Friday, December 26, 2014

मै शून्य हूँ

             मै शून्य हूँ

भले शून्य हूँ मैं ,अकेला न अांकों ,
            करूँ दस गुणित मै ,तुम्हे ,संग तुम्हारे
चलोगे अगर साथ में हाथ लेकर ,
            बदल जाएंगे  जिंदगी के  नज़ारे
 घटाओगे मुझको या मुझ संग जुड़ोगे
            न तो तुम घटोगे ,नहीं तुम बढ़ोगे
मेरे संग गुणा का गुनाह तुम न करना ,
           नहीं तो कहीं के भी तुम ना रहोगे
चलो साथ मेरे ,मेरे हमसफ़र बन  ,
            बढ़ो आगे कंधे से कंधा  मिला कर,
बढ़ें दस गुने होंसले तब हमारे
            हम दुनिया को पूरी ,रखेंगे हिला कर
मुझे प्यार दे दो,ये उपहार दे दो ,
            नहीं बीच में कोई आये हमारे
भले शून्य हूँ मैं ,अकेला न समझो ,
          करू दस गुणित मै ,तुम्हे,संग तुम्हारे
रहो आगे तुम, मैं रहूँ पीछे पीछे ,
          अणु से अनुगामिनी तुम बना दो
बंधे सूत्र से इस तरह से रहे हम,
          तुम चाँद ,मैं चांदनी तुम बनादो
हमेशा ही ऊंचे रहो दंड से तुम,
         उडू एक कोने में,बन मैं पताका
समझ करके मुझको,चन्दन का टीका ,
         मस्तक पर अपने ,लगालो,जरासा
इतराऊँगी मैं जो संग पाउंगी मैं ,
         मेरा मान भी होगा संग संग तुम्हारे
भले शून्य हूँ मैं ,अकेला न आंको ,
          करूं दस गुणित मैं ,तुम्हे,संग तुम्हारे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'     

नए वर्ष का धन्यवादज्ञापन

         नए वर्ष का धन्यवादज्ञापन

पिछले बारह महीने मेरे ,कुछ इसी तरह से गुजर गए
कुछ नए दोस्त का साथ मिला,कुछ मीत पुराने बिछड़ गए
सुख दुःख आते जाते रहते ,मैं क्या बिसरूं ,क्या करू याद 
जिन जिनका भी सहयोग मिला ,सबको देता हूँ धन्यवाद
है धन्यवाद उनको जिनने ,जी भर कर मुझको दिया प्यार
मैं  आभारी  उनका  भी हूँ, पहनाये  जिनने  पुष्पहार
है धन्यवाद उस पत्थर का ,जिसकी ठोकर खा, मै संभला
पथ किया प्रदर्शन ,जीने की,सिखलाई  जिसने मुझे कला 
उन निंदक का भी धन्यवाद ,गलती मेरी बतलाते है
है धन्यवाद के पात्र ,प्रशंसक ,जो उत्साह बढ़ाते  है
अपनी सहचरी संगिनी का ,मैं सच्चे मन से आभारी
जिसने पग पग पर साथ दिया ,खुशियाँ बरसाई है सारी
जो देती आशीर्वाद सदा , मेरा उस माँ को धन्यवाद
मेरे जीवन में जो कुछ है ,ये माता का ही  है प्रसाद
सबके सहयोग ,शुभेच्छा से ,अच्छा बीता जो बरस गया
है यही अपेक्षा ,मिले प्यार,और अच्छा बीते बरस नया

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Wednesday, December 24, 2014

सर्दी

             सर्दी
क्या बताऊँ आपको इस बार सर्दी यूं पडी
याद में उनकी हमारे लगी आंसूं की  झड़ी
ना तो हमने पोंछे आंसूं,गीला ना दामन किया ,
मारे सर्दी अश्क जम कर ,बने मोती की लड़ी

घोटू

बुढ़ापा -शाश्वत सत्य

        बुढ़ापा -शाश्वत सत्य

मेरे मन में चाह हमेशा दिखूं जवां मै
और जवानी ढूँढा करता ,यहाँ वहां  मै
कभी केश करता काले ,खिजाब लगाके
शक्तिवर्धिनी कभी दवा की गोली  खा के
कभी फेशियल करवाता सलून में जाकर
नए नए फैशन से खुद को रखूँ सजा कर
और कभी परफ्यूम लगाता हूँ मै  मादक
करता हूँ जवान दिखने की कोशिश भरसक
जिम जाता हूँ ,फेट हटाने ,रहने को फिट
जिससे मेरी तरफ लड़कियां हो आकर्षित
पर किस्मत की बेरहमी करती है बेकल
जब कन्याएं,महिलायें कहती है 'अंकल'
लाख छिपाओ,उम्र न छिपती ,तथ्य यही है
मै बूढा हो गया ,शाश्वत सत्य  यही  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ये बीबियाँ

