Friday, November 14, 2014

जाती बहार के फल

        जाती बहार के फल

खिलता है तो लगता है सुहाना और महकता ,
                मौसम में  हर एक फूल पर चढ़ता शबाब है
अनुभव की बात आपको लेकिन हम बताएं ,
                  गुलकंद बन ,अधिक मज़ा देता  गुलाब है
मौसम में तो मिलते थे हमें रोज ही खाने ,
                  अब मुश्किलों से मिलते है,वो भी कभी कभी,
खाकर के देखो आम तुम जाती बहार के ,
                    पड़ जाते नरम,स्वाद में पर लाजबाब है

घोटू

बढ़तीं उमर की रईसी

          बढ़तीं उमर की रईसी

हम हो गए रईस है इस बढ़ती उमर में,
         सर पर है चांदी और कुछ सोने के दांत है
किडनी में,गॉलब्लेडर में ,स्टोन कीमती,
         शक्कर का पूरा कारखाना ,अपने साथ है
अम्बानी के तो गैस के कुवें समुद्र में ,
         हम तो बनाते गैस खुद ही ,दिन और रात है
है पास में इतना बड़ा अनुभव का खजाना ,
         जिसको कि बांटा करते है हम ,खुल्ले हाथ है    

घोटू

पूजा और प्रसाद

         पूजा और प्रसाद

बाद शादी के पडी बस ये ही आदत
किया करते रोज पत्नी की इबादत
और खाने मिल रहे पकवान तर है
चैन से ये जिंदगी होती बसर  है
नहीं पत्थर की प्रतिमा पूजते हम
हुस्न की जीवित प्रतिमा पूजते हम
पूर्ण श्रध्दा ,आस्था की  भावना से
सर नमाते,प्रेम की हम  कामना से
देवी के श्रृंगार हित नव वसन  लाते
स्वर्ण आभूषणो से उसको सजाते
प्रेम की भर भावना और जोश तन में
रतजगा भी किया करते ,कीर्तन में
आरती में लीन  होते,लगन से हम
भोग का परशाद पाते है तभी हम

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सर्दी जुकाम

           सर्दी  जुकाम

गमन आगमन पवन किया करती जिस पथ पर ,
                   उस पथ से अब बहती  गंगा जमुना  धारा
दबी पवन उद्वेलित होकर बड़े कोप से ,
                  छूट   तोप की तरह  ,गूंजा देती घर सारा
शीत  हो रही व्याप्त  और मौसम सिहरन  का ,
                  चली गयी है ऊष्मा फिर भी तप्त  बदन है
नहीं समझ में आता है क्या मुझे हुआ है ,
                   बैचैनी सी छाई ,तन में भारी पन  है
मुश्किल होती ,श्वासोच्छ्वास  मुझे  करने में ,
                   और चैन से सोना आज हराम होगया
अम्मा बोली,घुमा फिरा कर बातें मत कर ,
                  काढ़ा पी ले,तुझको सिर्फ  जुकाम होगया

घोटू

वक़्त वक़्त की बात

            वक़्त वक़्त की बात

रहता किसी  का  वक़्त  कभी  एक सा नहीं
किस्मत बदलती सबकी जब आता समय सही
रहती  है  दबी  ,आठ माह ,बक्से  के अंदर
मौसम में सर्दियों के जब  आती है निकल कर
तो प्यार सबका कितना फिर पाती रजाइयां
कितने  हसीन  जिस्मो  पर, छाती रजाइयां
हम भी रजाई की तरह ,अरमान   दबाये
बैठे है इन्तजार में  कि  अच्छे  दिन आएं
किस्मत हमारी ,हम पे भी हो  जाये मेहरबाँ
हमको भी अपनी बाहों में भर लेगी  दिलरुबां

घोटू

नाम का क्या काम

            घोटू के छक्के          
           नाम का क्या काम
                       १
'सर 'सर'कह कर जूनियर ,सर पर हमें चढाय
और अफसर ,सर नेम से,केवल  हमें  बुलाय 
केवल  हमें  बुलाय ,कहे 'लल्लाजी '  भौजी
बीबी काम  चलाय हमें कह 'ऐ  जी' ओ  जी'
बच्चे कहते 'पापा 'और  'मुन्ना'  माताजी
और 'साहब जादे 'कहते  है हमें   पिता जी
                        २
लम्बे चौड़े नाम का ,फैशन अब गुमनाम
'शार्ट फॉर्म 'के नाम से ,अब चलता है काम
अब चलता है काम ,हमारे इनिशियल से
 कोई  हमें जानता सिरफ़  फ्लेट  नंबर से
कह 'घोटू' कविराय ,कहे कन्याये 'अंकल'
चेहरा,नाम 'फेस बुक' पर ही दिखता केवल

घोटू

Wednesday, November 12, 2014

स्वच्छता अभियान

           स्वच्छता अभियान

तेरे मन में ,मेरे मन में,सबके मन में मैल ,
                              निकाले उसको  कैसे ?
लालच,स्वार्थ ,घृणा ,हिंसा का कचरा  फैला
                               बुहारे    उसको  कैसे ?
चला स्वच्छ अभियान ,हाथ में झाड़ू लेकर
 हटा  गंदगी, होगे  गाँव,सड़क ,सब सुन्दर
इधर उधर बिखरा कचरा तो बुहर  जाएगा
लीप पोत  कर ,रंग घरों का निखर जाएगा
किन्तु स्वच्छता तन संग, मन की आवश्यक है ,
                                       सँवारे  उसको कैसे?
तेरे मन में,मेरे मन में  ,सबके मन में  मैल ,
                                        निकाले उसको कैसे?
कलुषित हुए विचार,मनो पर मैल  चढ़ रहा
दिन दिन बेईमानी ,भ्रष्टाचार  बढ़  रहा
भुला दिए आदर्श,संस्कृति ,संस्कार  के
नित्य उजागर काण्ड हो रहे व्यभिचार के
चिंदी चिंदी बिखर रही है ,अबलाओं  की लाज,
                                 संभाले उसको कैसे ?
मेरे मन में,तेरे मन में,सबके  मन में मैल  ,
                                  निकाले उसको कैसे?

मदन मोहन बाहेती''घोटू'