Wednesday, May 6, 2015

साहसी इंसान

            साहसी इंसान

स्कूल  में पढ़ी  ,एक कविता  ,
'अबु बेन एडम 'नामक व्यक्ति की कहानी थी
बड़ी ही सुहानी थी
वो एक रात देखता है कि एक फरिश्ता ,
एक फेहरिस्त बना रहा था
खुदा जिनसे प्यार करता है,
उनके नाम गिना रहा था
अबु ने उससे पूछा ,
क्या उसमे उसका भी नाम कहीं लिखा है
फरिश्ता बोला ,
अभी तक तो नहीं दिखा है
तब 'अबु'उस फ़रिश्ते से फ़रियाद करता है
मेरा नाम उस फेहरिस्त में जरूर शामिल करना ,
जो खुदा के बन्दों से प्यार करता है
दूसरी रात उसको फिर वो फरिश्ता नज़र आया,
और अपने साथ एक नयी फेहरिस्त लाया
अबु ने देखा,नयी  फेहरिस्त में ,
सबसे ऊपर उसका की नाम था
खुदा उससे करता है प्यार ,
जो उसके बन्दों से करता है प्यार ,
ये पैगाम था
 एक रात मैंने भी सपने में देखा ,
एक फरिश्ता साहसी लोगों की ,
एक फेहरिस्त बना रहा था
और उसमे मेरा नाम ,
सबसे ऊपर आरहा था 
मैंने पूछ ही लिया ,फ़रिश्ते भाई
न तो मैंने लड़ी है आजादी की लड़ाई
न ही साहस का कोई काम किया है,
और न एवरेस्ट पर की है चढ़ाई,
नहीं कोई विशेष करतब दिखलाया 
फिर मेरा नाम इस फेहरिस्त  में ,
सब से ऊपर  कैसे आया ?
फ़रिश्ते ने समझाया
शादी करके ,पत्नी के साथ
जो बन्दा निभा ले पूरे  बरस पचास
और फिर भी उसके चेहरे पर मुस्कान है
खुदा की नज़रों में ,
सबसे साहसी वो ही इंसान है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

साडू भाई

              साडू  भाई

एक ही कुए से,बाल्टी भर भर के ,
     प्यास को जिन्होंने ,अपनी बुझाया है
एक ही चूल्हे से,लेकर के अंगारा,
    सिगड़ियां अपनी को,जिनने  जलाया है
एक ही चक्की का,पिसा हुआ आटा और ,
      एक  हलवाई की ही,  खाते मिठाई    है         
एक ही दूकान पर,ठगे गए दो ग्राहक,
       आपस में   कहलाते, वो साडू भाई    है

घोटू

Tuesday, May 5, 2015

औरतों के मज़े

            औरतों के मज़े

औरतें ,महिला होने का , मज़ा लेती हमेशा है ,
        वो 'लेडीज फस्ट 'कह कर के,सदा 'प्रिफरेंस 'पाती है
आदमी पिसता है दिन भर,कमाई कर के लाता है ,
        मज़े से घर में बैठी ये ,मौज मस्ती  मनाती    है
रिज़र्व सीटें इलेक्शन में,बसों में भी अलग सीटें,
              रेलवे में अलग डिब्बा ,मर्द जिसमे न घुस पाता
मर्द के साथ हर डब्बे में वो कर सकती है ट्रेवल ,
          काम कोई हो ,लेडीज़ को,दिया प्रिफरेंस है  जाता
शान से वस्त्र मर्दों के ,पहन कर  वो है  इतराती ,
           आदमी वस्त्र औरत के,पहन लेकिन नहीं पाता
 हमेशा औरतें ही तो ,कहांती घर की है रानी ,
           उम्र भर आदमी पिसता ,मगर नौकर ही कहलाता
आदमी वर्षों मेहनत कर,पढाई कर ,बने  डाक्टर ,
           औरतें ब्याह डाक्टर को,कहाया करती डाक्टरनी
अगर है वो जो फूहड़ तो ,बड़ा ही अव्यवस्थित घर,
            मगर घर स्वर्ग बन जाता ,सुशीला गर जो हो घरनी
औरतें कितनी भी काली,है 'फेयर सेक्स'कहलाती ,
             सुदर्शन गोरे पुरुषों संग ,नहीं इन्साफ होता है
वो हमको घूर कर देखें,ज़माना कुछ नहीं कहता ,
             नज़र भर देख भी लें हम,तो कहते पाप होता है
खुदा  ने मर्दों को दाढ़ी दी,शेविंग की मुसीबत दी ,
              और औरत के गालों को,बड़ा चिकना बनाया है
किधर से भी पकड़ लो तुम ,हमेशा वार करता है ,
            उनके हथियार बेलन ने ,सितम मर्दों पे  ढाया है
पुरुष को कोई बिरला ही ,देवता कहने वाला है,
             औरते तो हमेशा  ही ,कहाया करती है देवी
विष्णुजी और ब्रह्मा के ,बहुत कम लोग पूजक है,
           लक्ष्मी,सरस्वतीजी की ,मगर दुनिया सभी सेवी
  न  जाने कौन सा हुनर ,दिया है भर विधाता ने ,
           औरतों के इशारों पर, आदमी नाच  करता  है
भले ही शेर बन के डांटता है सबको दफ्तर में ,   
           मगर घर पर ,बना बिल्ली,सदा बीबी से डरता है
पड़ गयी जो भी पल्ले है ,निभानी पड़ती है सबको ,
                  भले सीधी  या टेढ़ी हो,भले गोरी हो या काली
हज़ारों रूप है उसके ,कभी माँ है ,कभी बहना ,
               कभी घरवाली है या फिर ,लुभाती बन के वो साली

