Monday, October 19, 2015

नदिया और जीवन

  नदिया और जीवन
         
मैं ,बचपन में थी उच्श्रृंखल
बच्चों सी ,चंचल और चपल 
पर्वतों से उतरते हुए ,
कुलांछे भरते हुए ,
जब जवानी के मैदानी इलाके में आई  ,
इतराई
मेरी छाती चौड़ी होने लगी
और मैं कल कल करती हुई,
मंथर गति से बहने लगी
मेरी जीवन यात्रा इतनी सुगम नहीं थी
मेरे प्रवाह में कई मोड़ आये
कभी ढलान के हिसाब से बही ,
कभी कटाव काट कर,
अपने रस्ते खुद बनाये
लोगों ने मुझे बाँधा ,
मुझ पर बाँध बनाया
मुझसे ऊर्जा ली ,
नहरों से मेरा नीर चुराया
 मेंरे आसपास ,अपना ठिकाना बनाया
मेरी छाती पर चढ़,
अपनी नैया को पार लगाया
किसी ने दीपदान कर ,
मुझे रोशन किया
किसी ने अपना सारा कचरा ,
मुझमे बहा दिया
कभी बादलों  ने ,अपना नीर मुझ में उंढेला
मैंने झेला ,
मुझे बड़ा क्रोध भी आया
मैंने क्रोध की बाढ़ में ,कितनो को ही बहाया
मुझे पश्चाताप हुआ,मैं शांत हुई
 और फिर आगे बढ़ती गयी
राह में कुछ मित्रों ने हाथ मिलाया
मेरे हमसफ़र बने
मेरी सहनशीलता और मिलनसारिता ,
मेरी विशालता का   सहारा बने
आज मैं ,विशाल सी धारा के रूप में,
बाहर से शांत बहती हुई दिखती हूँ
पर मेरे अंतर्मन में ,है बड़ी हलचल
क्योंकि महासागर में,विलीन होने का ,
आनेवाला है पल
आज नहीं  तो कल

  मदन मोहन बाहेती 'घोटू'



 

बचत के रोमांटिक तरीके

        बचत के रोमांटिक तरीके

मंहगाई बढ़ रही हमें कुछ करना होगा ,
ऐसा जिससे मज़ा उठायें  मंहगाई का,
रोमांटिक ढंग से यदि थोड़ी बचत करें तो ,
          मंहगाई की चुभन  नहीं   तड़फ़ा पायेगी
तुम परफ्यूम लगाओ,तुम्हे बांह में ,मैं लूँ ,
तो  मुझ में भी आयेगी तुम्हारी  खुशबू ,
इससे परफ्यूमो का खर्चा घट  जाएगा ,
          हम दोनों में एक जैसी खुशबू आएगी
मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी जब चुभती तुमकों ,
तुम्हे  सुहाती है ये हरकत मर्दों वाली ,
मैं दाढ़ी के बाल बढ़ा कर तुम्हे चुभाऊँ ,
          शेविंग क्रीम ,ब्लेड की लागत कम आएगी
बाथरूम में एक तौलिया सिरफ रखेंगे ,
तुम पहले नहा लेना ,अपना बदन पोंछना ,
फिर नहाऊंगा मैं ,और उससे  तन पोंछूँगा ,
                   मुझमे भी तुम्हारी रंगत आ जाएगी    
 दालें मंहगी ,पतली दाल बनाया करना ,
एक थाली में साथ बैठ ,हम तुम खांयेंगे ,
इससे प्यार बढ़ेगा ,बरतन भी कम होंगे,
        विम की टिकिया ,ज्यादा दिन तक चल पाएगी
जब भी मैं मांगूं मिठाई ,तुम मीठी पप्पी,
दे  दे  कर , मेरे मन को  बहलाती रहना ,
इससे डाइबिटीज का खतरा भी न रहेगा,
         खर्चा भी कम ,अच्छी सेहत हो जाएगी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
         
         

Saturday, October 10, 2015

काजल

        काजल

गौरी का गोरापन ही नहीं,
काजल की कालिख के बारे में भी ,
बहुत कुछ कहा जाता है
काजल ,सौ बार धोने  पर भी,
सफेद नहीं हो पाता है
काजल सी कालिख ,
मुंह पर जब पुत जाती है
बहुत बुरी लगती है
उसी काजल की धार,
अपनी आँखों पर लगा कर गौरी ,
छप्पनछुरी लगती है
लाडले बच्चे के माथे पर,
काजल का बिठौना ,
बुरी नज़र से बचा लेता है
और गौरी की आँखों का ,
फैला हुआ कजरा ,
उसकी बीती रात का ,
अफ़साना बता देता है
लोग  अंधियारे का भी, मज़ा ऐसे लेते है
मिलन की रात में ,दीपक बुझा देते है
ये दीपक ,जब बुझता है ,तो भी सताता है
और जलता है ,तो भी सताता है
जलते दीपक की बाती  का धुँवा ,
काजल बनाता है
और वो काजल जब उनकी आँखों में अंजता है
कितने ही दिलों को घायल  करता है
औरतों के सोलह सिंगार
में एक होती है कजरे की धार
जो करती है सबको बेकरार
इसलिए काजल की मार से डरिये
ये दुनिया काजल की कोठरी है ,
कहीं तुम पर काजल की कोई लीक न लग जाए ,
जरा सम्भल कर चलिए

