Monday, September 4, 2017

badlte mausm

बदलते रहते है मौसम,कभी गर्मी, कभी पतझड़ ,
किसी का भी समय हरदम ,एक जैसा नहीं रहता
कभी किसलय बने पत्ता ,साथ लहराता हवा के ,
सूख जाता कभी झड़ कर ,जुदाई का दर्द सहता
झड़े पतझड़ में जो पत्ते,पड़े देखो जो जमीं पर,
भूल कर भी नहीं चलना कभी भी उनको कुचल तुम
क्योंकि इन पत्तों ने ही तो,तुम्हे शीतल छाँव दी थी,
धूप की जब जब तपन से,परेशां थे हुए जल तुम
समय का ही फेर है ये,डाल से टूटे पड़े ये ,
नहीं तो एक दिन निराली,कभी इनकी शान रहती
नहीं पत्ता कोई हरदम ,डाल से रहता चिपक कर ,
सूख झड़ जाना हवा से ,है हरेक पत्ते की नियति
तुम्हारे माता पिता भी,इन्ही पत्तों की तरह है ,
बचाया हर मुसीबत से,हमेशा थी छाँव जिनकी
हो गए जो आज बूढ़े ,उम्र पतझड़ में गए झड़ ,
कर अनादर,कुचलना मत ,भावनाएं कभी इनकी
मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’
मैं क्यों बोलूं ?

मैं क्या बोलूं,? मैं क्यों बोलूं?
सब चुप,मैं ही ,क्यों मुख  खोलूं ?
चीरहरण हो रहा द्रोपदी का सबकी आँखों के आगे 
कुछ अंधे है,कुछ सोये है,मज़ा ले रहे है कुछ जागे  
और कुछ की लाचारी इतनी,मुख पर लगे हुए है ताले 
कुछ चुप बैठे ,डर  के मारे, अपने को रख रहे संभाले 
चीख चीख गुहार कर रही ,त्रसित द्रौपदी,मुझे बचाओ 
मैं ,असमंजस में व्याकुल हूँ ,कोई मुझको राह दिखाओ 
कुटिलों की इस भरी सभा में,मैं सर पर यह आफत क्यों लू 
मैं क्या बोलूं? मैं क्यों बोलूं?
मेरा मन विद्रोह कर रहा ,शशोपज है,उथलपुथल  है
एक तरफ तो मर्यादा है ,एक तरफ शासन का बल है 
मेरा अंतःकरण कह रहा ,गलत हो रहा,सही नहीं है 
लेकिन मैं विद्रोह कर सकूं,हिम्मत मुझमे अभी नहीं है 
मेरा मौन ,स्वकृति लक्षण बन ,मुझे कर रहा है उद्वेलित
किसे पता है ,महासमर का ,बीजारोपण ,है ये किंचित 
मेरा ही जमीर गायब है ,औरों की क्या नब्ज  टटोलूं 
मैं क्या बोलूं?मैं क्यों बोलूं?
होनी को जब होना होता,तारतम्य  वैसा बनता है 
संस्कार सब लोग भुलाते ,बैरभाव मन में ठनता है 
धीरे धीरे ,ये घटनाये ,बन जाती है ,विप्लव मिलकर 
छोटी छोटी कुछ भूलों के ,होते है परिणाम ,भयंकर 
क्या मेरे तटस्थ रहने से ,यह माहौल ,सुधर पायेगा 
दुष्ट और प्रोत्साहित होंगे ,महासमर ना टल पायेगा 
इस विध्वंशक गतिविधि का,करूं विरोधऔर मुंह खोलूं 
मैं क्या बोलूं ?मैं क्यों बोलूं?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, August 27, 2017

