Saturday, March 28, 2015

पड़ोसन भाभी

         पड़ोसन भाभी

कल पड़ोसन ने शिकायत दागी
भाईसाहब ,मैं तो बहुत छोटी हूँ,
 फिर आप मुझे क्यों कहते  है भाभी
हमने कहा आपकी  बात सही है
आप छोटी तो है ,मगर ,
आपको बेटी कहना भी ठीक नहीं है
क्योंकि बाप बेटी का रिश्ता,
 बड़ा नाजुक होता है
छोटी छोटी अपेक्षाएं पूरी नहीं होती,
तो बड़ा  दुःख होता है
आपको मैं कह नहीं सकता हूँ 'साली'
क्योंकि साली लगती है गाली
और ये शायद आपके पति को भी न भाये ,
क्योंकि साली कहलाती आधी  घरवाली
'बहू' कहने की नहीं है मेरी मर्जी
क्योंकि बहू को हमेशा ,
सास  ससुर  से   रहती है 'एलर्जी '
एक देवर भाभी का ही ऐसा रिश्ता है
जिसमे  भाईचारा  झलकता  है
हंसी मज़ाक की भी होती है आजादी
इसलिए आपको  हम बुलाते है भाभी

घोटू

पैसे तेरे रूप अनेक

         पैसे तेरे रूप अनेक

साधू कहते तुझको 'माया'
मंदिर में कहलाय 'चढ़ावा '
 बीबी मांगे कह कर' खर्चा'
सभी तरफ है तेरी चर्चा
'भीख 'भिखारी कह कर मांगे
ले सरकार 'टैक्स' कहलाके
मांगे कोर्ट कहे 'जुर्माना'
मिले किसी को बन हर्जाना
रेल और बस में कहे 'किराया'
स्कूल मे तू ' फीस 'कहाया
'यूरो','पोंड' तो कहीं 'डॉलर '
 तेरा भूत चढ़ा है सब पर
जैसा देश  है वैसा भेष
पैसे  तेरे  रूप अनेक
गुंडा मांगे कह'रंगदारी'
अफसर की तू 'रिश्वत 'प्यारी
चपरासी का 'चायपान'है
हर मुश्किल का तू निदान है
'पत्र पुष्प' कहलाय कहीं पर
दे  सरकार 'सब्सिडी'कह कर
सौदों में कहलाय 'कमीशन'
प्यारी लगती तेरी खन खन
'टिप'है कहीं,कहीं 'नज़राना'
कोई तुझे कहता 'शुकराना'
ले मजदूर कहे'मजदूरी'
नौकर की तू 'तनख्वाह'पूरी
शादी में कहलाय 'दहेज़'
पैसे  तेरे  रूप  अनेक
नेता अफसर खाते है सब
तू ही 'लक्ष्मी ' तू ही 'दौलत'
कभी'ब्याज' तो कभी 'मुनाफ़ा'
दिन दिन दूना होय इजाफा
पाँव नहीं  पर तुझे चलाते
 पंख नहीं पर तुझे उड़ाते
कोई बहाता पानी जैसा
कितने रूप धरे तू पैसा
तेरा रंग है अजब निराला 
कहीं सफ़ेद ,कहीं तू काला
छुपा बैंक के खातों में तू
कभी पर्स तो हाथों में तू
मन हरषाता तुझको देख
पैसे तेरे  रूप अनेक

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गाँठ

             गाँठ
अगर प्रेम के  धागे  कभी टूट जाते है
भले गाँठ पड़ जाती लेकिन जुड़ जाते है
शादी का बंधन है जनम जनम का बंधन
ये रिश्ता तब बनता जब होता गठबंधन
अगर गाँठ में पैसा तो दुनिया झुकती है
बात गाँठ में बाँधी ,सीख हुआ करती  है
लोग गांठते रहते  मतलब की यारी है
रौब गांठने वाले  बाहुबली  भारी   है
किसी सुई में जब भी धागा जाय पिरोया   
बिना गाँठ के ,फटा वस्त्र ना जाता सिया
कंचुकी हो   या साड़ी ,सबके मन भाते है
बिना गाँठ के ,ये तन पर ना टिक पाते है
बिना गाँठ के नाड़ा ,रस्सी का टुकड़ा है
गाठों के ही बंधन से संसार  जुड़ा  है
खुली गाँठ,कितने ही राज खुला करते है
गाँठ बाँध ,रस्सी पर सीढ़ी से चढ़ते है
बाहुपाश भी तो एक गांठों का बंधन है
गाँठ पड़  गयी तो क्या,जुड़े जुड़े तो हम है
घोटू