                ये बीबियाँ

पति भले ही स्वयं को है सांड के जैसा समझता ,
      पत्नी आगे गऊ जैसी ,आती उसमे सादगी  है
 पति को किस तरह से वो डांट कर के  रखा करती ,
      आइये तुमको बताते ,उसकी थोड़ी  बानगी है
पायलट की पत्नी अपने पति से ये बोलती है,
       देखो ज्यादा मत उड़ो तुम,जमीं तुमको दिखा दूंगी
और पत्नी 'डेंटिस्ट' की ,कहती पति से चुप रहो तुम,
             वर्ना जितने दांत तुम्हारे,सभी मै हिला   दूंगी 
प्रोफ़ेसर की प्रिया अपने पति को यह पढ़ाती है,
            उमर  भर ना भूल पाओगे ,सबक वो सिखाउंगी
और बीबी एक्टर की ,रोब पति पर डालती है ,
            भूलोगे नाटक सभी जब एक्टिंग मै  दिखाउंगी
सी ए की पत्नी पति से कहती है कि माय डीयर,
           मेरे ही हिसाब से ,रहना तुम्हे है जिंदगी  भर  
वरना तुम्हारा सभी हिसाब ऐसा बिगाड़ूगीं ,
           कि सभी 'बेलेंस शीटें 'तुम्हारी हो जाए गड़बड़
पत्नी ने इंजीनियर की ,समझाया अपने पति को,
          टकराना मुझसे नहीं तुम,पेंच ढीले सब करूंगी
'इंटेरियर डिजाइनर 'की प्रियतमा  उससे ये बोली
         मुझसे जो पंगा लिया ,एक्सटीरियर बिगाड़ दूंगी
नृत्य निर्देशक कुशल है  हुआ करती हर एक बीबी,
         जो पति को उँगलियों के इशारों पर है  नचाती 
उड़ा करते है हवा में ,घर के बाहर जो पतिगण ,
         घर में अच्छे अच्छे पति की,भी हवा है खिसक जाती

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
           

ना इधर के रहे ना उधर के रहे

       ना इधर के रहे ना उधर के रहे

उनने डाली नहीं ,घास हमको ज़रा ,
         चाह में जिनकी आहें हम भरते रहे
चाहते थे क़ि कैसे भी पट जाए वो,
          लाख कोशिश पटाने की करते रहे
उम्र यूं ही कटी ,वो मगर ना पटी ,
          घर की बीबी को 'निगलेक्ट 'करते रहे
ना घर के रहे हम,नहीं घाट  के ,
          ना इधर के रहे ,ना उधर के   रहे

घोटू  

Saturday, December 20, 2014

सितम-सर्दियों का

           सितम-सर्दियों का
                पांच चित्र
                       १
हो गए हालात है कुछ इस तरह के धूप के ,
कभी दिखलाती है चेहरा ,कभी दिखलाती नहीं
बहाना ले सरदी का ज्यों  ,कामवाली  बाइयां ,
या तो आती देर से है या कि फिर आती नहीं
                            २
मुंह छिपाते फिर रहे हैं,आजकल सूरज मियां ,
सर्दियों  में देख लो, वो भी बेकाबू  हो  गए
आते भी है देर से और जाते है जल्दी चले ,
लगता है सरकारी दफ्तर के वो बाबू  हो गए
                      ३
एक तरफ आशिक़ है बिस्तर ,नहीं हमको छोड़ता ,
एक तरफ माशूक़ रजाई ,हम पर है छाई  हुई
आपको हम क्या बताएं आप खुद ही समझ लो ,
इस तरह शामत हमारी ,सरदी  में आयी हुई
                            ४
होता था दीदार जी भर ,जिस्म का जिनके सदा,
तरसते है देखने को भी हम सूरत आपकी
ढक  लिया है इस तरह से ,तुमने अपने आपको,
नज़र आती सिर्फ आँखे, नोक केवल नाक की
                           ५
तेल ,घी जमने लगे है ,दही पर जमता नहीं ,
मारे ठिठुरन,हाथ पाँव जम के ठन्डे पड़ गए
पीते पीते चाय का प्याला बरफ  सा हो गया ,
सर्दियों के सितम देखो ,किस कदर है बढ़ गए   

मदन मोहन बाहेती'घोटू'