तरह पति की परीक्षा लेती है
परचा कोई लिखता है,देता है कोई एक्ज़ाम
और पास फ़ैल का , पति पर लगता है इल्जाम
वैसे भी   जो  उम्र भर पत्नी से  डरे
अब मेंहदी ना रचे तो बेचारा पति क्या करे ?

 मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, October 10, 2014

जमना-जमाना

         जमना-जमाना

जो जमता है पानी तो बनता बरफ  है ,
पिघल कर के जाता वो फिर पानी बन है
कोई बात  जंचती ,नहीं गर है दिल को,
'जमा ही नहीं मामला'कहते हम है
जमा करते पैसा हम बैंकों में क्योंकि,
हमें पड़ती जरुरत,वो फिर काम आता
जमाने को रूतबा ये सारा ज़माना ,
है कैसे ही,कितने ही ,चक्कर चलाता
कभी रंग अपना जमाता है कोई,
यारों की जब वो है महफ़िल जमाता
शादीशुदा आदमी इस जहाँ में ,
है होता ससुर सासजी  का जामाता
हरेक इन्सां ,बचपन में होता सरल है,
तरल दूध जैसा ,सरस,शुद्ध,पावन
दही की तरह पर है जमने वो लगता ,
जवानी का उसमे जब लगता है जावन
बड़े काम का और ठहरा हुआ सा,
मथो मठ्ठा बनता,कभी बनता मख्खन
कभी चटपटा चाट बन कर के होता,
कभी स्वाद देता,कढ़ी ,रायता बन
जमा बर्फ फिर से पिघल  बनता पानी,
जमा दूध ,फिर दूध, कभी बन न पाता
जमा,जमगया ,वीर पुरुषों के जैसा ,
कदम अपने वापस कभी ना हटाता 

मदन  मोहन बाहेती'घोटू'

करवा चौथ पर

             करवा चौथ पर

मद भरा मृदु गीत हो तुम,सुहाना संगीत हो तुम
प्रियतमे तुम प्रीत मेरी और जीवन गीत हो तुम
बंधा जब बंधन सुहाना ,लिए मुझ संग सात फेरे
वचन था सुख ,दुःख सभी में  ,रहोगी तुम साथ मेरे
पर समझ में नहीं आता ,जमाने की रीत क्या है
मै सलामत रहूँ ,तुमने ,आज दिन भर व्रत रखा है
खूब मै ,खाऊँ पियूं और दिवस भर निर्जल रहो तुम
कुछ न  खाओ ,इसलिए कि  ,उम्र मेरी रहे अक्षुण
तुम्हारे इस कठिन व्रत से ,कौन सुख मुझको मिलेगा
कमल मुख कुम्हला गया तो ,मुझे क्या अच्छा लगेगा
पारिवारिक रीत ,रस्मे , मगर पड़ती  है  निभानी
रचा मेहंदी ,सज संवर के ,रूप की तुम बनी रानी
बड़ा मनभावन ,सुहाना ,रूप धर ,मुझको रिझाती
शिथिल तन,दीवार व्रत की ,मगर है मुझको सताती
प्रेम की लौ लगी मन में ,समर्पण , चाहत बहुत है
एक व्रत जो ले रखा है ,बस वही पतिव्रत  बहुत है
चन्द्र का कब उदय होगा ,चन्द्रमुखी तुम खड़ी उत्सुक
व्रत नहीं क्यों पूर्ण करती ,आईने में देख निज  मुख
रूप का अनुपम खजाना ,और मन की मीत  हो तुम
प्रियतमे तुम प्रीत मेरी और जीवन गीत  हो  तुम
 
       मदन मोहन बाहेती'घोटू'