पूजन और रिटर्न गिफ्ट 

क्या आपने कभी गौर किया है ,
कि हमारी सोच है कितनी संकुचित 
भगवान को करते है बस पत्र पुष्प अर्पित
गणेशजी को दूर्वा 
शंकरजी को बेलपत्र और अकउवा 
और अन्य देवताओं को पान 
फिर पानी के चंद छींटों से कराते है स्नान 
और फिर ' वस्त्रम समर्पयामि 'कह कर ,
कलावे के धागे  का एक टुकड़ा तोड़ कर ,
उन्हें चढ़ा देते है 
और फिर 'पुंगी फल समर्पयामि 'कह कर ,
एक छोटी सी सुपारी ,
जो खाने योग्य नहीं होती ,
उनकी ओर बढ़ा देते है 
ये वही पूजा की सुपारी होती है ,
जो हर बार,हर पूजा में ,
फिर फिर चढ़ाई जाती है 
क्योकि भगवान इसे खा नहीं सकते ,
और पंडतांइन भी इसे नहीं खाती है
एक जटाधारी सूखा नारियल ,
जो किसी के काम नहीं आता है 
हर पूजा में भगवन को चढ़ाया जाता है 
'गजानन भूत गणादि सेवकं ,
कपित्थ जम्बूफल चारु भक्षणम '
मंत्र वाले गणेशजी को ,
उनका प्रिय कपित्थ या जम्बूफल ,
कभी नहीं चढ़ाया जाता है 
बल्कि उन्हें मोदक चढ़ाते है ,
जो उनका' ब्लड शुगर 'बढ़ाता है 
उन्हें एक किलो का डिब्बा दिखाते है 
एकाध लड्डू चढ़ा कर  ,
बाकि सब घर ले आते है 
सच ,हम है कितने सूरमा 
खुद तो खाते है बाटी और चूरमा 
और प्रभु को खिलाते घासफूस है 
देखलो,हम कितने कंजूस है 
इस तरह की सस्ती चीजों को ,
प्रतीक बना कर चढाने के बाद 
हम प्रभु से करते है फ़रियाद 
'हमें अच्छी बुद्धि दो 
रिद्धि और सिद्धि दो '
ये जानते हुए भी कि ,
रिद्धि सिद्धि उनकी वाईफ है 
एक पति से उसकी पत्नियां माँगना ,
कितना नाजाईश है 
ये आप,हम सब अच्छी तरह जानते है 
फिर भी रिटर्न गिफ्ट में ,
रिद्धि सिद्धि ही मांगते है 
और फिर पांच या दस दिन के बाद ,
जब थक जाते है रोज रोज कर अर्चन 
कर देते है उनका जल में विसर्जन 
जैसे विदेशों में बसे बच्चे ,
अपने बूढ़े  माता पिता को,
वर्ष में एक बार ,
आठ दस दिन के लिए बुलाते है ,
करते है सत्कार 
और फिर उन्हें बिदा कर देते है ,
बाँध कर उनका बिस्तर बोरिया 
यह कह कर कि 'बाप्पा मोरिया 
अगले बरस तू फिर से आ' 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
          क्या करें 

आदतें  बिगड़ी  पड़ी है ,क्या करें 
आशिक़ी सर पर चढ़ी है ,क्या करें 
बीबी हम पर रखती हरदम चौकसी ,
मुसीबत बन कर  खड़ी है,क्या करें 
कहीं नेता ,कहीं बाबा  लूटते,
अस्मतें ,सूली चढ़ी है  ,क्या करें 
काटने को दौड़ती है हर नज़र,
हरतरफ मुश्किल बड़ी है,क्या करें 
जिधर देखो उधर घोटाले मिले ,
हर तरफ ही गड़बड़ी है ,क्या करें 
किसी को भी ,किसी की चिंता नहीं,
सभी को अपनी पड़ी है ,क्या करें 
चैन से ,पल भर कोई रहता नहीं,
सबको रहती हड़बड़ी है ,क्या करें 
'घोटू'करना चाहते है बहुत कुछ ,
जिंदगी पर, दो घड़ी है,क्या करें 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
   पूरी-पंचतत्व से भरी  