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

पक्षपात -प्रेमघात

                    पक्षपात -प्रेमघात
                      
तुम हो उजली शुक्ल पक्ष सी ,मै हूँ कृष्णपक्ष सा काला
तुम सत्ता में,मैं विपक्ष  में ,घर पर चलता  राज तुम्हारा
मुझे नचाती ही रहती हो ,अपने एक इशारे पर तुम,
मैं बेबस और परेशान हूँ ,मैं  हूँ पक्षपात  का  मारा 
                          
जैसे श्राद्ध पक्ष में पंडित,  न्योता खाना नहीं छोड़ते
सरकारी दफ्तर के बाबू, रिश्वत   पाना  नहीं छोड़ते
वैसे तुम मुझे रिझाते, दिखा दिखा कर अपना जलवा,
औरफिर छिटक छिटक जाते हो,मुझे सताना नहीं छोड़ते

होता जब मौसम चुनाव का ,वोटर तब पूजे जाते है
श्राद्धपक्ष में पंडित ही क्या,कौवे भी दावत खाते है
तुम्हे पूजता हूँ मै हरदम ,चाहे कोई भी हो मौसम ,
फिर भी घास न डालो मुझको,कितना आप भाव खाते है    

 मदन मोहन बाहेती 'घोटू'                         
                         


     
             

मौत

        मौत

कलावे हाथों में अपने,भले कितने भी बँधवालो
कई ताबीज और गंडे ,गले में अपने लटकालो
उसे जिस रोज आना है ,वो आ ले जाएगी तुमको,
करो तीर्थ ,बरत कितने,टोटके  लाख   करवा लो 

घोटू

बहू ससुर संवाद

         बहू ससुर संवाद

सवेरे घूमते हो तुम ,रोज व्यायाम करते हो
विटामिन गोलियां कहते,फलों से पेट भरते हो
बहू बोली ससुर से तुम,प्रभू को पूजते हरदम,
वो तुमको याद ना करता,तुम जिसको याद करते हो
ससुर जी बोले यूं हंसकर,ये उसकी मेहरबानी है
उमर बोनस में उसने दी,हमें हंस कर बितानी है
परेशां व्यर्थ होती हो,करेगा याद जब भी वो,
हमारी सारी धनदौलत ,तुम्हारे पास आनी है

घोटू

Thursday, October 8, 2015

अपनी अपनी किस्मत

         अपनी अपनी किस्मत

यूं ही पेड़ पर कच्चा झड़ जाता है कोई
कोई पक जाता तो सड़  जाता है कोई
कोई बेचारे का बन जाता  अचार है,
होता है रसहीन ,निचुड़  जाता है कोई
होता कोई स्वाद और बेस्वाद कोई है,
कोई किसी को भाता और कोई ना भाता
हर एक फल की कब होती ऐसी किस्मत है,
साथ उमर के वह सूखा  मेवा बन जाता
      कोई फूल डाल  पर बैठा इठलाता  है 
     कोई निज खुशबू से बगिया महकाता है
     कोई प्रभु पर चढ़ता ,कोई लाश पर चढ़ता , 
     कोई पंखुड़ी पंखुड़ी कर के खिर  जाता है  
         कोई सजता सेहरे या सुहाग सेज पर  ,
        और भोर तक,दबा हुआ, है कुम्हला जाता
       हरेक फूल की किस्मत कब होती गुलाब सी ,
       मिश्री संग मिल,बन गुलकंद ,सभी मन भाता
        हर एक फल की कब होती है ऐसी किस्मत ,
           साथ उमर के वह सूखा मेवा  बन जाता   
कोई की औलाद निकम्मी है नाकाबिल
लायक कोई होती,कर लेती सब हासिल
कोई की औलाद न पूछे मातपिता को,
तिरस्कार करती है और जलाती है दिल
कितने ही माबाप यूं ही घुट घुट कर जीते ,
और किन्ही को बेटा ,सर आँखों बैठाता 
कब होती सबके नसीब में वो औलादें ,
जिनसे उनका नाम और यश है बढ़ जाता
हर एक फल की कब होती है ऐसी किस्मत ,
साथ उमर के ,वह सूखा  मेवा बन जाता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'