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

अमोघ अस्त्र

             अमोघ अस्त्र

शांतिकाल में'किचन अस्त्र'यह ,पेट भरा करता है सबका
इसमें कोई धार नहीं है,लेकिन है हथियार गजब का
दोनो तरफ ,किधर से भी तुम ,पकड़ो इसे ,वार करता है
है अमोघ यह शस्त्र निराला,हर बन्दा इससे  डरता है
जिसको धारण करके नारी ,कभी अन्नपूर्णा बन जाती
और कोप में, हाथों  में ले, झांसी  की  रानी  कहलाती
वैसे लकड़ी का टुकड़ा है ,लेकिन इतना पावरफुल है
लोग इसे 'बेलन'कहते है, करता सबकी बत्ती गुल है

घोटू   

Saturday, May 2, 2015

नज़ाकत या आफत

        नज़ाकत या आफत

कहा हमने तुम्हारे हाथ,कोमल और नाजुक है ,
        करोगे काम घर का तो,नज़ाकत  भाग जायेगी
उन्हें मेंहदी लगाकर के,सजाकर के ही तुम रखना,
        नहीं तो कमल जैसी पंखुड़ियां ,कुम्हला न जाएगी
कहा उनने ,नजाकत ना ,इन हाथों में बड़ा दम है,
                 ज़रा छू के तो देखो तुम,पसीने छूट जाएंगे ,
पड़ेंगे गाल पर तो मुंह तुम्हारा लाल कर देंगे,
              उँगलियाँ पाँचों की पांचो ,उभर गालों पे आएंगी

घोटू

Friday, May 1, 2015

पिसाई ही पिसाई

         पिसाई ही पिसाई
आदमी यूं तो रहता है ,अकेला मस्त मस्ती में
जानता है उसे पिसना ,पडेगा  फंस गृहस्थी में
मगर वो ढोल बाजे से,रचाता अपनी है शादी
और उसका बेंड बजता है,उमर भर की है बर्बादी
गृहस्थी  और दफ्तर में,हमेशा रहता  वो घिसता
बहू और सास झगडे भी ,बिचारा आदमी पिसता
गेंहूँ,मक्की जब पिसते है ,तभी रोटी है बन पाती
मसाले पिसते, खाने में ,तभी लज्जत है आ पाती
 पुदीना और धनिया पिस के,चटनी का मज़ा देते
रचा कर के पिसी मेंहदी ,वो हाथों को सजा  लेते
 और  मंहगाई के मारे ,आप और हम पिसे  जाते
साथ में गेंहू के सारे ,बिचारे घुन भी पिस   जाते
पिसाई से न ,लज्जत ही ,मगर बल भी है बढ़ जाता
अणु पिसता, बन परमाणु ,बड़ा बलवान बन जाता
पीसते दांत से खाना ,तभी हम है ,निगल पाते
हमें गुस्सा जब आता है ,पीस  कर दांत ,रह जाते
कहा 'घोटू' ने ये हंस कर ,मज़ा जीने का है पिस कर
है चन्दन एक लकड़ी पर,सर पे चढ़ती है वो घिस कर

मदन मोहन बाहेती' घोटू'
 

वो

                        वो

कोई कहता है बदली है,गरजती है,बरसती है ,
            कोई कहता है बिजली है,जो गिरती तो गज़ब ढाती
बहुत दिलकश,बहुत सुन्दर,बहुत नाजुक,रंगीली है ,
            वो खुद है फूल,फूलों पर ,मगर तितली सी मंडराती
अजब अंदाज आँखों का ,कोई कहता है मछली सी,
            कोई कहता है हिरणी सी,समझ ही हम नहीं पाते
  गजब ढाते है उस पर लब ,बदलते रहते है जब तब,
             कभी पंखुड़ी गुलाबी है ,कभी अंगार  दहकाते
सजी है मोतियों जैसी ,चमकते दांत की माला ,
              दौड़ती काटने को पर ,कभी जब कटकटाती है
कोई कहता वो काँटा है,बड़ी  तीखी  चुभन इनकी,
              कोई कहता वो गुल है पर,हज़ारों गुल खिलाती है
है उनकी जुल्फ बदली सी ,चढ़ी रहती जो उनके सर ,
             बड़ी मुश्किल से वो उसको,कहीं कर पाती है बस में
गूंथ कर प्यारी सी चोंटी ,उन्हें लाती है काबू में,
               लटक कर दोनों कन्धों पर,लगे नागिन सी वो डसने
कोई कहता है हिरणी सी,मोरनी सी कहे कोई ,
               या उनकी चाल कों ,गजगामिनी  कोई बताता है
कमल की नाल सी बांहे ,कदलीस्तंभ जंघाएँ,
                फलों से है लदी डाली ,चमन सा तन , सुहाना  है
कोई कहता है चंदा है ,कोई कहता है सूरज है ,
                कभी नदिया सी लहराती,कभी ममता का निर्झर है
कोई कहता सहेली है,कोई कहता पहेली है,
                 वो क्या है और कैसी है,समझना तुम पे निर्भर है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'