मैं औरत हूँ

            मैं औरत हूँ

मैं औरत हूँ
कोमल ह्रदय,कामिनी सुन्दर,स्नेहिल ममता की मूरत हूँ
विधि की सर्वोत्तम रचना हूँ,मैं अनमोल निधि ,अमृत  हूँ
सरस्वती सी ज्ञानवती हूँ,और  लक्ष्मी  की सम्पद   हूँ
मैं सीता सी सहनशील हूँ, और सावित्री का पतिव्रत हूँ
माँ हूँ कभी,कभी बहना हूँ,पत्नी कभी  खूबसूरत   हूँ
परिवार की मर्यादा हूँ,और हर घर की मैं  इज्जत हूँ
जिसकी छाँव  तले सब पलते ,हरा भरा वह अक्षयवट हूँ
मुझको अबला कहने वालों ,मैं तो दुर्गा की ताकत हूँ
मैं बेटी ,पर लोग  भ्रूण में ,हत्या करते ,मैं आहत  हूँ
मैं औरत हूँ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Wednesday, March 18, 2015

मैं पूर्ण हुई

                 मैं पूर्ण हुई

फटे दूध का छेना थी मैं ,डूबा प्यार के रस में,
        तुमने नयी जिंदगी दे दी ,बना मुझे रसगुल्ला
दिन चांदी से ,रात सुनहरी ,जीवन मेरा  बदला ,
         जिस दिन से तुमने पहनाया मुझे स्वर्ण का छल्ला
सिन्दूरी सी सुबह हो गयी ,रात हुई रंगीली  ,
           जब से तुम्हारे हाथों ने , मांग भरी  सिन्दूरी
बड़ा अधूरा सा जीवन था सूना सा छितराया,  
            प्रीत तुम्हारी जब से पायी ,हुई कामना   पूरी
तुमने वरमाला पहना कर बाँध लिया बंधन में ,
         जनम जनम का साथ दे गए ,फेरे सात   अगन के
जबसे मैंने अपना सब कुछ किया समर्पित तुमको ,
           पूर्ण हुई मैं ,तबसे आये ,स्वर्णिम  दिन  जीवन के
              
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुजरा ज़माना

          गुजरा ज़माना
याद आता है हमें वो ज़माना ,
              गुल खिलाते थे बड़े गुलफाम थे 
जवानी की बात ही कुछ और थी ,
              देखती थी लड़कियां दिल थाम के
बुढ़ापे में हाल ऐसा हो गया ,
               रह गए है आदमी  बस नाम के
उम्र ने हमको निकम्मा कर दिया ,
                वरना हम भी आदमी थे काम के
घोटू

सच्चा श्राद्ध

             सच्चा श्राद्ध
वो,अपनी माँ की याद में ,
श्रद्धा से श्राद्ध में ,
अपनी मेहनत की कमाई हुई
दो रोटी ,
किसी ब्राह्मण को खिलाना चाहता था
माँ का आशीर्वाद पाना चाहता था
पर सभी पंडित पहले से बुक थे
तीन चार जगह,न्योता खाने के बाद भी,
दक्षिणा क्या मिलेगी,
जानने में उत्सुक थे 
उसकी खस्ता हालत देख,
सभी ने मना कर दिया
दो सादी रोटी देख कर ,
मुंह बना लिया
तभी  उसे एक बूढ़ा ,अपाहिज ,
भूखा वृद्ध  नज़र आया
उसने बड़े प्रेम से उसे भोजन कराया
भूखे वृद्ध ने तृप्त होकर ,
उठा दिए अपने हाथ
उसने देखा ,आसमान में ,
उसकी माँ तृप्त होकर ,
बरसा रही थी आशीर्वाद

मदन मोहन बाहेती'घोटू'