गेंहू,'पृथ्वी तत्व 'से युक्त होता है ,
क्योंकि पृथ्वी से उपजता है 
और इसी गेंहू से आटा बनता है 
यह आटा 'जल तत्व' मिला कर ,
जब गूंथा जाता है 
और  खुले वातावरण में ,
जब पूरी सा बेला जाता है 
तो उसमे 'वायु तत्व' मिल जाता है 
ये पूरियां जब 'अग्नि तत्व'से गर्म ,
घी में तली जाती है 
तो फूल कर 
'आकाश तत्व'से भर जाती है 
इसलिए फूली फूली पूरियों का,
ये जो बनता  भोजन है 
इसमें सभी पंचतत्वों का समायोजन है 

घोटू 

Saturday, August 26, 2017

    हृदयाभिनन्दन 

तुम राजा राजेश ह्रदय के ,
और शालीन ,शालिनी जैसे 
पंख लगाये है  ईश्वर  ने ,
तुमको हंस ,हंसिनी  जैसे 
खग से उड़ो और इस जग में ,
जगमग जगमग हरदम चमको 
पाकर पुत्र पायलट तुमसा ,
बहुत  गर्व होता है हमको 
जीवन के इस विस्तृत नभ में ,
रहे तुम्हारी शान हमेशा 
वायुयान से पंख तुम्हारे 
भरते रहे  उड़ान हमेशा 
बन कर रहो विशाल ह्रदय तुम,
सदा 'हनी' सा हो मीठापन 
सदा सुखी ,समृद्ध रहो तुम ,
हृदय तुम्हारा है अभिनंदन 

तुम्हे ढेर सा प्यार करनेवाले 
       मम्मी और पापा 

Tuesday, August 22, 2017

हे देवी,पत्नी-परमेश्वरी 

हे  देवी,  पत्नी-परमेश्वरी 
हृदयवासिनी,तू हृदयेश्वरी 

शांतिदायिनी,सुखप्रदायिनी 
अंकशायिनी ,मन लुभावनी 
नवरस भोजन ,स्वाददायिनी 
सब घरभर का बोझ वाहिनी 
मैं तुम्हारा ,दास  अकिंचन ,
सुख दुःख की तुम ,मीत सहचरी 
हे  देवी  पत्नी -परमेश्वरी 

विधि ने तुमको स्वयं बनाया 
खिले कमल सी,कोमलकाया 
महक पुष्प सी,चहक खगों की 
चंचलता और चाल  मृगों  की 
रक्तिम अधर,नयन कजरारे,
कंचन तन की छवि सुनहरी 
हे  देवी - पत्नी परमेश्वरी 

तेरी पूजा ,तेरा  अर्चन 
कर पुलकित होता मेरा मन 
अन्नपूर्णा ,लक्ष्मी है तू 
मैं श्रद्धानत ,तुझको पूजूं 
खुशियां बरसाती जीवन में,
बन कर प्यार भरी तू बदरी 
हे  देवी  पत्नी -परमेश्वरी 

कनकछड़ी सी सुंदर मूरत 
प्रेम घटों से छलके  अमृत 
मैं तुम्हारा ,दास अकिंचन 
निशदिन करू,तुम्हारा वंदन 
रूप गर्विता ,प्रेम अर्पिता 
प्यारी सुन्दर ,छवि नित निखरी 
हे  देवी  पत्नी -परमेश्वरी 
मन को भाता ,मुख मुस्काता 
देख हृदय प्रमुदित हो जाता 
तेरे एक इशारे भर पर 
मैं चकरी सा,खाता चक्कर 
तेरे आगे ,उठ ना पाती ,
नजर हमारी ,डरी डरी 
हे  देवी  पत्नी-परमेश्वरी 

आस लगाए बैठा ये मन 
दे दो मधुर ,अधर का चुंबन 
बाँध मुझे बाहु बंधन में 
उद्वेलन भरदो तन मन में 
पा ये प्रेम प्रसाद आस्था ,
दिन दिन बढे और भी गहरी 
हे  देवी  पत्नी-परमेश्वरी 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '